वित्तीय मामलों की संसदीय समिति ने 07 अगस्त 2013 को जीएसटी के तेजी से क्रियान्वन हेतु इससे संबंधित कानून बनाने को मंजूरी दे दी. इसी के साथ केंद्र में प्रमुख विपक्षी दल के नेता व समिति के अध्यक्ष यशवंत सिंहा की अध्यक्षता वाली जीएसटी समिति इस प्रमुख कर सुधारों से संबंधित प्रस्तावों पर अपनी रिपोर्ट भी केंद्र सरकार को सौंप दी.
जीएसटी के क्रियान्वयन से संबंधित आवश्यक संवैधानिक सुधारों की मांगों पर प्रस्तुत रिपोर्ट के बाद अब केंद्र सरकार को जीएसटी के संदर्भ में कानून बनाने हैं.
जीएसटी समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस व्यापक कर प्रणाली के संबंध में कुछ संशोधन के सुझाव दिये हैं जिनमें आर्थिक विकास, मुद्रा स्फीति, जमाखोरी, कर दाताओं द्वारा कर नियमों के पालन और अंतिम उत्पादों के मूल्य जैसे पहलुओं के असर पर नजर रखने के लिए एक निगरानी प्रकोष्ठ बनाया जाना शामिल हैं।
जीएसटी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जीसएसटी से संबंधित बनाये जाने वाले कानूनों को संविधान में शामिल नहीं किया जाना चाहिए. साथ ही, जीएसटी पर बनाया गया विधेयक भली प्रकार तैयार नहीं किया गया है.
साथ ही समिति ने जीएसटी के क्रियान्वयन में आ रही सबसे बड़ी समस्या राज्यों की राजस्व संबंधी चिंताओं को दूर करने हेतु एक स्थायी क्षतिपूर्ति प्रणाली की स्थापना का सुझाव दिया है.
वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Service Tax, GST)
वस्तु एवं सेवा कर एक मूल्य वर्धित कर प्रणाली है जिसके क्रियान्वयन से केंद्र व राज्य सरकारों के द्वारा विभिन्न प्रकार की वस्तुओं एवं सेवाओं पर लगाये जाने वाले कर को प्रतिस्थापित किया जाना है. वस्तु एवं सेवा कर के माध्यम में किसी भी वस्तु या सेवा की कीमते पूरे देश में समान हो जाएंगी. भारत में जीएसटी से संबंधित सर्वप्रथम कदम तब उठाया गया जब कि वर्ष 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने जीएसटी संबंधित एक समिति का गठन किया था. इस समिति के अध्यक्ष पश्चिम बंगाल सरकार के तत्कालीन वित्तमंत्री असीम दासगुप्ता थे. इसे लागू करने से संबंधित सबसे पहली घोषणा 2007-2008 के केंद्र सरकार के बजट में की गई जब कि वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने 1 अप्रैल 2010 से इसके लागू होने की घोषणा की. हालांकि विभिन्न राज्यों के द्वारा जीएसटी के द्वारा होने वाली राजस्व की हानियों का हवाला देते हुए विरोध के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका और इसमें आवश्यक संशोधन करने की बात कही गयी.
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