वैज्ञानिकों ने 29 अप्रैल 2014 को पहली बार सोलर जेट ईंधन बनाने में सफलता हासिल की. इसे बनाने में सूर्य की रौशनी, पानी और कार्बन डाइऑक्साइड का इस्तेमाल किया गया है. ‘सोलर जेट’ नाम की परियोजना को यूरोपीय संघ (ईयू) ने वित्त मुहैया कराया था. इस परियोजना के भागीदारों में शामिल हैं - जर्मन एयरोस्पेस सेंटर (डीएलआर), ईटीएच ज्यूरिख, बॉहॉस लुफ्ताहर्ट और शेल.
शोधकर्ताओं ने पहली बार सफलतापूर्वक अक्षय किरोसिन के पूरे उत्पादन श्रृंखला को प्रदर्शित किया. इसके लिए उन्होंने उच्च तापमान ऊर्जा स्रोत के रूप में केंद्रित रौशनी का इस्तेमाल किया.
प्रक्रिया
पहले चरण में केंद्रित अनुकरणीय सूर्य प्रकाश को कार्बन डाइऑक्साइड को परिवर्तित करने के लिए इस्तेमाल किया गया और पानी का इस्तेमाल उच्च तापमान वाले सौर रिएक्टर जिसमें मेटल– ऑक्साइड वाले सामग्री थी में गैस का संश्लेषण (सिनगैस) करने के लिए किया. सिनगैस हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड का मिश्रण है. इसके बाद सिनगैस को शेल के जरिए फिशर– ट्रोपॉस्च प्रक्रिया द्वारा किरोसिन में बदल दिया जाता है.
फिशर– ट्रोपॉस्च से बने ईंधन पहले से ही प्रमाणित हैं और मौजूदा वाहनों एवं विमानों में बिना उनके ईंजन में कोई बदलाव किए या ईंधन की संरचना को बदले बिना इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.
सोलर– जेट के बारे में
चार वर्षों वाली सोलर– जेट प्रोजेक्ट जून 2011 में शुरु की गई थी. इस प्रोजेक्ट को अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी विकास (एफपी 7) के सातवें फ्रेमवर्क प्रोग्राम से 2.2 मिलियन यूरो मिले थे.
प्रोजेक्ट अभी भी प्रायोगिक चरण में हैं जिसमें जेट के ईंधन का उत्पादन प्रयोगशाला की परिस्थितियों में सूरज की नकली रौशनी के जरिए किया जाता है. हालांकि, परिणामों ने भविष्य में किसी भी तरल हाइड्रोकार्बन ईंधन का सूरज की रौशनी, कार्बन डाइऑक्साइड और पानी से बनाए जाने की उम्मीद पैदा कर दी है.
ईयू के सात वर्ष के शोध और नवाचार प्रोग्राम होराइजन 2020 में ऊर्जा के स्थायी स्रोत प्राथमिकता है. साल 2014 में इस प्रोग्राम को शुरु किया गया था.

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