तारीखें बदलती जाती हैं और बीतते जाते हैं साल। कल की ही बात लगती है, जब दुनिया 21वींसदी के स्वागत को आतुर थी। देखते-देखते गुजर गए दस बरस। इस दशक में ऐसा भी हुआ, जिसने बदल दी दुनिया और इसके बाशिंदों की जिंदगी भी। कैसे, बता रहे है मनीष त्रिपाठी..
अमेरिका पर आतंकी हमला
अधिकांश वैश्विक घटनाओं की तारीख तलाशने के लिए ज्ञानकोश खंगालने पडते हैं, लेकिन 9/11 अमेरिका और एशिया के माथे पर दुर्भाग्य के शाश्वत चिह्न के रूप में अंकित हो गया। 19 अल-कायदा आतंकवादियों द्वारा हाईजैक किए गए चार जहाजों में से तीन ने 11 सितंबर 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर (न्यूयार्क) और पेंटागन (वाशिंगटन) पर हमला किया, जबकि चौथा पेन्सिलवेनिया के पास बिना किसी को नुकसान पहुंचाए क्रैश हो गया।
इन हमलों में 2,976 लोगों की मौत हो गई और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने आतंकी हमलों के सूत्रधार ओसामा बिन लादेन तथा अल-कायदा के पोषक तालिबान को नेस्तनाबूत करने के लिए अफगानिस्तान पर आक्रमण की घोषणा की। आज नौ साल बाद अमेरिका में शासक दल और राष्ट्राध्यक्ष दोनों ही बदल चुके हैं, लेकिन अफगानिस्तान में जंग जारी है। 21वींशताब्दी के इस सबसे महंगे युद्ध (अब तक लागत लगभग 300 अरब डॉलर) में अमेरिका और ब्रिटेन के हजारों फौजी मारे जा चुके हैं, अफगानिस्तान तबाह हो चुका है, लेकिन ओसामा का कोई अता-पता नहीं।
शीर्षस्थ शब्द
द ग्लोबल लैंग्वेज मॉनीटर के अनुसार 9/11 इस दशक में इस्तेमाल किए गए शब्दों में शीर्ष पर रहा है।
दोहराया इतिहास
11 सितंबर 2001 को अल-कायदा का अमेरिका पर हमला अप्रत्याशित नहींथा। इससे पूर्व 12 अक्टूबर 2000 को इसी संगठन के आतंकियों ने विस्फोटकों से भरे एक समुद्री जहाज से अमेरिकी समुद्री जहाज यूएसएस कोल को टक्कर मारी थी। इसमें 17 अमेरिकी नाविक मारे गए थे। 9/11 को भी अल-कायदा ने यही तरीका आजमाया, फर्क बस इतना था कि टक्कर तैरते हुए नहीं, उडते हुए जहाजों से मारी गई!
सो गई पूरब की बेटी
क्या अकालमृत्यु का पूर्वाभास हो जाता है? दक्षिण एशिया की दो प्रमुख राजनीतिज्ञों के उदाहरणों से तो ऐसा ही लगता है। 31अक्टूबर, 1984 को अंगरक्षकों की गोलियों से शहीद हुईं भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इस हादसे से कुछ समय पहले ही उडीसा में एक रैली में कहा था, यदि मेरी जान भी चली जाती है, तो मेरे खून का एक-एक कतरा देश के काम आएगा।
वर्ष 2007 के नवंबर महीने में कुछ ऐसी ही बात मैं अपनी जान को खतरे में डालकर लौटी हूं, क्योंकि मेरा मुल्क खतरे में है। बेनजीर भुट्टो ने कही थी और 27 दिसंबर 2007 को रावलपिंडी में उनकी हत्या कर दी गई। दो बार पाकिस्तान की प्रधानमंत्री (1988-1990 तथा 1993-1996) रहीं बेनजीर ने संसदीय एवं प्रांतीय चुनावों के संबंध में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की रैली को संबोधित करके अपने वाहन में प्रवेश किया ही था कि एक आत्मघाती हमलावर ने गोलियां बरसाने के बाद खुद को भी बम से उडा लिया। पूरब की बेटी कहलाने वाली बेनजीर की मौत पर खूब सियासत हुई।
दुर्भाग्य के पडोसी
बेनजीर भुट्टो अपने पिता जुल्फिकार अली भुट्टो का अनुसरण करते हुए राजनीति में आईं और दोनों की जान इसी ने ली। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रह चुके जुल्फिकार को फांसी दी गई थी, जबकि बेनजीर आत्मघाती हमले में मारी गईं। देखा जाए, तो भारतीय उपमहाद्वीप के दो प्रसिद्ध राजनीतिक परिवारों गांधी और भुट्टो की त्रासदी एक जैसी रही है। श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनकी राजनीतिक विरासत संभालने वाले राजीव गांधी भी बेनजीर की तरह आत्मघाती हमले का शिकार हुए थे। वे श्रीपेरुंबदूर में एक रैली को संबोधित करने पहुंचे थे, जबकि बेनजीर रावलपिंडी में रैली को संबोधित कर लौट रही थीं!
चालू हो गई महामशीन
..थी तो यह मानव सभ्यता की सबसे बडी वैज्ञानिक परियोजना, लेकिन भूत-चुडैल और गड्ढे में गिरे बच्चों की खबर परोसने के आदी मीडिया चैनलों ने इसे दशक की सबसे बडी सनसनी बना दिया। 2008 की दूसरी छमाही में हर जुबान पर एक ही बात थी कि क्या महामशीन का चालू होना महाप्रलय को न्यौता देना है? दरअसल फ्रांस और स्विट्जरलैंड की सीमा पर जमीन के 100 मीटर भीतर 27 किलोमीटर परिधि में फैली वृत्ताकार सुरंगनुमा लार्ज हैडरॉन कोलाइडर में नाभिकीय कणों-मूलत: प्रोटॉन-की आपस में प्रकाश की गति से टक्कर और इससे प्राप्त ऊर्जा का अध्ययन हो रहा है। इस अध्ययन में दुनिया भर से जुटे वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि अगर वे इन प्रयोगों से एंटीमैटर की अवधारणा को पुष्ट कर पाए, तो अक्षय ऊर्जा का सस्ता मार्ग भी खुल जाएगा। वैज्ञानिकों की मानें तो महामशीन से डरने की कोई बात नहीं है, क्योंकि इसमें प्रोटॉन कणों की धारा को नियंत्रित करने के लिए नौ हजार से ज्यादा विशालकाय चुंबक लगे हुए हैं, जिन्हें ठंडा रखने के लिए 10 हजार टन से ज्यादा लिक्विड नाइट्रोजन इस्तेमाल किया जा रहा है। 10 सितंबर 2008 को चालू होने के बाद लार्ज हैडरॉन कोलाइडर अब तक दो बार बंद हो चुकी है। एक बार तकनीकी समस्या थी और दूसरी बार अटक गया था ब्रेड का चूरा!
खर्च हुआ है महामनी
लार्ज हैडरॉन कोलाइडर पर लगभग चार अरब यूरो की लागत आई है। इसके कलपुर्र्जो की कीमत लगभग 3 अरब यूरो है, जबकि इनको जोडने, रखरखाव और स्टाफ पर अभी तक आया खर्च है एक अरब यूरो। इससे प्राप्त आंकडों के विश्लेषण के लिए एक नई इंटरनेट प्रणाली विकसित की गई है, जो मौजूदा सार्वजनिक इंटरनेट से हजारों गुना तेज और केवल वैज्ञानिक उपयोग के लिए है।
चेहरों पर चढे नकाब
21वीं शताब्दी का पहला दशक वैश्विक महामारियों के नाम रहा और विडंबना यह थी कि भयभीत लोगों के पास इलाज के नाम पर केवल मॉस्क थे। वर्ष 2002 में चीन में सार्स ने दस्तक दी, जो मात्र एक साल में दुनिया के 37 देशों में दहशत का पर्याय बन गया। इसकी खोज करने वाले विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के डॉक्टर कार्लो अर्बानी तक इससे नहीं बच सके और 2003 में इसे डब्ल्यूएचओ द्वारा वैश्विक महामारी घोषित कर दिया गया। इसी साल अमेरिका और यूरोप में मैड काउ डिजीज दोबारा फैली तथा सुदूर पूर्व एशिया में बर्ड फ्लू भडक उठा। नतीजा यह कि लाखों मवेशियों और पक्षियों को मौत के घाट उतार दिया गया। 2005 में इंडोनेशिया में इंसानों में बर्ड फ्लू का पहला मामला सामने आया और इसी साल यह बीमारी यूरोप और अफ्रीका तक फैल गई। 2008 में भारत में बर्ड फ्लू के कई मामले सामने आए और पश्चिम बंगाल में पोल्ट्री इंडस्ट्री को जबरदस्त नुकसान हुआ।
ताबडतोड फैलती महामारियों का सरगना साबित हुआ मार्च, 2009 में मैक्सिको से फैला स्वाइन फ्लू, जिसके सामने पूरी दुनिया असहाय नजर आ रही है। 11 दिसंबर 2009 को प्रकाशित डब्लूएचओ के आधिकारिक आंकडों के अनुसार यह रोग अब तक 208 देशों में 9,596 जानें ले चुका है। गंभीर बात यह है कि अब इसके वायरस एच1एन1 ने अपना बाहरी प्रोटीन कवच बदल लिया है, जिसकी वजह से इसकी इकलौती काट टैमीफ्लू भी उतनी कारगर नहींरह गई है। दहशत के इस दौर में अच्छी खबर है तो बस यह कि व्यक्तिगत साफ-सफाई, सामुदायिक जागरूकता और संक्रमण के प्रति सतर्कता से इसे रोका जा सकता है!
मेल में मर्ज
21वीं शताब्दी के पहले दशक में आतंकवादियों ने बीमारियों को भी अपना हथियार बनाया। 9/11 के बाद कई अमेरिकी प्रतिष्ठानों और व्यक्तियों को भेजी गई चिट्ठियों में एंथ्रेक्स वायरस था, जिसकी वजह से 5 लोगों की जान गई, कई बीमार हुए और असंख्य इस सदमे से ग्रस्त हो गए कि कहींउनकी डाक में बीमारी तो नहीं!
हथियारों की आड में हमला
अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में अपने दोनों कार्यकालों में जॉर्ज डब्ल्यू. बुश का पसंदीदा जुमला था वीपेन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन (डब्ल्यूएमडी) और इन्हीं तथाकथित जनसंहारक हथियारों की तलाश के नाम पर अमेरिका ने 20 मार्च 2003 को इराक पर हमला बोल दिया। 9 अप्रैल 2003 को इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की सरकार को गिरा दिया गया और 13 दिसंबर, 2003 को तिकरित शहर के एक घर में छुपे हुए सद्दाम को अमेरिकी सैनिकों द्वारा पकड लिया गया। उन पर कई मामलों में मुकदमा चलाया गया। दुजैल नरसंहार के अभियुक्त के रूप में सुनवाई के बाद सद्दाम हुसैन को 30 दिसंबर 2006 को बगदाद में फांसी दे दी गई।
30 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक की लागत और लगभग ढाई लाख लोगों की जान लेने वाली इस जंग के बावजूद इराक में जनसंहारक हथियार तो नहीं मिले, उलटे अबू गरीब के कैदखाने में इराकी बंदियों से अमानवीय व्यवहार करते अमेरिकी फौजियों की तस्वीरों और वीडियो ने खुद अमेरिकी नागरिकों में आक्रोश को जन्म दे दिया। अब जबकि 2010 में इराक में आम चुनाव होने वाले हैं, अरब देशों के सैटेलाइट नेटवर्क पर एक नया चैनल दिख रहा है, जिस पर सद्दाम हुसैन के भाषण और प्रशस्तिगीत प्रसारित हो रहे हैं!
दहशत में देश
अगर 9/11 अमेरिकी इतिहास का काला पन्ना है, तो 21वीं शताब्दी के पहले दशक को भारतीय इतिहास में काले अध्याय के रूप में याद किया जाएगा। इसकी शुरुआत हुई 13 दिसंबर 2001 को जब भारत की संसद पर लश्कर-ए-तोयबा और हिज्बुल मुजाहिदीन के पांच हथियारबंद आतंकियों ने हमला बोल दिया। संसद भवन के परिसर में खून की होली खेलते आतंकियों को नाकाम करने में सात सुरक्षाकर्मी शहीद हुए। इस साजिश में चार लोग मुहम्मद अफजल गुरु, शौकत हुसैन, अफसां गुरु और प्रोफेसर सैय्यद अब्दुल रहमान गिलानी गिरफ्तार किए गए। गिलानी और अफसां गुरु बरी हो गए, शौकत को मिली मौत की सजा घटाकर 10 साल कैद कर दी गई, जबकि मुहम्मद अफजल गुरु को सजा-ए-मौत सुनाई गई, जो अभी राष्ट्रपति के पास क्षमायाचिका में विचाराधीन है।
27 फरवरी 2002 को अयोध्या से लौट रही साबरमती एक्सप्रेस को गुजरात के गोधरा में आग लगा दी गई। इस हादसे में 59 कारसेवकों की मौत के बाद गुजरात में भडके हिंदू-मुस्लिम दंगों में 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए। इसी साल आतंकवादियों ने गुजरात में अक्षरधाम मंदिर और जम्मू में रघुनाथ मंदिर पर हमला किया। 25 अगस्त 2003 को मुंबई में दो कार बम धमाकों में 44 लोग मरे और 150 से अधिक घायल हुए। 29 अक्टूबर 2005 को दिल्ली में हुए श्रृंखलाबद्ध धमाकों में 62 लोग मरे और 250 से अधिक घायल हुए। 11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में 15 मिनट के भीतर सात बम विस्फोट हुए, जिनमें 210 लोग मारे गए।
26 नवंबर 2008 को मुंबई में सशस्त्र आतंकवादियों ने न केवल 200 से अधिक देशी-विदेशी नागरिकों की हत्या कर दी, बल्कि खुलेआम युद्ध की स्थिति उत्पन्न कर दी। भारतीय इतिहास में प्रत्यक्ष आतंकवादी हमले की इस सबसे बडी वारदात (जिसे अब 26/11 कहा जाता है) का एकमात्र पकडा जा सका जीवित अभियुक्त अजमल कसाब इस समय हिरासत में है!
मंदी की ग्लोबल मार
शुरुआती झटके तो 2001 में ही लगने लगे थे, लेकिन 2007-09 के बीच दुनिया भर के बाजारों में आई मंदी से दिग्गज वित्तीय संस्थान और कंपनियां ताश के महलों की तरह ढह गए। पिंक स्लिप और स्टिमुलस पैकेज शब्दकोश से निकलकर आम जिंदगी का हिस्सा बन गए। एक तरफ वैश्विक अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो रही थी, स्टॉक मार्केट गोता खा रहे थे, वहीं बचत आधारित घरेलू अर्थव्यवस्था के कारण भारत बडे झटकों से तो बचा ही रहा, छठे वेतन आयोग द्वारा अभूतपूर्व वेतनवृद्धि की संस्तुतियों को स्वीकार कर केंद्र सरकार ने कमाल कर दिया!
ओबामा का उदय
4 नवंबर 2008 को बराक ओबामा संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के 44वें राष्ट्रपति चुने गए। उनका नारा यस वी कैन अमेरिकी राजनीति में परिवर्तन का संवाहक बन गया और उन्हें न केवल अश्वेत अमेरिकी नागरिकों, बल्कि दुनिया भर के लिए आशा का प्रतीक बना दिया।
कुदरत का कहर
2000 अफ्रीका में बाढ और बारिश से 10 लाख से अधिक लोग बेघर हुए।
2001, 26 जनवरी को गुजरात में आए भीषण भूकंप में 3,000 से अधिक लोग मारे गए।
2003, 26 दिसंबर को ईरान में आए भूकंप में 26,000 से अधिक की मौत हुई।
2004, 26 दिसंबर को दक्षिणपूर्व एशिया और अफ्रीका में सुनामी से लगभग एक दर्जन देशों में दो लाख से अधिक की जान गई।
2005 8 अक्टूबर को कश्मीर और गुलाम कश्मीर में आए भूकंप में 80,000 से अधिक लोगों की मौत हुई।
अमेरिका के न्यू ऑरलियंस में कट्रीना चक्रवात का कहर। 1,500 से अधिक की मौत।
2007 कैलीफोर्निया के जंगलों में लगी आग से 2000 परिवार तबाह।
2008 12 मई को चीन में भीषण भूकंप। 80,000 से अधिक की मौत।
18 अगस्त को कोशी नदी में आई बाढ से बिहार में 35 लाख से अधिक लोग प्रभावित।
यह भी थीं बातें खास
2000 झारखंड, छत्तीसगढ और उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आए।
बरेली की प्रियंका चोपडा मिस वर्ल्ड बनीं।
भारत की आबादी एक अरब से अधिक हुई।
2001 जॉर्ज डब्ल्यू. बुश अमेरिकी राष्ट्रपति बने।
एनरॉन के साथ ही अमेरिकी इतिहास में दिवालिया हुई सबसे बडी कंपनी।
भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण स्िटग ऑपरेशन की जद में आए। कैमरे में रिकॉर्ड हुई घूसखोरी।
2002 एपीजे अब्दुल कलाम राष्ट्रपति बने।
रिलायंस के संस्थापक धीरूभाई अंबानी का देहावसान।
अमेरिकी पत्रकार डैनियल पर्ल की पाकिस्तान में अपहरण के बाद हत्या।
मॉस्को में चेचेन आतंकियों का हमला। 120 बंधकों की मौत।
2003 स्पेस शटल कोलंबिया ध्वस्त। कल्पना चावला सहित सात की मौत।
2004 चंदन तस्कर वीरप्पन मारा गया।
मेजर राज्यवर्धन सिंह राठौड ने एथेंस ओलंपिक में निशानेबाजी का रजत पदक जीता।
मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने।
2005 जिन्ना की तारीफ से मुश्किल में फंसे आडवाणी ने भाजपा अध्यक्ष पद छोडा।
महमूद अहमदीनेजाद ईरान के राष्ट्रपति बने।
लंदन में आतंकी हमला। 50 की मौत।
2006 भारत-अमेरिका में परमाणु संधि हुई, जॉर्ज बुश की भारत यात्रा।
लेबनान में इजरायल-हिजबुल्ला संघर्ष में 1,007 की मौत।
2007 प्रतिभा पाटिल राष्ट्रपति पद पर पहुंचने वाली प्रथम महिला बनीं।
भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में पहुंचीं।
2008 टाटा कंपनी ने सबसे सस्ती कार नैनो पेश की। अभिनव बिंद्रा ने बीजिंग ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता।
2009 फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर को आठ ऑस्कर पुरस्कार मिले। मनमोहन सिंह पुन: प्रधानमंत्री बने।
दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाया।
सात हजार करोड रुपए से अधिक के सत्यम घोटाले का पर्दाफाश। आर. राजू गिरफ्तार।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा करोडों के घोटाले में गिरफ्तार।
पॉप स्टार माइकल जैक्सन का निधन।
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