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दक्षिण चीन सागर में चीन की कैबेज स्ट्रेटेजी और भारत पर उसका प्रभाव

जनवरी 2018 के शुरुआती दिनों में  फिलीपींस ने चीन द्वारा साउथ चाइना सागर में एक मानव निर्मित द्वीप पर हवाई अड्डे के निर्माण पर स्पष्ट रूप से अपनी नाराजगी व्यक्त की थी. दक्षिण चीन सागर में बीजिंग के कृत्रिम द्वीपों के निर्माण और कैबेज स्ट्रेटेजी के तहत सैन्यीकरण पर हाल ही में चीन के अन्य समुद्री पड़ोसियों द्वारा दिक्कत महसूस करने के कारण इसका विरोध किया गया.

Jan 16, 2018 13:09 IST
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जनवरी 2018 के शुरुआती दिनों में  फिलीपींस ने चीन द्वारा साउथ चाइना सागर में एक मानव निर्मित द्वीप पर हवाई अड्डे के निर्माण पर स्पष्ट रूप से अपनी नाराजगी व्यक्त की थी. दक्षिण चीन सागर में बीजिंग के कृत्रिम द्वीपों के निर्माण और कैबेज स्ट्रेटेजी के तहत सैन्यीकरण पर हाल ही में चीन के अन्य समुद्री पड़ोसियों द्वारा दिक्कत महसूस करने के कारण इसका विरोध किया गया.

अतः कैबेज स्ट्रेटेजी क्या है ?चीन अपनी समुद्री सीमाओं का विस्तार करने के लिए इसका उपयोग कैसे कर रहा है और दक्षिण चीन सागर में बढ़ती चीन की उपस्थिति से भारत के हितों पर किस तरह प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा ? यह जानना जरुरी है.

चीन की कैबेज स्ट्रेटेजी

इसे 'सलामी-टुकड़ा करने की क्रिया (सलामी स्लाईसिंग)' रणनीति भी कहा जाता है. इस रणनीति के तहत, एक लड़ाकू क्षेत्र अपने प्रतिद्वंदी राष्ट्र से अपने बचाव के लिए कई सुरक्षा परतों से घिरा होता है. पर्यवेक्षकों के अनुसार, चीन लंबे समय से इस रणनीति को अपना रहा है.वह भारत, जापान, भूटान, फिलीपींस, जापान, मलेशिया और ब्रुनेई जैसे अपने पड़ोसी देशों के खिलाफ महासागरों में अपनी इस रणनीति को विस्तार दे रहा है.

दक्षिण चीन सागर में कैबेज स्ट्रेटेजी

दक्षिण चीन सागर पर चीन का दावा सदियों पुराना है.हालांकि, आधुनिक समय में पहली आधिकारिक दावा 1947 के पूर्व में की गई थी  जिसमें एक मानचित्र पर ग्यारह डैश से बने यू-आकार की रेखा के साथ अपने दावों को सीमांकित किया गया था. 1950 के दशक के शुरूआत में  टनिन की खाड़ी के चारों ओर प्रस्तावित लाइन के दो डैश को उत्तरी वियतनाम में कम्युनिस्ट सरकार को शांत करने के लिए हटा दिया गया था. इसके बाद  नौ-डैश लाइन नई स्लोप्वाइंट के रूप में उभरी है, जिसमें स्प्राटली और पैरासेल द्वीपों के दो समूहों को शामिल किया गया है .

1970 के दशक के शुरूआती दौर में कैबेज स्ट्रेटेजी के तहत चीन ने  नौ-डेश लाइन के द्वीपों को अपने नियन्त्रण में करने का निश्चय किया. जब 2013 में फिलीपींस ने नौ-डैश लाइन में चीन के क्षेत्रीय दावों को ख़ारिज करते हुए उसके लिए आर्बिट्रेशन के स्थायी कोर्ट से संपर्क किया,तो यह द्विपक्षीय / क्षेत्रीय मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छा गया.

जुलाई 2016 में  हेग स्थित पीसीए ने यह फैसला सुनाया कि दक्षिण चीन सागर पर चीन के अधिकारों का दावा करने हेतु उसके पास कोई कानूनी आधार नहीं था. इस दौरान यह भी बताया गया था कि इस क्षेत्र में संसाधनों पर चीन के दावे संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के लॉ ऑफ़ द सी (यूएनसीएलओएस) में दिए गए विशेष आर्थिक क्षेत्रों (ईईजेड) के साथ असंगत हैं. पीसीए ने यह भी निष्कर्ष निकाला है कि चीन ने फिलीपींस के स्वामित्व अधिकारों का उल्लंघन किया है और इस क्षेत्र में कृत्रिम द्वीपों का निर्माण कर  कोरल रीफ पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाया है.

हालांकि, चीन द्वारा इस फैसले को स्वीकार नहीं किया गया था. भारत ने इस फैसले के बारे में सावधानीपूर्वक जवाब देते हुए कहा कि दोनों देशों को शांतिपूर्ण तरीके और स्व-संयम का प्रयोग कर इसे सुलझाना चाहिए.

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भारत के लिए दक्षिण चीन सागर की प्रासंगिकता

यह क्षेत्र भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. 2006 में भारतीय तेल कंपनी ओएनजीसी विदेश को वियतनाम द्वारा तेल ब्लॉक - 128 का पता लगाने के लिए प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (पीएससी) से सम्मानित किया गया था. चूंकि यह ब्लॉक नौ-डैश लाइन के भीतर आता है, इसलिए इस क्षेत्र के बारे में चीन का दावा भारत के हितों के लिए हानिकारक साबित होगा.

एक अनुमान के अनुसार, एक साल में इस क्षेत्र में लगभग 5 खरब अमरीकी डालर के कारोबार होते हैं. सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया के साथ बढ़ते व्यापार संबंधों के कारण पिछले कुछ सालों से मलक्का स्ट्रेट और दक्षिण चीन सागर के माध्यम से भारत का व्यापार लगातार बढ़ रहा है. आसियान + राष्ट्रों के साथ क्षेत्रीय व्यापक ईकोनॉमिक साझेदारी (आरसीईपी) पर हस्ताक्षर करने के साथ ही व्यापार की मात्रा बढ़ने की उम्मीद है. इस क्षेत्र में राष्ट्रों के साथ द्विपक्षीय व्यापार को बनाए रखने के लिए  यह आवश्यक है कि इस क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय जल क्षेत्र को संघर्ष से मुक्त रखा जाय.

वस्तुतः  महासागर आर्थिक विकास की नई सीमाएं हैं. ब्लू इकॉनोमी ने भारत सहित भारत-प्रशांत क्षेत्र के देशों में अपना प्रभाव दिखाया है.एक उचित, न्यायसंगत और टिकाऊ तरीके से दक्षिण चीन सागर द्वारा प्रदत्त प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने के लिए  यह आवश्यक है कि कोई भी देश अकेले इस क्षेत्र के संसाधनों का उपयोग करने का पूरी तरह से दावा न करे.

उपरोक्त वाणिज्यिक और आर्थिक महत्व के अतिरिक्त, दक्षिण चीन सागर सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है.

पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार की लुक ईस्ट पॉलिसी को बरकरार रखते हुए  प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के  यूपीए -2 सरकार ने  एक्ट ईस्ट पॉलिसी का अनावरण किया है. एक्ट ईस्ट पॉलिसी में एशिया के दो विकास स्तम्भ भारत और आसियान देशों के बीच तेजी से सम्बन्ध कायम करने की योजना है .आसियान के साथ सदियों पुरानी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंधों को बनाए रखने के लिए  निर्बाध कनेक्टिविटी आवश्यक है. दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती सैन्य उपस्थिति एक्ट ईस्ट पॉलिसी के सफल कार्यान्वयन में अवरोध उत्पन्न कर सकता है.

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इस क्षेत्र में चीन का सामना करने के लिए भारत द्वारा उठाये गए हालिया कदम

2015 में  भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच वार्षिक द्विपक्षीय मालाबार नौसैनिक अभ्यास मंे तीसरे देश के रूप में जापान को शामिल किया गया था. स्थायी आधार पर जापान को शामिल करने से दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने में भारत को सहायता मिलेगी.

नवंबर 2017 में मनीला में एशियान शिखर सम्मेलन के अवसर पर  भारत और जापान तथा  अमेरिका और जापान ने 'क्वाड्रीग्रेटल ग्रुप' की पहली कार्य-स्तर की बैठक आयोजित की. इस क्षेत्र में चार लोकतांत्रिक राष्ट्रों की बैठक चीन के आक्रामक रुख का एक कारण बन सकता है.

निष्कर्ष
वस्तुतः चीन को अंतरराष्ट्रीय कानूनों और अपने समुद्री पड़ोसियों के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए. भारतीय नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती चीन के साथ अपने अच्छे संबंधों को खराब किए बिना दक्षिण चीन सागर में काउंटी के हितों की रक्षा करना है.

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