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हर्षवर्धन काल

हर्षवर्धन के साम्राज्य की राजधानी कन्नौज थी। उसने 606 ईस्वी से 647 ईस्वी तक शासन किया था। उसका साम्राज्य पंजाब से उत्तरी उड़ीसा तथा हिमालय से नर्मदा नदी के तट तक फैला हुआ था। हर्षवर्धन पुष्यभूति राजवंश से संबंध रखता था जिसकी स्थापना नरवर्धन ने 5वीं या छठी शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में की थी। यह केवल थानेश्वर के राजा प्रभाकर वर्धन (हर्षवर्धन के पिता) के अधीन था। पुष्यभूति समृद्ध राजवंश था और इसने महाराजाधिराज का खिताब प्राप्त किया था। हर्षवर्धन 606 ईस्वी में सिंहासन का उत्तराधिकारी बना था।
Sep 4, 2015 18:26 IST
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हर्षवर्धन पुष्यभूति राजवंश से संबंध रखता था जिसकी स्थापना नरवर्धन ने 5वीं या छठी शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में की थी। यह केवल थानेश्वर के राजा प्रभाकर वर्धन (हर्षवर्धन के पिता) के अधीन था। पुष्यभूति समृद्ध राजवंश था और इसने महाराजाधिराज का खिताब प्राप्त किया था। हर्षवर्धन 606 ईस्वी में 16 वर्ष की आयु में तब सिंहासन का उत्तराधिकारी बना था जब उसके भाई राज्यवर्धन की शशांक द्वारा हत्या कर दी गयी थी जो गौड और मालवा के राजाओं का दमन करने निकला था। हर्ष को स्कालोट्टारपथनाथ के रूप में भी जाना जाता था। सिंहासन पर बैठने के बाद उसने अपनी बहन राज्यश्री को बचाया और एक असफल प्रयास के साथ शशांक की तरफ बढा था।

अपने दूसरे अभियान में, शशांक की मौत के बाद, उसने मगध और शशांक के साम्राज्य पर विजय प्राप्त की थी। उसने कन्नौज में अपनी राजधानी स्थापित की। एक बड़ी सेना के साथ, हर्षवर्धन ने अपने साम्राज्य को पंजाब से उत्तरी उड़ीसा तथा हिमालय से नर्मदा नदी के तट तक विस्तारित किया।  उसने नर्मदा से आगे भी अपने साम्राज्य को विस्तारित करने की कोशिश की लेकिन ऐसा करने में वह विफल रहा था। उसे बादामी के चालुक्य राजा पुलकेसिन द्वितीय के हाथों हार का सामना करना पड़ा था।  बाणभट्ट द्वारा लिखित “हर्षचरित्र” हर्ष की अवधि में एक सफल दस्तावेज के रूप में मौजूद है। चीनी विद्वान ह्वेनसांग जिसने हर्ष के शासन के दौरान यहा का दौरा किया था, की रचनाओं में भी हर्ष और हर्ष की अवधि के दौरान के भारत, के बारे में काफी विस्तार से वर्णन किया गया है। 647 ईस्वी में हर्षवर्धन की मृत्यु के साथ ही उसके साम्राज्य का भी अंत हो गया।

प्रशासन

हर्ष के साम्राज्य में राजस्व को चार भागों में विभाजित किया गया था। पहला भाग राजा पर खर्च किया जाता था। दूसरा भाग विद्वानों पर खर्च किया जाता था। तीसरा भाग सरकारी कर्मचारियों पर खर्च किया जाता था और चौथे भाग को धार्मिक गतिविधियों पर खर्च किया जाता था।

सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था:

हर्ष के राज्य का दौरा करने वाले ह्वेनसांग के अनुसार, भारतीय समाज में जातीय व्यवस्था अस्तित्व में थी। इसके अलावा कई मिश्रित और उप जातियों का भी उदय हुआ था। ह्वेनसांग ने अछूत और जातिच्युत के अस्तित्व का भी उल्लेख किया है। इस अवधि के दौरान महिलाओं की स्थिति में भी काफी गिरावट आई थी। लेकिन फिर भी महिलाएं पुरुषों के अधीन नहीं मानी जाती थी। धार्मिक क्षेत्र में ब्राह्मणवाद का प्रभुत्व बौद्ध धर्म के पतन का कारण बना था। वैष्णव, शैव और जैन धर्म भी अस्तित्व में थे। हर्ष को उदार और धर्मनिरपेक्ष राजा माना जाता था। राजस्व का मुख्य स्रोत भूमि की उपज का छठा हिस्सा होती थी। कुछ अन्य कर बंदरगाहों,  घाटों आदि पर लगाए गए थे। शाही भूमि से प्राप्त लाभ, खदानों और जागीरदारी से अर्जित शाही खजाना भी राजस्व के स्त्रोत थे।

महत्वपूर्ण हस्तियां:

हर्षवर्धन के शासनकाल के दौरान दो महत्वपूर्ण हस्तियां थीं।

क) बाणभट्ट हर्ष के दरबार में एक कवि थे। उन्होंने हर्षवर्धन की जीवनी 'हर्षचरित' की रचना की जिसमें उन्होंने विस्तृत जानकारी के साथ हर्ष की शक्ति के उदय तक की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख किया है। यह संस्कृत भाषा में लिखित थी। उन्होंने 'कादम्बरी' नामक एक नाटक भी लिखा था।

ख) ह्वेनसांग जो एक चीनी तीर्थयात्री था उसने भी हर्ष के साम्राज्य का दौरा किया था। चीन वापस जाने के बाद एक उसने 'शि-यू-की' (पश्चिम की दुनिया) नामक एक पुस्तक लिखी थी। हर्षवर्धन के साथ-साथ ह्वेनसांग ने अपनी पुस्तक में दो अन्य राजाओं- पल्लव वंश के नरसिंह वर्मन और चालुक्य वंश के पुलकेसिन द्वितीय की भी प्रशंसा की थी। वह अफगानिस्तान के माध्यम से मध्य एशिया में आया था और उसी मार्ग के माध्यम से वापस चला गया। ह्वेनसांग ने नालंदा में अध्ययन किया था और बाद में नौ वर्षों तक वहां शिक्षण भी किया था।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • हर्षवर्धन, सीखने वालों के लिए एक महान संरक्षक था और उसने खुद संस्कृत नाटकों, नागनंद, रत्नावली और प्रियदर्शिका की रचना की थी।
  • उसने कई विश्राम गृहों और अस्पतालों का निर्माण करवाया था।
  • ह्वेनसांग ने कन्नौज में आयोजित भव्य सभा के बारे में उल्लेख किया है जिसमें बीस राजाओं, चार हजार बौद्ध भिक्षुओं और तीन हजार जैन तथा ब्राह्मणों ने भाग लिया था।
  • हर्ष हर पांच साल के अंत में, प्रयाग (इलाहाबाद) में महामोक्ष हरिषद नामक एक धार्मिक उत्सव का आयोजन करता था। यहां पर वह दान समारोह आयोजित करता था।
  • हर्षवर्धन ने अपनी आय को चार बराबर भागों में बांट रखा था जिनके नाम--शाही परिवार के लिए, सेना तथा प्रशासन के लिए, धार्मिक निधि के लिए और गरीबों और बेसहारों के लिए थे।
  • ह्वेनसांग के अनुसार, हर्षवर्धन के पास एक कुशल सरकार थी। उसने यह भी उल्लेख किया है कि वहां परिवार पंजीकृत नहीं किये गये थे और कोई बेगार नहीं था। लेकिन नियमित रूप से होने वाली डकैती के बारे में उसे शिकायत थी।  
  • पुलकेसिन द्वितीय के हाथों हर्षवर्धन की हार का उल्लेख ऐहोल शिलालेख (कर्नाटक) में किया गया है। वह पहला उत्तर भारतीय राजा था जिसे दक्षिण भारतीय राजा के हाथों पराजय का सामना करना पड़ा था।

महत्वपूर्ण घटनाएँ

  • वर्धन वंश की स्थापना पांचवी सदी के अंत या छठी शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ के आसपास नरवर्धन द्वारा की गयी थी।
  • हर्षवर्धन अपने बड़े भाई राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद सोलह साल की उम्र में 606 ईस्वी में सिंहासन पर आसीन हुआ था।
  • हर्ष ने अपनी बहन राज्यश्री को छुड़ाया था जिसे शशांक ने उसके पति ग्रहवर्मन की हत्या के बाद बंदी बना लिया था।
  • ह्वेनसांग ने 631 ईस्वी में हर्ष के दरबार का दौरा किया था।
  • हर्ष को 637 ईस्वी में पुलकेसिन द्वितीय से हार का सामना करना पड़ा था।
  • 643 ईस्वी में ह्वेनसांग के लिए कन्नौज में भव्य सभा का आयोजन किया गया था।
  • 647 ईस्वी में हर्ष का निधन हो गया था।