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चोल राजवंश : जानिये क्या था चोल राजवंश में ख़ास , जिससे किया इतने सालों तक राज

भारत का सुनहरा इतिहास दक्षिण भारत पर सबसे लम्बे समय तक राज करने वाले साम्राज्य के ज़िक्र के बगैर अधूरा है . जाने चोल राजवंश से जुड़ी कुछ रोचक बातें  

 know the qualities of chola dynasty which made them to rule for so long
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किसी एक साम्राज्य का अंत दूसरे साम्राज्य के उत्थान के लिए अनिवार्य होता है लेकिन यह तो उनके शासनकाल पर निर्भर करता है कि उन्हें याद किया जाएगा या वे कहीं इतिहास के पन्नों में गुम हो जाएंगे . यदि दक्षिण भारत में किसी साम्राज्य ने अपनी छाप छोड़ी है तो वह है चोल राजवंश. चोल राजवंश ने लगभग १5०० सालों तक राज किया . इनके इस राजकाल की शुरुआत वर्तमान के तमिलनाडु और आँध्रप्रदेश से हुई थी लेकिन बाद में इन्होंने न केवल एक बहुत बड़े भू-भाग पर बल्कि इस साम्राज्य ने अपने पाँव जल भाग पर भी जमा लिए . 

 चोल राजवंश 

चोल राजवंश की बात करें तो इस साम्राज्य का दौर चाणक्य और मौर्य वंश से भी पहले का है . चोल राजवंश पल्लव राजवंश को हराने के बाद सत्ता में आया  . 5 शताब्दियों के राज के बाद यह सबसे अधिक समय तक राज करने वाला साम्राज्य बन गया . इस राजवंश ने कावेरी नदी की उपजाऊ घाटी के छोटे से इलाके से शुरू होकर मालदीव और श्रीलंका तक अपना साम्राज्य फैलाया वो भी न केवल भू भाग पर बल्कि इस साम्राज्य ने समुन्दरों पर भी राज किया . 

चोल राजवंश का प्रशासन 

चोल राजवंश के शासनकाल में दक्षिणी इलाके की पूरी सत्ता का एकीकरण था हालांकि इस साम्राज्य की सत्ता स्थिर थी अर्थात् वहां आंतरिक क्लेश की स्थिति नही थी. चोल राजवंश ने तमिलनाडु के तिरुचिलापल्ली , अरियालुर,तिरुवरुर , पेराम्बलुर और तंजावुर जिलों में शासन किया. 

चोल राजवंश की शासन प्रणाली 

चोल राजवंश के द्वारा वैसी ही शासन प्रणाली का चयन किया गया था जिसे हम आज के समय में भी देखते हैं . इन्होंने अपने राज्य को प्रान्तों में बांटा हुआ था जिसका नाम मंडलम था . इस साम्राज्य में प्रत्येक मंडलम के लिए एक राज्यपाल हुआ करता था .

मंडलम को आगे जिलों में बांटा हुआ हुआ था जो की नाडुस कहलाते थे जिनमे तहसील भी होती थी . इनके साम्राज्य में प्रशासन की प्रणाली के अनुसार प्रत्येक गाँव एक यूनिट के तरह काम करता था . हालांकि राजा ही सत्ताधारी था लेकिन प्रत्येक गाँव अपने इलाके का कार्यान्वन स्वयं करता था . 

चोल राजवंश में वास्तुकला 

Source: slideshare.net

चोल राजवंश के सम्राट कला, नाटक, कविताएँ और साहित्य के ख़ास शौकीन माने जाते हैं इस बात का सबूत यहाँ से मिलता है की चोल राजवंश के सम्राटों ने विशेष रूप से मन्दिरों , मूर्ती और चित्रकला में निवेश किया है . 

मंदिर 

Source: travel triangle

चोल साम्राज्य के राजाओं का मंदिरों के निर्माण में विशेष रूझान देखा गया है . इस साम्राज्य के दौरान जिन मन्दिरों का निर्माण किया गया उन्हें दो भागों में विभाजित किया जा सकता है . 

प्रारम्भिक मन्दिर वह हैं जिनके निर्माण में पल्लव साम्राज्य की वास्तुकला का प्रभाव देखने को मिलता है . अमरावती स्कूल ऑफ़ आर्किटेक्चर इसका एक उदाहरण है.

बाद के मन्दिर वह मन्दिर है जिनकी वास्तुकला में चालुक्य वंश का प्रभाव देखने को मिलता है . 

चोल राजवंश के दौरान जिन भी मन्दिरों का निर्माण हुआ उनका मूलभूत आधार एक ही था लेकिन फिर भी सबकी अलग अलग विशिष्टताएं थी . 

चोल राजवंश की सैन्य ताक़त 

Source: quora

चोल राजवंश के पास एक मज़बूत सैन्य ताकत थी जिसके बल पर इस साम्रज्य का विस्तार हुआ . इस साम्राज्य की सेना का प्रमुख राजा ही होता था . इस वंश की सैन्य ताकत के चार तत्व थे जिनमें नौसेना , पैदल सेना , हाथी वाहिनी और घुड़सवार सेना शामिल थे . यह सेना स्थानीय सैन्य शिविरों में फैली हुई थी जिन्हें कोडागम कहा जाता था . 

चोल वंशीय अपनी घुड़सवार सेना का विशेष ध्यान रखते थे . अपनी घुड़सवार सेना को सशक्त करने के लिए यह अरब देशों से घोड़े लाते थे . 

घुड़सेना के अलावा इनकी सेना में लड़ाकू हाथी भी शामिल थे जिनकी ताकत का इस्तेमाल घरों को उठाने में भी किया जाता था . 

इनके अलावा इस साम्राज्य में  पास एक बेहतरीन नौसेना भी थी जिसने इस साम्राज्य के विस्तार में विशेष भूमिका निभाई . अपनी नौसेना के कारण ही सीलोन  द्वीप पर विजय और श्रीविजय पर नौसेनिक छापे मारने मुमकिन हो पाया था. 

चोल वंश के मुख्य सम्राट 

चोल वंश की नींव विजयालय चोल के द्वारा रखी गयी थी जिसके लिए उन्होंने पल्लव वंश को हराकर तंजोर राज्य को जीता था . इसी कारण तंजोर चोल वंश की राजधानी कहलाई . 

 विजयालय चोल के बाद यह साम्राज्य आदित्य प्रथम और उनके उत्तराधिरायों के हाथ में चला गया . चोल वंश का यह कार्यकाल उनके लिए एक सुनहरा काल था . इस काल के दौरान सबसे अधिक विकास हुआ . आदित्य प्रथम के शासनकाल में साम्राज्य का विस्तार भी हुआ . इन्होने अपरजित्तवर्नम को हराकर तोडमंडलम पर कब्जा किया और साथ ही पश्चिमी गंगा पर भी आक्रमण करके उनकी राजधानी को भी अपने कब्ज़े में ले लिया था . 

यह राजवंश आगे चलकर दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया में राजाराम प्रथम और उनके उत्तराधिकारी राजेंद्र प्रथम व द्वितीय , राजाधिराज , विराराजेंद्र ,कुलोथंगा चोला 1 के शासनकाल में एक आर्थिक और सांस्कृतिक महाशक्ति बनकर उभरा था . 

चोल राजवंश का पतन 

चोल वंश के पतन की शुरुआत श्रीविजय पर उनके प्रभाव के खत्म होने के साथ हुई और साथ ही उन्होंने सारे विदेशी क्षेत्रों पर भी प्रभाव खो दिया . हालांकि फिर भी दक्षिणी भारत के कुछ हिस्सों पर चोल वंश का अधिकार था लेकिन 13वीं शताब्दी की शुरुआत ने चोल वंश का पूर्ण रूप से अंत कर दिया और पाण्ड्य वंश सत्ता में आ गया .