क्या आप जानते हैं विश्व की संकटग्रस्त प्रजातियों के दशा के अनुसार कैसे वर्गीकृत किया जाता है

प्रकृति के संरक्षणार्थ अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN) द्वारा विश्व की संकटग्रस्त प्रजातियों को उनके दशा के अनुसार तीन श्रेणियों में वर्गीकृत करती है। इस लेख में हमने विश्व की संकटग्रस्त प्रजातियों के दशा के अनुसार वर्गीकृत करने की प्रक्रिया के बारे में बताया है जो UPSC, SSC, State Services, NDA, CDS और Railways जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए बहुत ही उपयोगी है।
May 22, 2018 17:12 IST
    Do you know how the degree of danger to the threatened species is categorised HN

    प्रकृति के संरक्षणार्थ अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN) , प्राकृतिक संसाधनों के प्रकृति संरक्षण और टिकाऊ उपयोग के क्षेत्र में काम कर रहा एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है। आईयूसीएन (IUCN) 1948 में स्थापित किया गया था।

    यह डेटा एकत्रीकरण और विश्लेषण, शोध, क्षेत्रीय परियोजनाओं, वकालत, पैरवी और शिक्षा में शामिल है। आईयूसीएन का मिशन "प्रकृति का संरक्षण और दुनिया भर में समाजों को प्रभावित करना, प्रोत्साहित करना और उनकी सहायता करना है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि प्राकृतिक संसाधनों का कोई भी उपयोग न्यायसंगत और पारिस्थितिक रूप से स्थायी है।" यह विश्व के विभिन्न संरक्षण संगठनों के नेटवर्क से प्राप्त जानकारी के आधार पर "लाल सूची" प्रकाशित करता है, जो विश्व में सबसे अधिक संकटग्रस्त प्रजातियों को दर्शाती है।

    विश्व की संकटग्रस्त प्रजातियों का वर्गीकरण

    प्रकृति के संरक्षणार्थ अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN) द्वारा विश्व की संकटग्रस्त प्रजातियों को उनके दशा के अनुसार तीन श्रेणियों में वर्गीकृत करती है जिसकी चर्चा नीचे की गयी है:

    1. लुप्तप्राय (ई) प्रजातियां: इस श्रेणी में उन प्रजातियों को रखा जाता है जिनको विलुप्त होने का खतरा है या वे विलुप्त होने की कगार पर हैं। उनकी औसतन संख्या भारी रूप से कम हो रहे हैं और वे उनके विलुप्त होने का तत्काल खतरा हैं। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, बतख (गुलाबी हेड), शेर, बाघ, मस्क हिरण, कश्मीर स्टैग कुछ जानवर हैं जो भारत में विलुप्त होने के कगार पर हैं।

    2. गंभीर रूप से संकटग्रस्त (वी) प्रजातियां: इस श्रेणी में उन प्रजातियों को शामिल किया जाता है जिनकी आबादी अभी भी प्रचुर मात्रा में है लेकिन क्षेत्र विशेष जहा वो पाये जाते हैं वो संकटग्रस्त सीमा के अंतर्गत होने की संभावना होती है। दुसरे शब्दों में, ऐसी प्रजातियां जिनको निकट भविष्य में विलुप्त होने का खतरा होने की संभावना है । उनकी आबादी बहुत कम हो गई हो और उनके अस्तित्व को आश्वस्त नहीं किया जा सकता है।

    3. दुर्लभ या असुरक्षित (आर) प्रजातियां: इस श्रेणी में उन प्रजातियों को भी शामिल किया जाता है जिनकी आबादी बहुत कम रह गयी हो और विलुप्त होने की बहुत ही उच्च जोखिम का सामना कर रहे हैं। उदाहरण: नीला व्हेल, विशालकाय पांडा, बर्फ़ीला तेंदुआ, अफ्रीकी जंगली कुत्ता, शेर, एलबेटरॉस, क्राउंड सालिटरी ईगल, ढोले, रंगस।

    संकटापन्न प्रजातियों की IUCN लाल सूची में जोख़िम की एक विशिष्ट श्रेणी के तौर पर लुप्तप्राय प्रजातियां शब्द का प्रयोग किया जाता है। IUCN वर्ग और मानदंडों के अधीन लुप्तप्राय प्रजाति, गंभीर रूप से संकटग्रस्त और असुरक्षित के बीच में है। इसके अलावा, गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजाति को लुप्तप्राय प्रजाति के रूप में भी गिन सकते हैं और सभी मानदंडों को भर सकते हैं।

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    वन्यजीवन के संरक्षण के उद्देश्य

    वन्यजीवन के संरक्षण में तीन विशिष्ट उद्देश्यों हैं जिसकी चर्चा नीचे की गयी है:

    1. आवश्यक पारिस्थितिकीय प्रक्रियाओं और जीवन-सहायक प्रणालियों को बनाए रखना।

    2. प्रजातियों की विविधता या दुनिया के जीव में पाए जाने वाले अनुवांशिक सामग्री की श्रृंखला को संरक्षित रखना।

    3. ग्रामीण समुदायों और प्रमुख उद्योगों का समर्थन करने वाली प्रजातियों और पारिस्थितिक तंत्रों का निरंतर उपयोग सुनिश्चित करना।

    किसी प्रजाति के संरक्षण की स्थिति उन लुप्तप्राय प्रजातियों के जीवित न रहने की सूचक है। एक प्रजाति के संरक्षण की स्थिति का आकलन करते समय कई कारकों का ध्यान रखा जाता है; केवल बाक़ी संख्या ही नहीं, बल्कि समय के साथ-साथ उनकी आबादी में समग्र वृद्धि या कमी, प्रजनन सफलता की दर, ज्ञात जोख़िम और ऐसे ही अन्य कारक।

    पर्यावरण और पारिस्थितिकीय: समग्र अध्ययन सामग्री

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