क्या होती है Zero Farming और किसे कहा जाता है इसका जनक, जानें सब कुछ
हाल ही में हुई वर्षा की वजह से किसानों की फसल खराब हुई है। ऐसे में कृषि क्षेत्र इन दिनों चर्चाओं में बना हुआ है। इस कड़ी में हम कृषि से जुड़े एक महत्त्वपूर्ण शब्द और तकनीक Zero Farming के बारे में जानेंगे।
हाल ही में उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बारिश दर्ज हुई है। इसका असर किसानों की फसलों पर पड़ा है, जिससे फसलों को नुकसान पहुंचा है। ऐसे में मौजूदा समय भारतीय कृषि क्षेत्र चर्चाओं में बना हुआ है।
इस लेख में हम कृषि से जुड़ी Zero Farming के बारे में जानेंगे, जिसमें किसान को खेती करने के लिए बाहर से कीटनाशक या फिर खाद खरीदने की आवश्यकता नहीं होती है। इसे हम जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग के नाम से भी जानते हैं। इसका उद्देश्य खेती की लागत को शून्य करने के साथ जमीन को केमिकल्स से बचाना है।
इन 4 स्तंभों से मिलकर बनी है Zero Farming
जीरो फार्मिंग अलग-अलग प्रकार के स्तंभों से मिलकर बनी है, जो कि इस प्रकार हैंः
जीवामृत
इसे मिट्टी को पोषक बनाने के लिए सबसे बेहतर माना जाता है। जीवामृत में देसी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन और खेत की मिट्टी से एक घोल तैयार किया जाता है। इस घोल से मिट्टी में सूक्ष्मजीवों और केचुंओं की संख्या बढ़ती है।
बीजामृत
इसमें बीजों को बोने से पहले उन्हें उपचारित किया जाता है। इस तकनीक में गाय के गोबर के साथ-साथ गोमूत्र का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे बीज मिट्टी से होने वाली बीमारी से बच सके।
आच्छादन
इस प्रक्रिया में मिट्टी की ऊपरी परत को सूखे पत्ते या पुआल से ढक दिया जाता है, जिससे मिट्टी में नमी बनी रहती है।
वाफसा
इस विधि के तहत मिट्टी में हवा और पानी के कणों का सही संतुलन होता है, जिससे खेती करने पर सिंचाई की बहुत कम आवश्यकता होती है।
क्या हैं Zero Farming के फायदे
-किसानों का खाद का खर्च बचता है और धन की बचत होती है।
-रासायनिक खाद न डालने की वजह से मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहती है और फसल अच्छी होती है।
-इस तकनीक से जो अनाज पैदा होता है, वह पूरी तरह शुद्ध होता है।
-जीरो फार्मिंग में पानी का बहुत कम उपयोग होता है, जिससे पानी की बचत होती है।
किसे जाता है Zero Farming का श्रेय
भारत में Zero Farming को लोकप्रिय बनाने का श्रेय सुभाष पालेकर को जाता है। उन्होंने 1970-80 के दशक में महसूस किया कि रासायनिक खाद की वजह से जमीन की उपज कम हो रही है और कम खेती हो रही है।
इससे किसानों पर कर्ज बढ़ रहा है। ऐसे में उन्होंने करीब 20 वर्षों तक शोध किया कि जंगल में किस प्रकार पेड़-पौधे फलते हैं। उन्होंने जीवामृत और बीजामृत जैसी तकनीकों का ईजाद किया, जिससे किसानों को बाहर से खाद खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी।
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