भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) ने 3 अगस्त 2014 को अपनी प्राथमिक रिपोर्ट में महाराष्ट्र के पुणे के अंबेगांव तालुका के मालिन गांव में हुए भूस्खलन के लिए वनों की कटाई और खेती के लिए भूमि को समतल करने (भूमि को समतल करने के लिए भारी मशीनों का प्रयोग) को वजह बताया है. जीएसआई अपनी रिपोर्ट बीस दिनों में सरकार को सौंपेगी.
अपनी रिपोर्ट में जीएसआई ने धान की खेती के लिए अधिक पानी का इस्तेमाल और साथ में हुई भारी बारिश को पश्चिमी घाट की तलहटी में बसे मालिन गांव में भूस्खलन के लिए जिम्मेदार बताया है. इस भूस्खलन ने 30 जुलाई 2014 को मालिन गांव को मलबे में तब्दील कर दिया और इसमें कम–से–कम 180 लोगों की जानें गई थी.
अपनी सिफारिशों में विशेषज्ञों ने इस इलाके में तत्काल धान की खेती रोकने का प्रस्ताव दिया है. इससे आसपास की पहाड़ियों में ऐसी घटनाओं को रोकने में मदद मिलेगी.
पश्चिमी घाट पर कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट में पारिस्थितिकीय संवेदनशील इलाकों में मालिन गांव को इस इलाके के तीन सबसे अधिक जोखिम वाले गांवों में से एक बताया गया है.
पश्चिमी घाटों में विकासात्मक गतिविधियों पर रिपोर्ट देने की लिए बनी पिछली समितियों में माघव गडगिल समिति एक है. केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने वर्ष 2009 में पश्चिमी घाटों में तथाकथित विकासात्मक गतिविधियों के प्रभावों के अध्ययन के लिए एक समिति गठित की थी जिसके अध्यक्ष पर्यावरण विज्ञानी माघव गडगिल थे. इस पैनल को इलाके के अनुसार विकासात्मक परियोजनाओं के प्रकार की सिफारिश करने को कहा गया था.
अगस्त 2011 में समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी जिसमें पश्चिमी घाटों को तीन श्रेणियों में बांटा गया था और वे हैं–
क) पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ईसीजेड) I
ख) पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ईसीजेड) II
ग) पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ईसीजेड) III
- ईसीजेड– I के लिए– अपनी सिफारिशों में सरकार को वर्ष 2016 तक अपनी सभी खनन गतिविधियों को बंद करने का सुझाव दिया था.
- ईसीजेड– II के लिए– सरकार को खनन के लिए नए खनन अनुमति और कोयला आधारित बिजली संयंत्र जैसे प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगो की अनुमति देने से मना किया गया था.
- ईसीजेड– III के लिए– इसने भूमि उपयोग में परिवर्तन का प्रस्ताव दिया था. रिपोर्ट में कृषि से गैर– कृषि इस्तेमाल की तरफ बढ़ने को कहा गया था. रिपोर्ट ने ईसीजेड– III के लिए सरकार को उद्योगों, बुनियादी ढांचा और पर्यटन परियोजनाओं के विकासकर्ताओं से पर्यावरण और सामाजिक आर्थिक परिवर्तन को कम करने की दिशा में कदम उठाने के लिए कहने को भी कहा था.लेकिन सरकार ने गडगिल समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों को बहुत कठोर कहकर मानने से इनकार कर दिया था.
राज्य सरकार के दवाब में आकर केंद्र ने एक बार फिर से नई समिति गठित की जिसके अध्यक्ष भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पूर्व अध्यक्ष के. कस्तूरीरंगन थे.
के. कस्तूरीरंगन समिति ने अपनी रिपोर्ट में ईसीजेड I में पूरे पश्चिमी घाटों के 67% को कम कर 37% करने की सिफारिश की. बहुत अधिक प्रतिबंधक और आर्थिक विकास के लिहाज से सही नहीं होने की वजह बताकर राज्य सरकार के इन सिफारिशों का विरोध किया फलस्वरुप केंद्र सरकार भी सिफारिशों पर अमल नहीं कर पाई.

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