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इस्लामिक बैंकिंग क्या है और भारत को इससे कैसे फायदा होगा?

भारत क्षमताओं से भरा है और इस्लामिक बैंकिंग मुस्लिम आधार और देश के अप्रयुक्त संसाधनों का प्रयोगकर देश के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है.

Jul 21, 2017 14:00 IST
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Islamic Banking
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भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इस्लामिक बैंकिंग अपेक्षाकृत नया शब्द है क्योंकि इस संबंध में बहुत अधिक चर्चा नहीं हो रही है. इस बात का उल्लेख करना यहां ठीक रहेगा कि आरबीआई ने भारत में बैंकिंग की इस प्रणाली को शुरु करने का एक प्रस्ताव रखा है. कुछ लोगों ने इसका स्वागत किया है जबकि कुछ ने इसका जबरदस्त विरोध किया है.

 इस्लामिक बैंकिंग है क्या?

हमने निकट भविषय में शुरु होने वाली बैंकिंग की नई शैली के बारे में चरणबद्ध तरीके से काफी चर्चा की है लेकिन इनकी वास्तविक प्रकृति की व्याख्या करना अभी भी बाकी है. इस्लामिक बैंकिंग शरीयत कानून का अनुपालन करने वाली बैंकिंग गतिविधि को दर्शाता है. इससे बैंकिंग गतिविधियों और इस्लामिक वित्त में शरीयत के कानूनों का व्यावहारिक रूप से लागू किए जाने का संकेत मिलता है. इसका अधिक उपयुक्त नाम होता– 'शरीयत अनुवर्ती बैंकिंग (शरीयत कम्प्लाइअन्ट बैंकिंग)'.

इस प्रकार की बैंकिंग का मुख्य सिद्धांत है यह लोगों को दिए गए ऋण पर ब्याज लेने से रोकता है.  इस्लाम में इसे ‘रीबा’ माना जाता है. दूसरी तरफ, जो चीज इस्लाम में निषिद्ध हैं जैसे शराब, पोर्क (सुअर का मांस) आदि बैंकिंग की इस प्रणाली के माध्यम से वित्तपोषण नहीं किया जाना चाहिए.

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अब सवाल यह उठता है कि यह प्रणाली काम कैसे करेगी क्योंकि इसमें ब्याज से आमदनी नहीं होती? बैंक ऋण से होने वाले लाभ पर फलते– फूलते हैं लेकिन यहां तो ऐसा कुछ भी नहीं है. वास्तव में, इस्लामिक बैंकिंग लाभ और हानि को साझा करने की अवधारणा पर आधारित है. यह कहता है कि आप अनुचित ब्याज अर्जित नहीं कर सकते लेकिन आप निवेशक की ओर से इच्छित जोखिम के तत्व के साथ किए गए निवेश से उचित लाभ कमा सकते हैं. इसलिए इस्लामिक बैंक वहां पैसा देने को आजाद है जहां ब्याज की बजाय लाभ और हानि हो. बैंक इस लाभ को इक्ट्ठा करता है और उसे ऐसी जगह निवेश करता है जो शरीयत के अनुसार हो जैसे शरियत– बॉन्ड आदि. इस तरह, यह कमाई कर सकता है और काफी समय तक बना रह सकता है.

इस्लामिक बैंकिंगः विकास को समझना

इस्लामिक बैंकिंग मलेशिया में ताबुंग हाजी (Tabung Haji) नाम के वित्तीय संगठन से प्रेरित है जिसने तीर्थयात्रा के लिए ब्याजमुक्त पैसे की जरूरत की मांग को देखते हुए इस प्रवृत्ति की शुरुआत की थी. वर्ष 1963 में, बैंक 1281 जमाकर्ताओं के साथ शुरु हुआ था और जल्द ही इनकी संख्या बढ़ कर 8 लाख हो गई थी. इसके बाद, इस्लामिक बैंक मिस्र में लोकप्रिय हो गए. हाल के वर्षों में विश्व में शरीयत–अनुवर्ती बैंकिंग को बढ़ावा देने के विचार के साथ इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक का विकास हुआ है.

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इस्लामिक बैंकिंग और भारत : आगे की राह

आरबीआई ने हाल ही में एक राय रखी है कि परंपरागात बैंकों में अलग इस्लामिक बैंकिंग विंडो होना चाहिए ताकि हमारे देश में इस्लामिक बैंकिंग को बढ़ावा दिया जा सके. लेकिन यह अवधारणा हमारे देश में कितनी प्रासंगिक है? भविष्य में इस प्रकार की बैंकिंग को किस प्रकार के मुद्दों का सामना करना पड़ सकता है? भारत में इस नए प्रकार की बैंकिंग को सेंटर स्टेज पर देखने से पहले इन मुद्दों को सुलझाए जाने की जरूरत है.

  • बैंकिंग विनियमन अधिनियम में संशोधन किए जाने की जरूरत हैः सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि भारत में इस्लामिक बैंकिंग को शुरु किया जाता है तो प्रचलित बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 को बदलने की जरूरत होगी. यह ऋण के लिए ब्याज लेना बैंकों के लिए प्राथमिक गतिविधि बताता है लेकिन इस्लामिक बैंकिंग में इसकी इजाजत बिल्कुल नहीं है.
  • वित्तीय समावेशन का यह एक अवसर हैः भारत देश में वित्तीय समावेशन को प्राप्त करने के लिए हर संभव कार्य कर रहा है. अभी तक बड़ी संख्या में मुस्लिम बैंकिंग सेवाओं द्वारा कवर नहीं किए गए हैं. इस तरीके से भारत में वित्तीय समावेशन प्राप्त करने की दिशा में बहुत बड़ा कदम उठाया जाएगा.
  • निवेश के लिए इस्लामिक बैंकिंग बड़ा अवसर हैः ऐसा इसलिए है क्योंकि इसका ज्यादातर हिस्सा अप्रयुक्त है. भारत में मुस्लिमों की आबादी बहुत अधिक है और विश्व अर्थव्यवस्था में इस्लामी वित्त का हिस्सा करीब 1% है. यदि ये लोग बिना ब्याज वाले ऋण को लेने के लिए आगे आते हैं, तो नौकरियों के और अधिक अवसर पैदा किए जाएंगे और अंत में भारत में प्रति व्यक्ति आमदनी के कारण उच्च जीडीपी होगी.
  • भारतीय शेयर बाजार इसके लिए तैयार हैः भारतीय शेयर बाजार इस्लामिक बैंकिंग के लिए तैयार है क्योंकि ये पाकिस्तान, मलेशिया आदि जैसे देशों के मुकाबले शरीयत का कहीं अधिक पालन करते हैं. सदियों पुराने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में तो इस उद्देश्य के लिए अलग से इस्लामी वित्त प्रशिक्षण केंद्र भी है.
  • भारतीय बैंकिंग क्षेत्र इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैः इस्लामी बैंकिंग परंपरागत बैंकिंग से बिल्कुल अलग है. यह ब्याज से होने वाली आमदनी की बजाय लाभ और हानि पर आधारित है. इस संदर्भ में इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि बैंकिंग क्षेत्र इसका आदि नहीं है और इस अवधारणा को लागू करने और समझने में समय लगेगा. हालांकि, क्रमवार तरीके से की जाने वाली शुरुआत भारत के लिए अधिक नुकसानदायक नहीं होगा.
  • यह भारतीय मुसलमानों को उद्यमी बनाने का तरीका हैः साधारण सी वजह यह है कि बैंकों से लिए गए ऋण पर आपको ब्याज नहीं देना होता. आपको सिर्फ उचित परियोजना कार्यान्वयन योजना तैयार करने की जरूरत है और आप ऋण लेने के लिए बैंक के पास जा सकते हैं. यह आपके सपनों के स्टार्टअप व्यापार को स्थापित करने में मददगार होगा.
  • यह मुस्लिम समुदाय के विशाल संसाधनों का दोहन करेगाः हमारे देश में समुदाय के पिछड़ेपन के कारण उनके पास रखा पैसा कभी भी बैंकिंग प्रणाली में शामिल नहीं हो पाता. इस्लामिक बैंकिंग इसे बदल सकता है और इस तरह पैसे का परिसंचरण बढ़ेगा. इस्लामिक बैंकिंग समुदाय के संसाधनों का दोहन करने का अवसर देता है. भारत को विभिन्न क्षेत्रों में बड़े निवेश हेतु पैसों की जरूरत है और उनके लिए पैसे जुटाने हेतु यह स्वागत योग्य अवसर हो सकता है.
  • यह बड़ी इंडस्ट्री है और भारत को इसका लाभ उठाने की जरूरत हैः अनुमान के अनुसार, विश्व में इस्लामिक वित्त उद्योग करीब 3 बिलियन डॉलर का है और वर्ष 2020 तक यह दुगना होने जा रहा है. बड़े मुसलमान आबादी के साथ भारत के पास इस उत्पाद को शुरु करने का बहुत अच्छा अवसर है ताकि धार्मिक सोच के कारण परंपरागत बैंकिंग से दूर रहने वाले ज्यादा– से– ज्यादा लोग भारत में इसका लाभ उठा सकें.

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भारत के लिए इस्लामिक बैंकिंग अपेक्षाकृत नई अवधारणा है. हालांकि, इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि गैर–मुसलमान देश होने के बावजूद चीन, अमेरिका, यूके आदि ने इस संदर्भ में काफी प्रगति की है. भारत क्षमताओं से भरा है और इस्लामिक बैंकिंग मुस्लिम आधार और देश के अप्रयुक्त संसाधनों का प्रयोगकर देश के लिए काफी फायदेमंद होने जा रहा है. केंद्रीय बैंक का यह कदम सही दिशा में है और आने वाले वर्षों में इसकी रुपरेखा तैयार करने की जरूरत है ताकि इसकी राह आसान हो सके. इस्लामिक बैंकिंग भविष्य है और भारत इससे काफी लाभ कमा सकता है.

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