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भूकंपीय तरंगें एवं उनका व्यवहार

हम जानते हैं कि भूकंप आने से पृथ्वी में कम्पन उत्पन्न होता है, जिसके परिणामस्वरूप भूकंपीय तरंगें उत्पन्न होती है. लेकिन क्या आपको पता है कि वास्तव में भूकंपीय तरंगें कितने प्रकार की होती हैं और इसका व्यवहार कैसा होता है? यदि आप इस प्रश्न के उत्तर से अनभिज्ञ हैं तो इस लेख को पढ़कर अवश्य जान जाएंगे.
Dec 20, 2017 18:34 IST
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Seismic Waves
Seismic Waves

हम जानते हैं कि भूकंप आने से पृथ्वी में कम्पन उत्पन्न होता है, जिसके परिणामस्वरूप भूकंपीय तरंगें उत्पन्न होती है. लेकिन क्या आपको पता है कि वास्तव में भूकंपीय तरंगें कितने प्रकार की होती हैं और इसका व्यवहार कैसा होता है? यदि आप इस प्रश्न के उत्तर से अनभिज्ञ हैं तो इस लेख को पढ़कर अवश्य जान जाएंगे.

भूकंपीय तरंगें (Seismic Waves)

जब भूकंप अपने भूकंप केन्द्र से प्रारंभ होता है तो तीन प्रकार की तरंगें उत्पन्न होती हैं, जिसका विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:
1. “पी” तरंगें (P-Waves): इन्हें प्राथमिक तरंगें (Primary Waves) भी कहा जाता है. ये तरंगें ध्वनि तरंगों की भांति अनुदैर्ध्य तरंगें (Longitudinal Waves) होती हैं, क्योंकि इनमें संचरण (Propagation) तथा कणों का दोलन एक ही सीध में होता है. इन तरंगों से दबाव पड़ता है, अतः इन्हें दबाव वाली तरंगें (Compressional Waves) भी कहते हैं. इनकी औसत गति 8 किमी. प्रति सेकेण्ड होती है. किन्तु अधिक घनत्व वाली चट्टानों में इन तरंगों की गति 8 से 14 किमी. प्रति सेकेण्ड होती है. परीक्षणों से पता चलता है कि प्राथमिक तरंगें भूकंप अधिकेन्द्र से ठीक 21 मिनट में अपने विपरीत वाले धरातलीय भाग – प्रतिध्रुवस्थ (Antipodal Point) पर पहुंच जाती हैं. इनकी गति सभी भूकंपीय तरंगों में सर्वाधिक होती है जिस कारण ये तरंगें किसी स्थान पर सबसे पहले पहुंचती हैं. ये तरंगें ठोस, तरल तथा गैस तीनों माध्यमों से गुजर सकती है.
2. “एस” तरंगें (S-waves): इन्हें गौण तरंगें (Secondary waves) अथवा अनुप्रस्थ तरंगें (Transverse Waves) भी कहते हैं. इन तरंगों की संचरण दिशा तथा कणों के दोलन की दिशा एक-दूसरे के समकोण पर होती हैं. इन तरंगों की औसत गति 4 किमी. प्रति सेकेण्ड होती है. ये तरंगें केवल ठोस माध्यम से ही गुजर सकती हैं, जबकि तरल माध्यम में लुप्त हो जाती है.
3. “एल” तरंगें (L-Waves): इन्हें धरातलीय या लम्बी तरंगों (Surface or Long Waves) के नाम से भी जाना जाता है. इन तरंगों की खोज H. D. Love ने की थी, इसलिए इन्हें Love Waves के नाम से भी जाना जाता है. ये तरंगें मुख्यतः धरातल तक ही सीमित रहती हैं. ये तरंगें ठोस, तरल तथा गैस तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं. इनकी गति 3 किमी. प्रति सेकेण्ड होती है.

भूकंपीय तरंगों का व्यवहार

1. सभी भूकंपीय तरंगों का वेग अधिक घनत्व वाले पदार्थों में से गुजरने पर बढ़ जाता है तथा कम घनत्व वाले पदार्थों में से गुजरने पर बढ़ जाता है.
2. पृथ्वी के आन्तरिक भाग में चट्टानों का घनत्व बढ़ जाने से भूकंपीय तरंगों के वेग में भी वृद्धि हो जाती है.
3. भू-पृष्ठ पर P-तरंगों की गति लगभग 7 किमी. प्रति सेकेण्ड तथा S-तरंगों की गति लगभग 5 किमी. प्रति सेकेण्ड होती है. लेकिन 1000 किमी. की गहराई पर P-तरंगों की गति 11 किमी. प्रति सेकेण्ड तथा S-तरंगों की गति 6 किमी. प्रति सेकेण्ड हो जाती है.
4. पृथ्वी पर भूकंपीय तरंगों की सबसे अधिक गति 2900 किमी. की गहराई पर होती है. जहां P-तरंगों की गति 13.7 किमी. प्रति सेकेण्ड तथा S-तरंगों की गति 7.3 किमी. प्रति सेकेण्ड होती है.
5. 2900 किमी. की गहराई से पृथ्वी का क्रोड शुरू होता है. इस गहराई पर P-तरंगों की गति में आश्चर्यजनक रूप से कमी होती है और यह गति घट कर 8.4 किमी. प्रति सेकेण्ड रह जाती है. इसका कारण यह है कि क्रोड के तल पर पहुंचने पर P-तरंगें बड़े पैमाने पर परावर्तित और अपवर्तित होती हैं. लगभग 5000 किमी. की गहराई पर P-तरंगों की गति में पुनः परिवर्तन होता है, क्योंकि यहां बाह्य क्रोड समाप्त होता है और आन्तरिक क्रोड शुरू होता है.   
भूकंपों का वर्गीकरण

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