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UP Board Class 10 Science Notes : Metals and Non Metals Part-III

May 3, 2017 16:26 IST
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Find UP Board class 10th Science notes on metals and non metals;third part. Here we are providing each and every notes in a very simple and systematic way. Many students find science intimidating and they feel that here are lots of thing to be memorised. However Science is not difficult if one take care to understand the concepts well.The main topic cover in this article is given below :

1. अपचयन

2. प्रगलन

3. गालक

4. एलुमिनियम द्वारा अपचयन

5. विधुत – अपघटन द्वारा अपचयन

6. धातुओं का शोधन

7. बेसेमरीकरण

8. परावर्तनी भट्ठी

9. वात्या भट्ठी

10. मफ़ल भट्ठी

अपचयन :

सांद्रित अयस्क से मुक्त धातु प्राप्त करने की कुछ सामान्य विधियाँ निम्नलिखित हैं-

1. प्रगलन – इस विधि में उच्च ताप पर अयस्क का अपचयन गलित धातु में होता है| भर्जित या निस्तापित अयस्क में विद्यमान अगलनीय अशुद्धियों को गलाकर दूर करने की प्रक्रिया को प्रगलन कहते हैं| इसमें भर्जित या निस्तापित अयस्क में उचित गालक (flux) तथा कोक मिलाकर मिश्रण को उच्च ताप पर गलाने पर अगलनीय अशुद्धियाँ धातुमल के रूप में पृथक हो जाती हैं जो पिघली धातु के ऊपर तैरती हैं|

2. उदाहरणार्थ – कॉपर पाइराइट से कॉपर का निष्कर्षण करने में, भर्जित अयस्क में क्वार्ट्ज (SiO2) तथा कोक मिलाकर मिश्रण को वात्या भट्ठी में प्रगलित करने पर निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं|

chemical reaction of ions

गालक -  वे पदार्थ जो अयस्क में उपस्थित अशुद्धियों के साथ उच्च ताप पर क्रिया करके इन्हें सरलता से गलाकर अलग होने वाले पदार्थों के रूप में दूर कर देते हैं, गालक कहलाते हैं| सरलता से गलकर अलग होने वाले पदार्थों को धातुमल (slag) कहते हैं| गालक निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं-

(i) अम्लीय गालक – जब भर्जित अयस्क में क्षारीय अशुद्धियाँ होती हैं तो अम्लीय गालक प्रयुक्त करते हैं; जैसे – SiO2

(ii) क्षारीय गालक – जब भर्जित अयस्क में अम्लीय अशुद्धियाँ होती हैं तो क्षारीय गालक प्रयुक्त करते हैं; जैसे – CaO

2. एलुमिनियम द्वारा अपचयन – यह प्रक्रम गोल्डस्मिट एलुमिनोथमिर्क प्रक्रम कहलाता है| यह प्रक्रम उन धातुओं पर लागू किया जाता है जिनके गलनांक अत्यन्त उच्च होते है तथा जिन्हें इनके आक्साइडो से निष्कर्षित करना होता है| इनका कोक द्वारा अपचयन (प्रगलन) सम्भव नहीं होता है| इस विधि में सांद्रित अयस्क तथा एलुमिनियम चूर्ण (जिसे थर्माईट कहा जाता है) के मिश्रण को एक स्टील की क्रुस्बिल में लेकर रेत की सतह पर रख दिया जाता है| अभिक्रिया का प्रारम्भ एक ज्वलनशील मिश्रण (मैग्नीशियम चूर्ण तथा बेरियम पराक्साइड) के प्रयोग से होता है|

3. विधुत – अपघटन द्वारा अपचयन – यह प्रक्रम धातुओं, क्षारीय मृदा धातुओं, एलुमिनियम आदि अधिक क्रियाशील धातुओं के लिए प्रयुक्त किया जाता है ये धातुएँ गलित अवस्था में अपने आक्साइडो, हाइड्राक्साइडो अथवा क्लोराइडो के विधुत – अपघटन द्वारा निष्कर्षित की जा सकती हैं| सोडियम धातु का निष्कर्षण NaCI तथा का CaCI2 के गलित मिश्रण के विधुत अपघटन से (डाउन प्रक्रम) अथवा गलित सोडियम हाइड्राक्साइड के विधुत – अपघटन से (कास्टनर प्रक्रम) किया जा सकता है| क्रायोलाईट में मिश्रित एलुमिना के विधुत अपघटन से एलुमिनियम प्राप्त किया जा सकता है|

4. अमलगम विधि – इस प्रक्रम द्वारा उत्कृष्ट धातुएँ; जैसे – सोना, चाँदी आदि निष्कर्षित की जाती हैं| महीन पिसे हुए अयस्क को मर्करी के सम्पर्क में लाने से उसमें उपस्थित धातु मर्करी से क्रिया करके धातु अमलगम बनाती है|  धातु अमलगम का आसवन करने से मुक्त धातु प्राप्त होती है|

धातुओं का शोधन :

इस प्रकार से प्राप्त धातुएँ सामान्य रूप से अशुद्ध होती हैं और उनमें अन्य धातुएँ, धात्विक आक्साइड, सिलिका, फासफ़ोर्स, कार्बन आदि अशुद्धियाँ उपस्थित रहती हैं| इन अशुद्धियों को दूर करके शुद्ध धातु प्राप्त करने की अनेक विधियाँ हैं| जैसे – आसवन, द्रवण, आक्सीकरण, विधुत – अपघटन, अमलगम, वाष्प प्रावस्था आदि| अधिकतर धातुओं का शोधन धातु के विलेय लवण के विधुत – अपघटन द्वारा किया जाता है|

1. विधुत – अपघटनी विधि – इस विधि में अशुद्ध धातु का एनोड  तथा शुद्ध धातु का कैथोड बनाते हैं| उसी धातु के किसी घुलनशील लवण का विलयन विधुत अपघट्य के रूप में प्रयुक्त किया जाता है| विधुत अपघटन करने पर शुद्ध धातु कैथोड पर एकत्र हो जाती हैं, जबकि अशुद्धियाँ या तो घुल जाती है या एनोड के नीचे कीचड़ के रूप में गिर जाती हैं| कॉपर, सिल्वर, टिन, लेड, एलुमिनियम तथा क्रोमियम आदि धातुएँ इसी विधि से शुद्ध की जाती है|

2. द्रवण विधि – इस विधि में कम गलनांक की धातुओं (जैसे – टिन) को गलाकर ढालू तल पर बहने दिया जाता है जिससे अशुद्धियाँ पीछे रह जाती है तथा धातु बह कर पृथक हो जाती है|

3. आसवन विधि – वाष्पशील धातुओं (जैसे –Hg, Zn आदि) को आसवन द्वारा शोषित किया जाता है|

4. खर्परण विधि – इसमें अशुद्ध धातु को वायु की उपस्थिति में गर्म किया जाता है जिससे धातु में उपस्थित अशुद्धियाँ आक्सीकृत होकर वाष्प के रूप में पृथक ह जाती है तथा शुद्ध धातु शेष रह जाती है| खर्परण विधि सिल्वर में उपस्थित लेड को पृथक करने में प्रयोग की जाती है|

5. बेसेमरीकरण – अशुद्ध धातु को एक भट्ठी में गगम किया जाता है तथा गलित द्रव्यमान पर वायु का तेज झोका छोड़ा जाता है| अशुद्धियाँ आक्सीकृत हो जाती हैं|  उदाहरणार्थ – पिग आयरन को एक प्रावर्तनी भट्ठी में लेकर वायु प्रवाहित करने पर अशुद्धियाँ आक्सीकृत हो जाती हैं|

metals and non metals

भट्ठी वह उपकरण है जिसमें इंधनों को जलाकर अथवा विधुत का प्रयोग करके उच्च ताप उत्पन्न किया जाता है तथा इनका उपयोग धातुओं के निष्कर्षण में किया जाता है| भट्ठियाँ अनेक प्रकार की होती हैं| कुछ प्रमुख भट्ठियों का वर्णन निम्नलिखित है-

1. परावर्तनी भट्ठी – यह भट्ठी अग्निसह ईंटो की बनी होती है इसमें गर्म किए जाने वाला अयस्क सीधे ज्वाला के सम्पर्क में नहीं आता है|

metals and non metal first diagram

UP Board Class 10 Science Notes : Metals and Non Metals Part-I

इस भट्ठी के तीन भाग होते है|-

(i) अग्नि सह – यहाँ ईंधन को जलाकर ऊष्मा प्राप्त की जाती है|

(ii) भट्ठी का तल – इसे चुल्हा (hearth) कहते हैं| यहाँ पर गर्म किया जाने वाला पदार्थ, अर्थात बारीक पिसा हुआ अयस्क रखा जाता है|

(iii) चिमनी -  यहाँ से व्यर्थ गैसें निष्कासित होती हैं|

परावर्तनी भट्ठी निस्तापन तथा भर्जन क्रियाओं के लिए अत्यन्त उपयोगी है| इसमें आक्सीकरण तथा अपचयन दोनों प्रकार की क्रियाएँ कराई जा सकती हैं|

2. वात्या भट्ठी – यह भट्ठी एक ऊँची मीनार की भाँती होती है| वात्या भट्ठी की उंचाई 25 से 60 मीटर तथा व्यास 6 से 8 मीटर होता है| इस भट्ठी के तीन मुख्य भाग होते हैं – हापर, भट्ठी की बॉडी तथा बॉस एवं चुल्हा| इसमें  अयस्क और कोक मिलाकर गर्म करते हैं| वात्या भट्ठी का उपयोग तांबा, लोह आदि धातुओं की निष्कर्षण में किया जाता है|

metals non metals third diagram

इस भट्ठी के तीन भाग होते हैं|

(i) हापर – इसके द्वारा घान (charge) भट्ठी में डाला जाता है| हापर में कप और कोन (cup and cone) व्यवस्था लगी होती है|

(ii) बॉडी और बॉश – यह दो कोंन्स (cons) से मिलकर बना होता है| ऊपर वाले लम्बे कोन को बॉडी तथा निचले छोटे कोन को बॉश कहते हैं| बॉडी तथा बॉश की प्लेटों से बने होते हैं| इनके भीतर अग्निसह ईंटों का अस्तर लगा रहता है| बॉडी के ऊपरी भाग में अपशिष्ट गैसों के निकलने का द्वार होता है तथा बॉश के निचले सिरे में ट्विटर (tuyers) लगे होते हैं जिनके द्वारा गर्म वायु भट्ठी में झोंकी जाती है|

UP Board Class 10 Science Notes : Methods of preparation, properties and uses of some salts part-I

(iii) चुल्हा  - इसमें गलित पदार्थ एकत्रित होता है| यह भट्ठी के सबसे निचले हिस्से में होता है| इसमें दो निकास द्वार (tap holes)  होते हैं| ऊपरी द्वार से धातुमल और निचले द्वार से गलित धातु को बाहर निकाला जा सकता है|

3. मफ़ल भट्ठी – इस भट्ठी में गर्म किया जाने वाला पदार्थ ईंधन या ज्वाला या गर्म गैसों या इंटों के सीधे सम्पर्क ने नही आता है| यह उच्च ताप – सह (refractory) ईंटों के बने हुए एक कक्ष में रहता है, जिसे मफ़ल कहते हैं| मफ़ल ईंधन की ज्वाला तथा गर्म गैसों द्वारा गर्म होता है| इस भट्ठी का उपयोग प्राय : जिंक के निष्कर्षण में होता है|

metals non metals forth diagram

UP Board Class 10 Science Notes : Metals and Non Metals Part-II

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