भूपर्पटी को भूपृष्ठ के नाम से भी संबोधित किया जाता है. यह पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत है जो विभिन्न प्रकार के चट्टानों द्वारा निर्मित है. डेस्कार्टीस (Descartes, 1596-1650) ने भूपर्पटी की संकल्पना को प्रस्तुत करते हुए बताया कि यह भारी चट्टानों का आवरण है जिस पर हल्की रेत और मृदा का जमाव है और यह भारी धातुमय आंतरिक परतों पर स्थित है.
लीवनिज (Leibnitz, 1646-1716) के अनुसार पृथ्वी प्रारंभ में गर्म अवस्था में थी और बाद में ठंडी हो गई. पृथ्वी के ठंडा होने के प्रक्रम में इसका बाह्य चट्टानी भाग सबसे पहले ठंडा हुआ और उसने ठोस रूप धारण कर लिया. इस प्रकार पृथ्वी की ऊपरी ठोस परत भूपर्पटी का निर्माण हुआ. हालांकि पृथ्वी का आंतरिक भाग अब भी गर्म गैस अथवा तरल अवस्था में ही है. विद्वानों के अनुसार भूपर्पटी की औसत मोटाई 33 किमी. है.
भूपर्पटी के भाग
भौतिक, रासायनिक एवं भूगर्भिक दृष्टि से भूपर्पटी को मुख्यतः दो भागों में बांटा जाता है. इन्हें क्रमशः महाद्वीपीय एवं महासागरीय भूपर्पटी कहते हैं. इन दोनों के बीच संक्रमण भूपर्पटी भी होती है, जिसे स्थिति के अनुसार उप-महाद्वीपीय तथा उप-महासागरीय भूपर्पटी कहते हैं.
महाद्वीपीय एवं महासागरीय भूपर्पटी में अन्तर
आधार | महाद्वीपीय भूपर्पटी | महासागरीय भूपर्पटी |
मोटाई | इसकी मोटाई 30-50 किमी. होती है. यह मोटाई मैदानों के नीचे कम तथा पर्वतीय क्षेत्रों के नीचे अधिक होती है. | इसकी मोटाई 5 से 12 किमी. होती है. यह मोटाई उथले समुद्रों के नीचे अधिक और गहरे समुद्र के नीचे कम होती है. |
आयु | महाद्वीपीय भूपर्पटी में विश्व की प्राचीनतम चट्टानें पाई जाती हैं, जिनकी अनुमानित आयु 3.8 अरब वर्ष है. | महासागरीय भूपर्पटी में अपेक्षाकृत नई चट्टानें पाई जाती हैं, जिनकी अनुमानित आयु लगभग 20 करोड़ वर्ष है. |
चट्टानों की प्रकृति | इस भूपर्पटी में ग्रेनाइट के साथ-साथ एन्डेजाइटी (andegitic) लावा, राख तथा बैसाल्ट की प्रधानता है. इसके अतिरिक्त चूना पत्थर, बलुआ पत्थर, शेल, संगुटिकाश्म (conglomerates) भी पाए जाते हैं. कायान्तरित चट्टानों में नीस, शिस्ट, स्लेट, संगमरमर आदि प्रमुख हैं. | इस भूपर्पटी में बैसाल्ट तथा गेब्रों की प्रधानता है. इसके अतिरिक्त यहां पर कैल्शियम एवं सिलिका युक्त सिंधुपंक (Oozes) तथा लाल मृतिका भी प्रचुर मात्रा में पाई जाती है. इस भूपर्पटी पर कायान्तरित चट्टानों का अभाव है. |
विरूपण (Deformation) | महाद्वीपीय भूपर्पटी का बड़े पैमाने पर विरूपण हुआ है. | महासागरीय भूपर्पटी का विरूपण नहीं हुआ है. |
प्रक्रम (Process) | महाद्वीपों पर आन्तरिक ऊर्जा से महाद्वीपों के किनारों पर ज्वालामुखी उदगार होता है और चट्टानें लावा के नीचे दब जाती है. इसके अलावा कायान्तरण एवं ग्रेनाइट निर्माण की प्रक्रिया भी जारी रहती है. जबकि बाह्य ऊर्जा से अपक्षय, अपरदन, परिवहन तथा निक्षेप की क्रियाएं होती हैं. ये क्रियाएं नदियों, हिमनदियों, पवन तथा महासागरीय लहरों द्वारा की जाती हैं. | महासागरीय भूपर्पटी पर आन्तरिक ऊर्जा से महासागरीय अधः स्थल का निर्माण होता है और प्रविष्ठन (subduction) की क्रिया होती है. जबकि बाह्य ऊर्जा के प्रभाव से महासागरीय जल में तरंगे, ज्वार-भाटा तथा महासागरीय धाराएं उत्पन्न होती हैं. |
उच्चावच | महाद्वीपीय धनात्मक उच्चावच से बलन पर्वत, उत्थित पठार एवं ज्वालामुखी द्वारा निर्मित आकृतियां, मैदान, शील्ड, महाद्वीपीय निमग्नतट तथा तटीय मैदान प्रमुख हैं. महाद्वीपीय ऋणात्मक उच्चावच में भ्रंश घाटियां, अपरदित घाटियां तथा पवन की अपरदन क्रिया द्वारा निर्मित वातगर्त होते हैं. | महासागरीय धनात्मक उच्चावच में महासागरीय निमग्नतट, ज्वालामुखी मैदान आदि प्रमुख हैं. महासागरीय ऋणात्मक उच्चावच में महासागरीय गर्त तथा केनियन प्रमुख हैं. |
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