हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत और किराना घराने के गायक पंडित भीमसेन जोशी का महाराष्ट्र के पुणे में 24 जनवरी 2011 को निधन हो गया. पंडित भीमसेन जोशी ने गुरू सवाई गंधर्व (पंडित रामभाऊ कुंडगोलकर) के दिशा-निर्देशन में संगीत की शिक्षा प्राप्त की थी. खयाल गायकी पंडित जी की विशेषता थी. खयाल गायकी के अलावा भजन, ठुमरी, दादरा और नाट्य संगीत पर भी पंडितजी की बारीक़ पकड़ थी. वर्ष 1985 में उन्होंने केंद्रीय लोक सेवा संचार परिषद द्वारा बनाए गए और पीयूष पांडे द्वारा लिखित मिले सुर मेरा तुम्हारा गाया. मिले सुर मेरा तुम्हारा में पंडितजी के अलावा लता मंगेशकर, एम बालमुरलीकृष्णन और सुचित्रा मित्र ने भी अपनी आवाज दी थी, जबकि संगीत दिया था अशोक पत्की ने. वर्ष 2008 में पंडितजी को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था.
पंडित भीमसेन जोशी पूरिया कल्याण, शुद्ध कल्याण, पूरिया धना श्री, मुल्तानी, हिंडोल, ललित, मियां मल्हार, मियां की तोड़ी, खंभावती, विभास, जयजयवंती, अभोगी, जौनपुरी, भीम पलास, दरबारी, रामकली इत्यादि रागों के माहिर थे. पंडितजी ने कुछ दुर्लभ हो रहे अल्प प्रचलित रागों जैसे पटमंजरी, सुहा सुघराई, भिन्न षडज, मल्हुआ केदार और खंभावती को भी आम लोगों के बीच सहज और यादगार बनाया.
ठुमरी के उस्ताद अब्दुल करीम खान को पंडित भीमसेन जोशी अपना मानसिक गुरु मानते थे. ग्वालियर दरबार के उस्ताद हाफिज अली खां से भी पंडित जी ने सुर की कई बारीकियां सीखीं. ध्रुपद संगीत के मंगतराम से जालंधर में कुछ दिनों तक शिक्षा ली.
पंडित भीमसेन जोशी का जन्म 4 फरवरी 1922 को कर्नाटक के धारवाड़ जिले के गडग में हुआ था. 19 वर्ष की आयु में पंडितजी ने गंगूबाई हंगल के गांव हंगल में मंच पर पहला गायन प्रस्तुत किया. पंडितजी ने लखनऊ स्टूडियो में एक रेडियो कलाकार के तौर पर भी काम किया. 22 वर्ष की आयु में एचएमवी म्यूजिक कंपनी ने कन्नड़ और हिन्दी भक्ति संगीत का उनका पहला एलबम निकाला. कर्नाटक सरकार ने पंडितजी के निधन पर एक दिन के राजकीय शोक की घोषणा की, साथ ही उनकी याद को संजोए रखने हेतु 10 करोड़ रु. अनुदान की घोषणा की.
भारत में शास्त्रीय संगीत की दो प्रमुख विधाएं हैं – हिन्दुस्तानी और कर्नाटक. ये दोनों ही गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वाह करती हैं. इसी परंपरा के तहत पंडितजी ने वर्ष 1953 में पुणे में सवाई गंधर्व संगीत उत्सव आरंभ किया था.
पंडित भीमसेन जोशी ने प्रयोग करके दो नए राग विकसित किए थे – कलाश्री (कलावती और रागेश्री का संयुक्त रूप) और ललितभटीयार (ललित और भटियार राग का संयुक्त रूप). परंपरा में रहते हुए भी पंडितजी ने प्रयोग और सृजनात्मकता पर हमेशा ध्यान दिया और अपनी अलग पहचान बनाई.
पंडित भीमसेन जोशी के प्रसिद्ध गाने
मिले सुर मेरा तुम्हारा (राग भैरवी में गाया); जो भजे हरी को सदा सो ही परम पद पाएगा, रघुवर तुमको मेरी लाज (दोनों भजन); बाजूबंद खुल-खुल जाए, जमुना के तीर, नदिया किनारे मोरा गांव, पिया के मिलने की आस, देखे बिना नहिं चैन (सभी ठुमरी) इत्यादि.
किराना घराना
भारतीय शास्त्रीय संगीत में किराना घराना को अब्दुल करीम खान ने स्थापित किया था. अब्दुल करीम खान के शिष्य थे सवाई गंधर्व (पंडित रामभाऊ कुंडगोलकर). सवाई गंधर्व के चार शिष्य थे – फिरोज दस्तूर, पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर, गंगूबाई हंगल और पंडित भीमसेन जोशी थे. पंडित भीमसेन जोशी के अलावा बाकी तीन का निधन पहले ही हो गया था. सवाई गंधर्व ने पंडितजी को राग तोड़ी, मुल्तानी और पूरिया सिखाया था. सवाई गंधर्व महोत्सव पंडितजी ने अपने गुरु की याद में शुरू किया था.
फिल्मों में पंडित भीमसेन जोशी
बसंत बहार, तानसेन, बीरबल माई ब्रदर और अनकही (सभी हिंदी), एक बांग्ला फिल्म में ध्रुपद गायक के तौर पर आवाज, गुलचा गणपति (मराठी) में भी आवाज दी. डच फिल्म निर्माता-निर्देशक एम लुईस और कनाडा के उद्योगपति जेम्स बेवेरीच ने पंडित भीमसेन जोशी के जीवन पर आधारित फिल्म बनाई.
पंडित भीमसेन जोशी और सम्मान/पुरस्कार: पद्मश्री (1972), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1976), पद्म भूषण (1985), पद्म विभूषण (1999) और भारत रत्न (2008).
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