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बुंदेलखंड के चंदेल

चंदेला या चंदेल मध्य भारत में राजपूत कबीले हैं। चंदेला शब्द की उत्पत्ति चंद्रात्रेय से हुई है जो विरासत को प्रदर्शित करने वाले दो शब्दों– चंद्र वामसा और अत्रेय गोत्र से बना है। चंदेलों का क्षेत्र जिसे चंदेल राजवंश कहा जाता था, में, मध्य भारत के बुंदेलखंड का बहुत बड़ा हिस्सा आता है। इस हिस्से पर चंदेलों ने काफी लंबे समय– दसवीं से तेरहवीं शताब्दी ईस्वी के बीच शासन किया था। भारत के इतिहास में चंदेश वंश महाराजा राव विद्याधर की वजह से जाना जाता है जिन्होंने महमूद गजनी के आक्रमण का मुंहतोड़ जवाब दिया था।
Nov 3, 2015 16:17 IST
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चंदेला या चंदेल मध्य भारत का राजपूत कबीला है। कहा जाता है कि चंदेला शब्द की उत्पत्ति चंद्रात्रेय से हुई है जो विरासत को प्रदर्शित करने वाले दो शब्दों– चंद्र वामसा और अत्रेय गोत्र से बना है। चंदेलों का क्षेत्र जिसे चंदेल राजवंश कहा जाता था, में, मध्य भारत के बुंदेलखंड का बहुत बड़ा हिस्सा आता है। इस हिस्से पर चंदेलों ने काफी लंबे समय, दसवीं से तेरहवीं शताब्दी ईस्वी के बीच शासन किया था। भारत के इतिहास में चंदेश वंश महाराज राव विद्याधर की वजह से जाना जाता है जिन्होंने महमूद गजनी के आक्रमण का मुंहतोड़ जवाब दिया था।

ये चंद्रवंशी राजपूत यानि सोम (संस्कृत में चंद्रमा) के वंशज हैं। चंदेला राजपूतों के ठिकानों का पता सपाई जिसे पहले संपद नगर के नाम से जाना जाता था, से लगाया जा सकता है। इन्हें राव पदनाम दिया गया था। ये कानपुर निवासियों को विरासत में मिली उपाधि के मुख्य धारक हैं। चंदेलों का इलाका जिसे चंदेल राजवंश भी कहते हैं, 9वीं शताब्दी ईसा से 13वीं शताब्दी ईसा के बीच मध्य भारत के बुंदेलखंड जिले के महत्वपूर्ण हिस्से पर शासन किया। उनकी पहली राजधानी खजुराहो थी जिसे बाद में बदलकर महोत्सव नगर या महोबा कर दिया गया था।

खजुराहो के चंदेलों का राज्य गुर्जर प्रतिहारों के भरोसे थे। नान्नुक से लेकर हर्ष देव तक, चंदेल शासक कई वर्षों तक प्रतिहारों के भू– सामंत अधिकारी थे। जब प्रतिहार साम्राज्य कमजोर होने और टूटने लगा तो इन्होंने आधिकारिक रूप से खुद को स्वायत्त घोषित कर दिया। इसके पहले, प्रतिहारों ने चंदेलों और इलाके के अन्य शासकों की इलाके में मध्य पूर्व से आए मुसलमान घुसपैठियों से देश को बचने में मदद की थी। घुसपैठियों के खिलाफ समग्र प्रतिरोध ने इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी थी।

चंदेल वंश के शासक

1. महाराजा राव विद्याधरः भारत के इतिहास में चंदेल प्रशासन महाराजा राव विद्याधर की वजह से लोकप्रिय है। इन्होंने महमूद गजनी के आक्रमण का मुंह तोड़ जवाब दिया था।

2. नान्नुकः चंदेल वंश के संस्थापक थे। वह एक छोटे से साम्राज्य के नेता थे। जैसा कि शिलालेखों पर की गई खुदाई से पता चलता है, नौवीं सदी के पहले तिमाही में वे अपने समूह के प्रमुख थे। खजुराहो को खजुरवाटिका– खजूर का बागीचा, कहा जाता था, जो मुख्य रूप से नान्नुक के हाथों में था। वाकपति ने नौंवी सदी की दूसरी तिमाही में अपने पिता नान्नुक का स्थान ले लिया था।

3. वाकपतिः वाकपति खजुराहो का नेता था, चूंकि वह प्रतिहारों का एक जागीरदार था इसलिए उसे हमेशा पहली पंक्ति में रहते हुए नियमित तौर पर प्रतिहारों की मदद करने की जरूरत थी। विंध्य क्षेत्र के कुछ ढलानों पर कब्जा करने के लिए उसने अपने क्षेत्र का विस्तार करने के बारे में सोचा। वाकपति के दो बच्चे थे, जयशक्ति और विजयशक्ति। समय के साथ इन्होंने अपने पिता का स्थान लिया। दोनों ही बच्चे सुगठित और साहसी थे और उन्होंने अपने साम्राज्य में प्रभावशाली क्षेत्रों को शामिल किया।

4. जयशक्तिः बड़ा भाई, जिसने शुरुआत में शासन किया, को अक्सर जयजक नाम से पुकारा जाता था और इस नाम से जिस इलाके पर चंदेलों ने शासन किया उसे जैजिकभुक्ति नाम दिया गया। उसके छोटे भाई विजयशक्ति ने उसका स्थान लिया। उसने कई युद्ध लड़े और कई पड़ोसी क्षेत्रों पर शासन किया। चूंकि जय और विजय दोनों ही अच्छे शासक थे इसलिए इनके साहसी कार्यों का गान कविताओं में नियमित रूप से किया जाता है। राहिल विजयशक्ति का पुत्र था। विजयशक्ति के बाद सिंहासन पर उसे बैठने का मौका मिला। नान्नुक, जय और विजय ने समय के साथ अपने इलाके में कई पड़ोसी क्षेत्रों को शामिल कर लिया था और वे अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ थे।

5. राहिलः मोहाबा से तीन किमी दक्षिण पश्चिम में स्थित शहर रहील्या का नाम राहिल पर ही रखा गया था। वहां उसने रहील्यासागर नाम का जलाशय और उसके किनारे मंदिर का निर्माण करवाया था, जिसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। राहिल का शासन काल मात्र सदी का एक चौथाई यानि नौंवी सदी के आखिर में था। हर्षदेव उसका बेटा था और करीब 900 ई. में उसने राहिल की जगह ले ली थी।

6. हर्षदेवः हर्षदेव ने अपने लिए सर्वोच्च स्थान खुद अर्जित किया था। 25 वर्षों में या अपने इलाके के आसपास के क्षेत्रों में, उसने अपने क्षेत्र को संवर्धित किया और अपने परंपरा की श्रेष्ठता में सुधार की। अपने समय का वह पहला ऐसा चंदेल शासक था जिसके बल की वाहवाही उस समय की जाती थी।

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