Prakram Diwas 2026: हर साल 23 जनवरी को क्यों मनाया जाता है पराक्रम दिवस, किससे है संबंध, पढ़ें
Indian Freedom Struggle: भारत में हर साल 23 जनवरी को पराक्रम दिवस का आयोजन किया जाता है। इस बार भारत की ओर से छठा पराक्रम दिवस मनाया जा रहा है। ऐसे में यहां जानना जरूरी है कि आखिर पराक्रम दिवस का संबंध किससे है और क्या है इसके पीछे का इतिहास, जानने के लिए यह लेख पढ़ें।
Azad Hind Fauz: भारत में हर साल 23 जनवरी को पराक्रम दिवस का आयोजन किया जाता है। इस बार भारत की ओर से छठा पराक्रम दिवस मनाया जा रहा है। हालांकि, क्या आप जानते हैं कि आखिर पराक्रम दिवस की शुरुआत कब और क्यों की गई थी। साथ ही, यह दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी। भारत में किस महान व्यक्ति से इस दिवस का संबंध है। यदि आप इन सवालों का जवाब नहीं जानते हैं, तो इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे।
क्या है पराक्रम दिवस
पराक्रम दिवस भारत के स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ा हुआ है। यह दिन उनकी जयंती यानि कि 23 जनवरी को मनाया जाता है।
कब हुई पराक्रम दिवस की शुरुआत
पराक्रम दिवस मनाने की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जनवरी, 2021 में की गई थी। उस समय 23 जनवरी को नेताजी की 124वीं जयंती पर पहला पराक्रम दिवस मनाया गया था। यह दिवस स्वतंत्रता आंदोलन में नेताजी द्वारा किए गए उनके अथक प्रयासों का प्रतीक है। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों में देशभक्ति की भावना, साहस और दृढ़ संकल्प को बढ़ाना है।
नेताजी सुभाष चंद्र का प्रारंभिक जीवन
नेताजी सुभाष चंद्र का जन्म 23 जनवरी, 1897 में ओडिसा के कटक में हुआ था। उन्होंने 1919 में भारतीय सिविल सेवा परीक्षा यानि कि इंपेरियल सिविल सर्विस को पास कर लिया था। हालांकि, उन्होंने सिविल सेवा अधिकारी रहने के बजाय इस्तीफा दे दिया और स्वतंत्रता आंदोलन में जुड़ गए। नेताजी सुभाष चंद्र बोस चित्तरंजन दास को अपना राजनीतिक गुरु माना करते थे। वहीं, वह स्वामी विवेकानंद के विचारों से काफी प्रेरित रहते थे।
युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय रहे सुभाष चंद्र बोस
नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए थे। इस बीच वह 1938 में हरिपुरा और 1939 में त्रिपुरा में कांग्रेस अध्यक्ष रहे। वह युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय थे।
1939 में की फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना
नेताजी सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी के बीच वैचारिक मतभेदों हुए, जिससे नेताजी ने 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद उन्होंने ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ नाम के एक दल की स्थापना की थी।
आजाद हिंद फौज के निर्माता
नेताजी सुभाष चंद्र बोस इस बात को मानते थे कि यदि अपने देश भारत को अंग्रेजों से आजाद कराना है, तो ब्रिटिश के दुश्मनों से हाथ मिला लिया जाए। उस समय द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी और जापान से ब्रिटिश युद्ध चल रहा था।
इस दौरान वह भारत से जर्मनी और जापान भी गए। साल 1943 में सिंगापुर में उन्होंने आजाद हिंद फौज का नेतृत्व करते हुए इसका गठन किया। इस फौज में नेताजी द्वारा रानी झांसी रेजिमेंट भी रखी गई, जो कि महिलाओं के लिए थी।
भारत को दिया राष्ट्रीय नारा
आपको बता दें भारत का राष्ट्रीय नारा ‘जय हिंद’ भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने दिया था। दरअसल, उनकी सेना के एक अधिकारी रहे आबिद हसन जफरानी ने अपने सैनिकों बीच अभिवादन के लिए जय हिंदुस्तान का सुझाव दिया था, जिसे नेताजी ने छोटा करने के लिए कहा था। इस पर ‘जय हिंद’ का सुझाव दिया गया, जो कि नेताजी द्वारा रेडियों पर दिए जाने वाले अपने भाषणों के दौरान इस्तेमाल किया जाता था। आज भी यह उपयोग में है।
रहस्यमयी रही मृत्यु
नेताजी की मृत्यु रहस्यमयी रही है। ऐसा माना जाता है कि 18 अगस्त, 1945 को ताइवान में एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई थी, लेकिन उनका शव बरामद नहीं किया गया था।
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