भूकंप पृथ्वी की सतह का एक कंपन है जो पृथ्वी की सतह के नीचे चट्टानों में लचक या समस्थानिक समायोजन के कारण होता है. यह मानवजनित या प्राकृतिक गतिविधियों के कारण भी हो सकता है. यानी जब धरती की प्लेटें टकराती हैं तब भूकंप आता है. जब पृथ्वी की बाहरी परत में अचानक से हलचल होने लगती है जिसके कारण ऊर्जा उत्पन्न होती है. यह उर्जा प्रथ्वी की सतह पर भूकंपी तरंगों को उत्पन्न करती हैं जिसके कारण भूमी हिलने लगती है और भूकंप आ जाता है.
क्या आप जानते हैं कि भूकंप की लहरें किसी क्षेत्र से टकराने से पहले उस क्षेत्र के वातावरण में रेडॉन गैस की मात्रा बढ़ जाती है? रेडॉन गैस का बढ़ना दर्शाता है कि यह क्षेत्र भूकंप की चपेट में आने वाला है. इस पर विभिन्न अध्ययन किए गए हैं और निष्कर्ष निकाला गया है कि मिट्टी या भूजल में रेडॉन गैस की उच्च सांद्रता एक आने वाले भूकंप के संकेत हो सकते हैं.
जिस बिंदु पर भूकंपीय तरंगें उत्पन्न होती हैं उसे भूकंप का 'फोकस' (Focus) कहा जाता है, यह पृथ्वी की सतह से नीचे होता है. जबकि, वह स्थान जो फोकस के ऊपर लंबवत होता है, पृथ्वी की सतह पर जहाँ पहली बार भूकंप के झटके महसूस किए जाते हैं, ' एपिसेंटर' (Epicentre) कहलाता है. फोकस से अलग होने वाली ऊर्जा को 'इलास्टिक एनर्जी' (Elastic Energy) के रूप में जाना जाता है.
भूकंप आने के क्या कारण हो सकते हैं?
भूकंप आने के कारण प्राकृतिक घटना या मानवजनित कारण हो सकते हैं. ऐसा देखा गया है कि अक्सर भूकंप भूगर्भीय दोषों के कारण आते हैं.
भूकंप की भविष्यवाणी तथा भूकंप का प्रभाव
भूकंपीय तरंगें (Seismic Waves) क्या हैं?
भूकंप के दौरान उत्पन्न होने वाली तरंगों को भूकंपीय तरंगों के रूप में जाना जाता है. उन्हें 3 प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:
1. प्राथमिक या अनुदैर्ध्य तरंगों (Longitudinal waves) को पी-वेव्स (P-Waves) के रूप में भी जाना जाता है: ये अनुदैर्ध्य तरंगें ध्वनि तरंगों के अनुरूप होती हैं.
2. माध्यमिक या अनुप्रस्थ तरंगों (Transverse Waves) को एस-वेव्स (S-Waves) के रूप में भी जाना जाता है: ये प्रकाश तरंगों के अनुरूप ट्रांसवर्सल (transversal) तरंगें हैं.
3. सरफेस या लॉन्ग पीरियड (Long period Waves) वेव्स जिन्हें L-Waves के नाम से भी जाना जाता है: वे तब उत्पन्न होती हैं जब ‘P’ वेव सतह से टकराती हैं.
सीस्मोग्राफ (Seismograph) क्या है?
वह उपकरण जो भूकंपीय तरंगों के प्रति संवेदनशील होता है और भूकंप की तीव्रता को मापने में मदद करता है, उसे सीस्मोग्राफ कहा जाता है. अलग-अलग पैमाने हैं जिनका उपयोग भूकंप की तीव्रता को मापने के लिए किया जाता है वे हैं रॉसी-फ़ोरेल स्केल (Rossi-Forel Scale), मरकेली स्केल (Mercalli Scale) और रिक्टर पैमाना (Richter Scale).
इसके अलावा, हम आपको बता दें कि समान भूकंपीय तीव्रता वाले क्षेत्रों में शामिल होने वाली रेखाओं को आइसोसिस्मल रेखाएं (Isoseismal lines) कहा जाता है और उन स्थानों से जुड़ने वाली रेखाएं जो एक ही समय में भूकंप के झटके का अनुभव करती हैं, होमोसिस्मल रेखाओं (Homoseismal lines) के रूप में जानी जाती हैं.
पृथ्वी पर विभिन्न भू-आकृतियों का निर्माण कैसे होता है?
भारत में भूकंपीय ज़ोन की सूची (List of Earthquake (Seismic) Zones in India)
पिछले भूकंपीय इतिहास के आधार पर, भारतीय मानक ब्यूरो ने देश को चार भूकंपीय क्षेत्रों अर्थात् ज़ोन-II, ज़ोन-III, ज़ोन-IV और ज़ोन-V में वर्गीकृत किया है. इन सभी चार क्षेत्रों में, ज़ोन-V सबसे भूकंपीय सक्रिय क्षेत्र है जहाँ ज़ोन-II सबसे कम है.
भूकंपीय क्षेत्र (Seismic Zone) | एम.एम स्केल पर तीव्रता (Intensity on M.M Scale) |
ज़ोन-II (कम तीव्रता वाला क्षेत्र) (Low Intensity Zone) | 6 (or less) |
ज़ोन-III (मध्यम तीव्रता क्षेत्र) (Moderate Intensity Zone) | 7 |
ज़ोन-IV (गंभीर तीव्रता क्षेत्र) (Severe Intensity Zone) | 8 |
ज़ोन-V (बहुत गंभीर तीव्रता क्षेत्र) (Very Severe Intensity Zone) | 9 (and above) |
भारत में भूकंपीय ज़ोन के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र (Regions that fall under the Earthquake (seismic) Zones in India)
ज़ोन-V में पूरे पूर्वोत्तर भारत, जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्से, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और गुजरात के कच्छ के कुछ हिस्से, उत्तर बिहार और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के कुछ हिस्से शामिल हैं.
ज़ोन- IV में जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के शेष भाग, केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से, गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्से, तथा पश्चिमी तट के पास महाराष्ट्र के छोटे हिस्से शामिल हैं.
ज़ोन-III में केरल, गोवा, लक्षद्वीप द्वीप समूह, उत्तर प्रदेश, गुजरात और पश्चिम बंगाल के शेष भाग, पंजाब के कुछ हिस्से, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखंड के कुछ हिस्से, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक शामिल हैं.
ज़ोन-II में देश के बचे शेष हिस्से शामिल हैं.
भारत का भूकंपीय ज़ोनिंग मैप भारत में सबसे कम, मध्यम और साथ ही सबसे खतरनाक या भूकंप से प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करने में मदद करता है. इसके अलावा, ऐसे नक्शों का उपयोग या वृद्धि भवन के निर्माण से पहले किया जाता है ताकि किसी विशेष क्षेत्र में भूकंपीयता के स्तर की जांच की जा सके. लंबे समय में, यह जीवन बचाने में भी मदद करता है.
तो अब आपको भारत में भूकंपीय ज़ोन के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों के बारे में ज्ञात हो गया होगा.
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