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मुस्लिम सुधार आन्दोलन

19 वीं सदी के आरम्भ में मुस्लिम उद्बोधन के चिन्ह उत्तर प्रदेश में बरेली के सर सैय्यद अहमद खां और बंगाल के शरीयतुल्ला के नेतृत्व में उभरकर सामने आये, ऐसा ईसाई मिशनरियों,पश्चिमी विचारों के प्रभाव और आधुनिक शिक्षा के कारण संभव हो सका| उन्होंने स्वयं को इस्लाम के शुद्धिकरण व उसे मजबूत बनाने और इस्लामिक शिक्षाओं के प्रोत्साहन के लिए समर्पित कर दिया था| शरीयतुल्ला ने बंगाल के फरायजी आंदोलन की शुरुआत की,जिसने कृषकों के हित में कई कदम उठाये थे|उन्होंने मुस्लिम समाज में प्रचलित जाति-व्यवस्था का तीव्र विरोध किया था|
Nov 26, 2015 16:17 IST
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19 वीं सदी के आरम्भ में मुस्लिम उद्बोधन के चिन्ह उत्तर प्रदेश में बरेली के सर सैय्यद अहमद खां और बंगाल के शरीयतुल्ला के नेतृत्व में उभरकर सामने आये|ऐसा ईसाई मिशनरियों,पश्चिमी विचारों के प्रभाव और आधुनिक शिक्षा के कारण संभव हो सका| उन्होंने स्वयं को इस्लाम के शुद्धिकरण व उसे मजबूत बनाने और इस्लामिक शिक्षाओं के प्रोत्साहन के लिए समर्पित कर दिया था|

शरीयतुल्ला ने बंगाल के फरायजी आंदोलन की शुरुआत की, जिसने कृषकों के हित में कई कदम उठाये थे| उन्होंने मुस्लिम समाज की जाति-व्यवस्था का तीव्र विरोध किया था|

शरीयतुल्ला ने बंगाल के फरायजी आंदोलन की शुरुआत की, जिसने कृषकों के हित में कई कदम उठाये थे| उन्होंने मुस्लिम समाज में प्रचलित जाति-व्यवस्था का तीव्र विरोध किया था| 19 वीं सदी के प्रथम पचास वर्षों के दौरान दिल्ली व कलकत्ता के कुछ मुट्ठी भर लोग ही अंग्रेजी शिक्षा हासिल कर पाए थे| अधिकांश मुस्लिमों ने स्वयं को अंग्रेजी शिक्षा से दूर ही रखा, जिसका कारण उलेमाओं व मुस्लिम काजियों का रवैया और उच्च मुस्लिम वर्ग की ब्रिटिश राज के साथ मेल-मिलाप बढाने के प्रति रूचि का न होना था| सन 1857 के विद्रोह में मुस्लिमों की सक्रिय भागीदारी ने ब्रिटिशों के मन में मुस्लिमों के प्रति असंतोष का भाव पैदा कर दिया|

फिर भी जागृत और शिक्षित मुस्लिमों का एक हिस्सा के नाते शरीयतुल्ला ने शासकों के प्रति सहयोगपूर्ण नीति को अपनाने और ब्रिटिशों की सहायता से मुस्लिम समाज की सामाजिक स्थिति में सुधार लाने की जरुरत महसूस की| आधुनिक शिक्षा के प्रसार और पर्दा व बहुविवाह जैसी सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए कुछ आन्दोलन भी चलाये गए थे| नवाब अब्दुल लतीफ़ (1828-1893) द्वारा 1863 ई. में स्थापित कलकत्ता की मोहम्मदन लिटरेसी सोसाइटी उन कुछेक प्रारंभिक संस्थाओं में से एक थी जिसने इस दिशा में कदम बढाये थे|इसने शिक्षा के प्रसार,विशेष रूप से बंगाल के मुस्लिमों के बीच,के साथ साथ हिन्दू-मुस्लिम एकता को भी बढावा दिया|

वहाबी आन्दोलन

इसे ‘वलीउल्लाह आन्दोलन’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसकी शुरुआत पश्चिमी प्रभावों की प्रतिक्रियास्वरुप हुई थी| यह आन्दोलन शाह वलीउल्लाह, जिन्हें प्रथम भारतीय मुस्लिम नेता भी माना जाता है, की शिक्षाओं से प्रेरित था| यह पूरा का पूरा आन्दोलन कुरान और हदीस की शिक्षाओं पर आधारित था|

अहमदिया आन्दोलन

इस आन्दोलन की शुरुआत मिर्ज़ा गुलाम अहमद द्वारा 1889 ई. में भारतीय मुसलमानों के बीच पश्चिमी शिक्षा के प्रसार के उद्देश्य से की गयी थी|यह आन्दोलन,ब्रहम समाज के समान,उदारवादी मूल्यों पर आधारित था|

देवबंद स्कूल

यह उदारवादी आन्दोलन के विरोध में कुछ रूढ़िवादी मुस्लिम उलेमाओं द्वारा शुरू किया गया आन्दोलन था जोकि कुरान और हदीस के आधार पर इस्लाम के वास्तविक सार की शिक्षा देना चाहता था और इन्होने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जिहाद की संकल्पना का भी प्रतिपादन किया|

निष्कर्ष

19वीं सदी न केवल हिन्दू-मुस्लिम बल्कि देश के संपूर्ण समाज के लिए जागरण का काल थी| इस काल में सभी धर्मों में धर्म के नाम पर प्रचलित कुप्रथाओं को दूर करने के लिए अनेक सुधारक सामने आये और भारतीय संस्कृति व दर्शन की महानता का प्रतिपादन किया| राष्ट्रीय गौरव, आत्म-सम्मान, आत्म-निर्भरता जैसे विचारों का प्रचार-प्रसार किया गया|