भारत में महिलाओं की स्थिति पर उच्च स्तरीय समिति ने प्रारंभिक रिपोर्ट दिल्ली में 3 फरवरी 2014 को प्रस्तुत की. यह समिति पाम राजपूत की अध्यक्षता में वर्ष 1989 के बाद से महिलाओं की स्थिति को समझने के लिए फरवरी 2012 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा नियुक्त किया गया था.
अपनी प्रारम्भिक रिपोर्ट में उच्च स्तरीय समिति ने महिलाओं के विरूद्ध हिंसा, घटते लिंग अनुपात और महिलाओं के आर्थिक अशक्तिकरण के तीन मुख्य सामयिक मुद्दे बताये जिन पर देश को तत्काल ध्यान देने और सरकार द्वारा तुरंत कदम उठाने की आवश्यकता है.
तत्काल कार्रवाई के लिए समिति की सिफारिशें निम्नलिखित हैं:
• सभी निर्णय लेने वाले निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण के लिए कानून बनाया जाना चाहिए
• महिलाओं की स्थिति बेहतर करने के संवैधानिक वादे के बेहतर परिणाम के वास्ते सही प्रयास को बढ़ावा देने की आवश्यकता.
• महिलाओं के विरूद्ध हिंसा रोकने के लिए राष्ट्रीय नीति और कार्रवाई योजना बनाने की तत्काल आवश्यकता.
• संस्थांगत व्यवस्थाएं मजबूत और संसाधनपूर्ण बनाए जाएं.
• महिला एवं बाल विकास मंत्री का दर्जा मंत्रिमंडल स्तर का किया जाए जिससे महिलाओं के मुद्दों पर सरकार की गंभीरता परिलक्षित हो.
• महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा अभी संसाधन का बड़ा हिस्सा बाल विकास में खर्च होता है, संसाधन बढ़ाए जाने से लैंगिग चिन्ताओं को भी प्राथमिकता दी जा सकेगी.
• महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को अंतरराष्ट्रीय विचार विमर्शों से भी जुड़ना और उनमें भाग लेना चाहिए. साथ ही सरकार को सीईडीएडब्ल्यू समिति की सिफारिशों पर गौर कर उन पर कदम उठाना चाहिए जो महिलाओं के अधिकारों के प्रति हमारी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता है.
• महिलाओं के सशक्तिकरण पर संसदीय समिति को सभी प्रस्तावित विधेयकों का आकलन लैंगिक प्रभाव से करना चाहिए.
• समिति की बैठकें ज्यादा आयोजित की जाएं. इन बैठकों में नागरिक समूहों को प्रेक्षकों के तौर पर आने दिया जाय.
• राष्ट्रीय महिला आयोग की भूमिका प्रतिक्रियात्मरक पहल से आगे बढकर सक्रियता दिखाते हुए नीतियों, कानूनों, कार्यक्रमों और बजट में अध्ययन और सिफारिश की भूमिका निभाते हुए अपना प्रभाव दिखाना चाहिए ताकि हितधारकों के लिए पूर्ण लाभ सुनिश्चित किया जा सके.
• राष्ट्रीय महिला आयोग एक शीर्ष संस्था है जो भारत की आधी आबादी के लिए जवाबदेह है. इसको ध्यान में रखते हुए इसके सदस्यों का चयन और उसका संयोजन एक संस्थागत और पारदर्शी प्रक्रिया की जरिए किया जाना चाहिए.
• राष्ट्रीय महिला आयोग के सदस्यों की नियुक्ति हेतु एक विशेषज्ञ चयन समिति को प्रमाणित विशेषज्ञता वाले पेशेवर लोगों की खोज और चयन की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए.
• राष्ट्रीय महिला आयोग के सदस्यों की नियुक्ति उनकी योग्यरता को ध्यान में रखते हुए की जानी चाहिए न कि उनकी राजनीतिक संबद्धता को.
• लैंगिक बजट और लैंगिक लेखा जोखा को और गंभीरता से किया जाना चाहिए जिससे कि सोद्देश्यपूर्ण लैंगिक योजना परिलक्षित हो सके.
• विकास के प्रतिमान में प्रमुख जोर विकेंद्रीकरण पर होना चाहिए जिससे विकासात्मगक प्रक्रिया में महिलाओं की अधिक भागीदारी होगी.
• भारत में महिलाओं की स्थिति का आकलन नियमित रूप से होना चाहिए. इस संबंध में पहली स्थिति रिपोर्ट आने में 25 वर्ष लग गए जबकि अभी के मौजूदा उच्चासधिकार समिति के गठन में चालीस साल लगे. महिलाओं की स्थिति के निरंतर आकलन के लिए एक नियमित व्येवस्थाा होनी चाहिए और द्विवार्षिक आधार पर देश में लोगों के सामने इसकी रिपोर्ट आनी चाहिए.
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