प्रति वर्ष लगभग 11 लाख स्टूडेंट्स आईआईटी की परीक्षा देते हैं. जबकि सभी इंस्टीट्यूट्स को मिलाकर सिर्फ 11000 सीट्स ही उपलब्ध हैं. इस मामले में किसी भी वर्ष मांग के अनुरूप आपूर्ति नहीं हो पाती है. फिर भी इन इंस्टीट्यूट्स की मांग दिनोंदिन और बढ़ती जा रही है. कोरा पर कई ऐसे आर्टिकल तथा एक्सपर्ट के जवाब पड़े हुए हैं जो यह दर्शाते हैं कि आईआईटी में एडमिशन लेना कितना मुश्किल है तथा आईआईटीयन की लाइफ कितनी संघर्षपूर्ण होती है? लेकिन इनमें से कई बाते ऐसी हैं जो सिर्फ मिथक मात्र है. इनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है. आइये ऐसे ही कुछ मिथकों की चर्चा करते हुए उसकी वास्तविकता को जानने की कोशिश करते हैं. केवल मेधावी छात्र ही जेईई की परीक्षा पास कर सकते हैं बहुत सारे छात्र जेईई एग्जाम के लिए रजिस्ट्रेशन करते हैं लेकिन परीक्षा में बहुत कम ही छात्र बैठ पाते हैं. इसकी मुख्य वजह यह है कि अधिकांश छात्र यही समझते हैं कि जेईई सिर्फ टैलेंटेड और इंटेलिजेंट स्टूडेंट्स के लिए ही है. यह धारणा बहुत अधिक छात्रों को हतोत्साहित करती है और वे परीक्षा नहीं देने का निर्णय कर बैठते हैं. यह कोई मायने नहीं रखता है कि आपने स्कूल में कितने प्रतिशत मार्क्स प्राप्त किये हैं? यह सिर्फ आपके माइंड सेट पर निर्भर करता है. यदि एक बार आपने निर्णय ले लिया और यह माइंडसेट बना लिया कि मुझे किसी भी हालत में जेईई क्वालीफाई करना ही है तो आप अवश्य ही जेईई को क्रैक कर सकते हैं. सिर्फ इसलिए कि पहले आपने कठिन मेहनत नहीं की, इसलिए आप आगे भविष्य में एक सर्वश्रेष्ठ कॉलेज में पढ़ने के विषय में नहीं सोच सकते हैं. आईआईटी में पढ़ने के लिए आपको बचपन से ही एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी होने की जरुरत नहीं है. ऐसे बहुत सारे उदाहरण भरे पड़े हैं कि पढ़ाई में बिलकुल सामान्य छात्रों ने भी जेईई को क्वालीफाई किया है. इस परीक्षा को देने से पहले आपको सिर्फ इतना ही सोचना है कि इस परीक्षा को क्वालीफाई करने के लिहाज से आप पढ़ाई में काफी अच्छे हैं. कोटा जाकर पढ़ाई करना ही एकमात्र विकल्प है कोटा जाकर पढ़ाई करने का मतलब यह नहीं है कि आप जेईई एग्जाम क्लियर कर ही लोगे.कोटा के बारे में सबसे ज्यादा अपील करने वाली एक बात यह है कि प्रत्येक कोचिंग संस्थान यह दावा करते हैं कि मैक्सिमम टॉपर उन्ही के इंस्टीट्यूट से निकलते हैं. हालांकि, तीव्र प्रतिस्पर्धा, भावनात्मक समर्थन का आभाव, व्यक्तिगत ध्यान की कमी तथा घर से दूर रहने जैसे फैक्टर आपका ध्यान स्टडी से भटका भी सकते हैं. यदि आप अनुशासन पूर्वक सिलेबस को सही ढंग से समझकर अपने घर से ही तैयारी करें तो भी जेईई को क्रैक कर सकते हैं. अधिक घंटों तक पढ़ाई करने से मार्क्स ज्यादा आते हैं ऐसा सामान्यतः कहा जाता है लेकिन मार्क्स का इससे कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है. यदि आप शुरुआत बहुत जल्दी करते हैं तो आपको बहुत अधिक घंटे तक पढाई करते हुए लेट नाइट तक पढ़ाई करने की जरुरत नहीं है.सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्येक छात्र की सब्जेक्ट को ग्रैस्प करने की क्षमता अलग अलग होती है. इसीलिए यह व्यक्तिगत क्षमता पर निर्भर करता है. इसका कोई फिक्स पैमाना नहीं है. आप अपनी क्षमता के अनुसार अपने समय का आवंटन कर सकते हैं. आप 12 घंटे किताबे लेकर बैठे रहने के वनिस्पत अपना एक सही टाइम स्लॉट बना सकते हैं और उसके अनुरूप स्टडी कर सकते हैं. अपनी तैयारी पर अपना फोकस रखें तथा नियमित रूप से स्टडी करें. आप आईआईटी में पूरी तरह से अनसोशल लोगो से घिरे रहेंगे लोगों ने इस एग्जाम को बहुत कठिन मान लिया है और यह समझते हैं कि जेईई को क्रैक करने वाले छात्र या आईआईटीयन दिमाग से तेज होने के बावजूद पूरी तरह से अनसोशल होते हैं. अर्थात सामाजिक सरोकारों से उनका उतना लेना देना नहीं होता है. वे आराम करना तो जानते ही नहीं. हर वक्त उनका ध्यान स्टडी पर ही होता है. लेकिन यह बात बिलकुल सही नहीं है. आईआईटी के अंतर्गत भी कई ऐसे डिपार्टमेंट हैं जो अन्य करिकुलर एक्टिविटीज पर बहुत ध्यान देते हैं.जैसे लिट्रेरी क्लब, ड्रैमेटिक्स क्लब,वाइल्ड लाइफ क्लब और इन क्लब्स की संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है. साल में कई टेकफेस्ट और कल्चरल फेस्ट होते हैं जिसमें अक्सर ये छात्र बीजी रहते हैं.आईआईटी बॉम्बे का मूड इंडिगो फेस्टिवल तो भारत का सबसे बड़ा कल्चरल फेस्टिवल है. तो यह कत्तई नहीं कहा जा सकता है कि आईआईटीयन अनसोशल होते हैं तथा वे लाइफ को इंज्वाय नहीं करते. आईआईटी में छात्रों को विस्तृत और कठिन सिलेबस की वजह से बहुत फोकस्ड रहना पड़ता है स्कूल में जब आपको अपने किसी कठिन सब्जेक्ट से थोड़े समय के लिए ब्रेक लेना होता था तो आप लैंग्वेज या सोशल साइंस की पढ़ाई में जुट जाया करते थे लेकिन आईआईटी में बी.टेक के दौरान तो आपके पास वो ऑप्शन नहीं है. लोग यह मान बैठे हैं कि आईआईटी में 4 साल स्टूडेंट्स कठिन करिकुलम तथा सिलेबस की वजह से स्ट्रेस में पढ़ाई करते हैं. लेकिन ऐसा हरगिज नहीं है. आईआईटी में एक सेमेस्टर 4 महीने तक चलता है. स्टूडेंट्स पूरे साल पढ़ते ही नहीं रहते हैं. अधिकांश छात्र रिलैक्स मूड में स्टडी करते हुए 7 सीजीपीए तक मार्क्स स्कोर करते हैं. बहुत काम ही छात्र बीच में पढ़ाई छोड़ते हैं. सभी कॉलेज तथा इंस्टीट्यूट्स में आईआईटी का एक स्टैण्डर्ड सिलेबस होता है. इतना ही नहीं कुछ आईआईटी इंस्टीट्यूट मैनेजमेंट तथा ह्युमेनिटिज कोर्सेज को इलेक्टिव कोर्स के रूप में ऑफर करते हैं ताकि आप न केवल एक इंजीनियर बनने की योग्यता रखें बल्कि रूचि के अनुसार अन्य फील्ड में भी जा सकें. प्लेसमेंट के दौरान प्रत्येक आईआईटीयन को 1 करोड़ या उससे अधिक का पैकेज ऑफर किया जाता है आप अक्सर ऐसा आर्टिकल या न्यूज पढ़ते है जिसमें लिखा होता है कि आईआईटी छात्र को 1 करोड़ का पैकेज ऑफर किया जाता है.इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि प्रत्येक आईआईटीयन को इस तरह के प्रस्ताव मिलते हैं. यह कुछ ही मामलों में होता है. इनकी सैलरी का भी एक स्टैण्डर्ड पैकेज रेंज है. हर किसी को इतनी उंची छलांग का मौका नहीं मिलता.एनआईआरएफ की रिपोर्ट के मुताबिक आईआईट ग्रेजुएट्स की सैलरी प्रति वर्ष 7 से 10 लाख के बीच होती है. सभी आईआईटीयन इंजीनियर के रूप में काम करते हैं यह दुखद लेकिन सच्ची बात है कि अधिकांश आईआईटी ग्रेजुएट्स सिर्फ इंजीनियरिंग नौकरियों तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते हैं.आईआईटी बॉम्बे के 2013 प्लेसमेंट आंकड़े के अनुसार 45% बी.टेक छात्रों ने फायनेंस और कंसल्टिंग में जॉब ज्वाइन की.आईटी में 24% और एफएमसीजी और गैर-आईटी में 8% छात्र शामिल हुए.इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी में सिर्फ 22% छात्रों ने नौकरी ज्वाइन की. कई आईआईटीयन ग्रेड कॉर्पोरेट एनालिस्ट,मार्केटर्स, मैनेजर बन जाते हैं. कुछ छात्र तो इसके बाद एमबीए कर लेते हैं और भविष्य में उनके लिए बहुत सारे ऑप्शन खुल जाते हैं. कुछ अपना स्वयं का इंडस्ट्री शुरू कर लेते हैं. एक आईआईटीयन होना उतना मुश्किल नहीं है जितना कि लोग सोचते हैं. हर आईआईटीयन का अपने इंस्टीट्यूट में बिताये गए समय के प्रति एक अलग दृष्टिकोण तथा अनुभव है. लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि आईआईटी एग्जाम देने से पहले बिना किसी आईआईटीयन से बात किये भ्रमपूर्ण मिथकों पर विश्वास न करें. |
विशेषज्ञ के बारे में: मनीष कुमार ने वर्ष 2006 में आईआईटी, बॉम्बे से मेटलर्जिकल एंड मेटीरियल साइंस में ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की. उसके बाद इन्होंने जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, यूएसए से मटीरियल्स साइंस इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री प्राप्त की और फिर इंडियन स्कूल फाइनेंस कंपनी ज्वाइन कर ली, यहाँ वे बिजनेस स्ट्रेटेजीज एंड ग्रोथ की देख रेख करने वाली कोर टीम के सदस्य रहें. वर्ष 2013 में इन्होंने एसईईडी स्कूल्स की सह-स्थापना की. ये स्कूल्स भारत में कम लागत वाली के-12 एजुकेशन की क्वालिटी में सुधार लाने पर अपना फोकस रखते हैं ताकि क्वालिटी एजुकेशन सभी को मुहैया करवाई जा सके. वर्तमान में ये टॉपर.कॉम के प्रोडक्ट – लर्निंग एंड पेडागॉजी विभाग में वाईस प्रेसिडेंट हैं. |
Comments
All Comments (0)
Join the conversation