19 अप्रैल 2016 को हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने शिमला नगरनिगम के अधिकार क्षेत्र में बंदरों को हिंसक पशु घोषित करने पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया.
बंदर का हिंसक पशु होने का अर्थ है राज्य की राजधानी में कोई भी व्यक्ति कहीं भी बिना किसी सरकारी अनुमति को इन्हें मार सकता है. इससे बंदरों की आबादी में बहुत अधिक गिरावट आएगी.
इसके अलावा खंडपीठ ने सचिव, केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, राज्य के मुख्य सचिव और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के सदस्य– सचिव को छह सप्ताह के भीतर अपना जवाब देने का निर्देश दिया है.
यह नोटिस चीफ जस्टिस मंसूर अहमद मीर और जस्टिस त्रिलोक सिंह चौहन ने पशु कार्यकर्ता राजेश्वर सिंह नेगी द्वारा इस संबंध में दायर याचिका की सुनवाई के दौरान जारी की थी.
याचिका में क्या कहा गया है?
• अपनी याचिका में नेगी ने केंद्र सरकार के 14 मार्च 2016 की अधिसूचना को चुनौती दी थी.
• 14 मार्च की अधिसूचना में केंद्र सरकार ने शिमला नगरनिगम के अधिकार क्षेत्र में बंदरों को छह महीने के लिए हिंसक पशु घोषित करने के राज्य सरकार के अनुरोध को स्वीकार किया था.
• यह अनुरोध शिमला में बंदरों द्वारा संपत्ति और फसलों के नुकसान को देखते हुए स्वीकार किया गया था.
• उन्होंने तर्क दिया कि यह अधिसूचना वन्यजीव और पर्यावरण की सुरक्षा के बारे में और संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार, जिसके दायरे में पशु भी आते हैं, संवैधानिक जनादेश की अवहेलना है.
• याचिकाकर्ता ने यह दलील भी दी कि हिंसक व्यवहार के लिए बंदरों को मारना इस समस्या का समाधान नहीं है। इसके बजाए इससे निपटने के लिए वैज्ञानिक पद्धति का इस्तेमाल किया जा सकता है.
• राज्य में जंगली सुअरों और नील गाय को हिंसक पशु घोषित किए जाने के बाद बंदर, हिंसक पशु घोषित किए जाना वाला तीसरी प्रजाति हैं.
• जनवरी 2011 में हाई कोर्ट ने किसानों को बंदरों को गोली मारने की अनुमति पर रोक लगा दिया था. यह रोक अभी भी जारी है.
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