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एजुकेशन फील्ड में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल के 5 प्रभावी तरीके

एजुकेशन भारत में एक सबसे ज्यादा फलते-फूलते सेक्टर्स में से एक है और खासकर एजु-टेक या टेक्नोलॉजी बेस्ड एजुकेशन स्टार्ट-अप्स के बारे में तो यह बात बिलकुल सत्य साबित हो रही है. ये स्टार्ट-अप्स आर्टिफिशल इंटेलिजेंस या एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि भारत में एजुकेशन के महत्व का प्रसार हो सके.

Sep 19, 2018 15:36 IST
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5 effective ways to use AI in Education
5 effective ways to use AI in Education

आप क्या करते अगर आपके पास एक ऐसी मशीन बनाने की क्षमता होती जो मनुष्य के दिमाग की तरह काम कर सकती? हम यहां केवल नकल करने की बात नहीं कर रहे हैं. लेकिन समझ, सोच-विचार और मनुष्य के दिमाग की तरह ही काम या ग्रोथ करने जैसे इश्यूज आपके सामने रख रहे हैं. आपका इस दिमाग पर कंट्रोल रहेगा लेकिन आप इस दिमाग की सोचने की आजादी नहीं छीनेंगे. आप इस क्षमता या ताकत का इस्तेमाल कई तरीकों से कर सकते हैं जैसेकि, नेशनल डिफेन्स से लेकर होम असिस्टेंस तक सभी काम आप इसके तहत शामिल कर सकते हैं. 

यह सोच ही आपको डरावनी लेकिन रोमांचकारी लगती होगी. ‘आर्टिफिशल इंटेलिजेंस’ (एआई) के नाम से जानी जाने वाली यह टेक्नोलॉजी गलत हाथों में बहुत खतरनाक साबित सो सकती है. लेकिन अगर इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल मनुष्य की भलाई के लिए किया जाए तो इससे अरबों लोगों का भला हो सकता है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण विश्व की एजुकेशनल इंडस्ट्री में रिवोल्यूशन लाना भी हो सकता है.

एजुकेशन विश्व की सबसे पुरानी इंडस्ट्रीज में से एक है. वर्तमान में, भारत में ही एजुकेशन का मूल्य $100 बिलियन से ज्यादा आंका गया है. एजु-टेक ऐप्स ने इस संख्या में केवल अपना छोटा-सा योगदान दिया है. अगले कुछ वर्षों में, ये ऐप्स आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की ताकत का इस्तेमाल करेंगे ताकि हरेक स्टूडेंट को बेहतरीन पर्सनलाइज्ड लर्निंग एक्सपीरियंस उपलब्ध करवाया जा सके. इसलिए, एजुकेशन में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कैसे करें? आइये आगे जानते हैं:

पर्सनलाइज़ेशन ऑफ़ लर्निंग

हरेक स्टूडेंट अलग तरीके से सीखता है. कुछ स्टूडेंट्स टीचर द्वारा एक बार समझाने पर ही कोई कॉन्सेप्ट समझ लेते हैं. अन्य कई स्टूडेंट्स को बार-बार समझाने पर ही कोई टॉपिक समझ में आता है. एक बार कोई कॉन्सेप्ट समझ जाने के बाद, कुछ स्टूडेंट्स अन्य स्टूडेंट्स की तुलना में उस कॉन्सेप्ट को ज्यादा अच्छी तरह अप्लाई कर सकते हैं. इसी कारण हरेक स्टूडेंट को अलग तरीके से पढ़ाने की जरूरत होती है. आमतौर पर एक भारतीय टीचर एक साथ 35 स्टूडेंट्स को पढ़ाता है. अब, यह तो जाहिर-सी बात है कि कोई भी टीचर किसी क्लास में 35 अलग तरीकों से एक ही विषय नहीं पढ़ा सकता. लेकिन आर्टिफिशल इंटेलिजेंस से यह संभव हो सकता है. एजु-टेक ऐप हरेक स्टूडेंट के व्यवहार का अध्ययन करता है. फिर इस जानकारी का इस्तेमाल करते हुए यह ऐप हरेक स्टूडेंट के लर्निंग एक्सपीरियंस को पर्सनलाइज बनाता है. इसका यह मतलब है कि, जिन स्टूडेंट्स को विभिन्न विषय जल्दी समझ में आ जाते हैं, उनके लिए टीचिंग के एडवांस्ड लेवल का इस्तेमाल किया जा सकता है. उन स्टूडेंट्स से मुश्किल प्रश्न पूछे जा सकते हैं. अन्य स्टूडेंट्स को हरेक कॉन्सेप्ट के बेसिक्स समझाये जाते हैं. यह ऐप बेसिक कॉन्सेप्ट्स के बारे में स्टूडेंट्स की समझ जानने के लिए शुरू में क्विज का सहारा लेता है. इसके बाद यह ऐप एप्लीकेशन बेस्ड क्वेश्चन्स पूछता है.   

एडेप्टिव लर्निंग पाथ्स

किसी क्लास रूम में, एक टीचर अपना सिलेबस कवर करते समय पहले से निर्धारित तरीका अपनाता है. इसके अलावा, टीचर्स के पास उन कॉन्सेप्ट्स को दुहराने का भी समय नहीं होता है जो स्टूडेंट्स पहले पढ़ और समझ चुके होते हैं. इसका यह मतलब है कि, अगर किसी स्टूडेंट को कोई कॉन्सेप्ट अच्छी तरह समझ में नहीं आता है तो इसकी बहुत संभावना है कि एग्जाम्स के दिनों में भी उस स्टूडेंट को वह कॉन्सेप्ट पढ़ने में दिक्कत हो. समय की कमी के चलते, एग्जाम के दिनों में, स्टूडेंट उस कॉन्सेप्ट को समझने के बजाए रट्टे मारकर याद कर लेगा. जब एआई का इस्तेमाल एजु-टेक ऐप के माध्यम से किया जाता है तो यह एप्लीकेशन हरेक स्टूडेंट का लर्निंग पाथ बदल देता है. ऐसा हरेक स्टूडेंट के लिए जो सबसे बेहतर है, उसके मुताबिक किया जाता है. अगर यह ऐप नोटिस करता है कि कोई स्टूडेंट किसी बेसिक कॉन्सेप्ट में कमजोर है तो यह ऐप उस कॉन्सेप्ट से संबद्ध वीडियोज और रीडिंग मटिरियल पेश करता है ताकि वह स्टूडेंट अपने एग्जाम से पहले ही उस कॉन्सेप्ट को अच्छी तरह समझ सके. यह ऐप सुनिश्चित करता है कि स्टूडेंट्स किसी भी कॉन्सेप्ट को केवल रट्टे मारकर याद न करें.

सॉल्विंग डाउट्स ऑन चैट्स   

जब कोई टीचर 35 स्टूडेंट्स से भी ज्यादा बड़ी क्लास में पढ़ाता है तो उसके लिए यह काफी हद तक असंभव होता है कि वह रोजाना क्लास के हरेक स्टूडेंट के डाउट्स सॉल्व करे. समय बीतने के साथ-साथ  स्टूडेंट्स के डाउट्स इक्कठे होते रहते हैं और स्टूडेंट्स विभिन्न कॉन्सेप्ट्स को अच्छी तरह समझ नहीं पाते हैं. एआई के साथ, एजु-टेक ऐप्स ने ‘डाउट्स ऑन चैट’ की शुरुआत की है. एक्सपर्ट्स की टीम द्वारा सहायता प्राप्त टेक्नोलॉजी लाखों स्टूडेंट्स को रोजाना किसी भी समय डाउट्स सॉल्व करने में मदद करती है. अधिकतर डाउट्स 3 मिनट के भीतर सॉल्व कर दिए जाते हैं. आपको यह असंभव लग रहा है? यहां हम आपको बता रहे हैं कि यह कैसे किया जाता है?.....कोई भी स्टूडेंट अपने डाउट की पिक्चर क्लिक करके चैट ऐप में अपलोड करता है. नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल करते हुए चैटबॉट उस डाउट को अपने पहले से मौजूद क्वेश्चन्स के व्यापक डाटाबेस में तलाशता है. अगर उसे कोई वैसा ही क्वेश्चन मिलता है, तो चैटबॉट स्टूडेंट को सोल्यूशन उपलब्ध करवाता है. अगर चैटबॉट को किसी डाउट के समान क्वेश्चन्स नहीं मिलते हैं तो चैटबॉट स्टूडेंट का संपर्क किसी ह्यूमन एक्सपर्ट से करवा देता है और वह एक्सपर्ट उपयुक्त समय में स्टूडेंट का डाउट सॉल्व कर देता है.  

ऑटोमेटेड ग्रेडिंग

आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल केवल एजु-टेक ऐप्स तक ही सीमित नहीं है. जब स्कूलों और कॉलेजों की बात आती है तो आमतौर पर टीचर्स के पास बहुत ज्यादा काम होने के साथ ही वे काफी तनाव में भी रहते हैं. अक्सर टीचर्स लेक्चर्स लेने, टेस्ट्स डिजाइन करने और असाइनमेंट्स की ग्रेडिंग हेतु समय निकालने में व्यस्त रहते हैं. वे अपनी फील्ड में लगातार लेटेस्ट डेवलपमेंट्स से खुद को अपडेटेड भी रखते हैं. टीचर्स के कुछ रूटीन वर्क में मदद करने के लिए एआई का इस्तेमाल किया जा सकता है. नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग के साथ मिलकर, एआई आंसर शीट्स की ग्रेडिंग के काम में मदद कर सकती है ताकि स्टूडेंट्स को तुरंत फीडबैक मिल सके. इससे टीचर्स को रिसर्च करने के लिए ज्यादा समय मिलेगा. इससे यह भी सुनिश्चित होगा कि टीचर्स अपनी स्टडी फील्ड में ज्यादा योगदान दे रहे हैं.  टीचर्स के पास खुद को नए टीचिंग मेथड्स से अप-स्किल करने का ज्यादा समय होगा. 

कोर्स क्रिएटर्स को फीडबैक 

आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल स्टूडेंट बिहेवियर को समझने के लिए किया जा सकता है. इसके बाद एआई हरेक स्टूडेंट के लिए प्रभावी और अप्रभावी कोर्स-कंटेंट के एरियाज का पता लगा सकती है. इसके बदले में, कोर्स क्रिएटर्स को बहुमूल्य फीडबैक प्राप्त होता है और वे ज्यादा तेजी से स्टूडेंट लर्निंग एक्सपीरियंस में सुधार ला सकते हैं.

सारांश

पिछले कुछ वर्षों में, डिजिटलीकरण ने पश्चिमी देशों में एजुकेशन का स्वरुप ही बदल दिया है. इन देशों ने ब्लेंडेड लर्निंग एप्रोच अपनाई है. वे अपने क्लासरूम्स में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं और स्कूल के बाद स्टूडेंट्स की सपोर्ट के लिए एजु-टेक ऐप्स का इस्तेमाल करते हैं. यह क्रांति भारत में भी अपने पांव पसार रही है. यह हरेक उस स्टूडेंट की मदद कर रही है जिसके पास मोबाइल और इंटरनेट कनेक्शन है और ऐसे स्टूडेंट्स को हाई-क्वालिटी पर्सनलाइज्ड एजुकेशन उपलब्ध करवा रही है. आर्टिफिशल इंटेलिजेंस से अब, एजुकेशन के क्षेत्र में कुछ नया कर पाने का आधार तैयार हो चुका है.

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लेखक के बारे में:

मनीष कुमार ने वर्ष 2006 में आईआईटी, बॉम्बे से मेटलर्जिकल एंड मेटीरियल साइंस में ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की. उसके बाद इन्होंने जॉर्जिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, यूएसए से मेटीरियल्स साइंस इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री प्राप्त की और फिर इंडियन स्कूल फाइनेंस कंपनी ज्वाइन कर ली, जहां वे बिजनेस स्ट्रेटेजीज एंड ग्रोथ के लिए जिम्मेदार कोर टीम के सदस्य थे. वर्ष 2013 में, इन्होंने एसईईडी स्कूल्स की सह-स्थापना की. ये स्कूल्स भारत में कम लागत की के-12 एजुकेशन की क्वालिटी में सुधार लाने पर अपना फोकस रखते हैं ताकि क्वालिटी एजुकेशन सभी को मुहैया करवाई जा सके. वर्तमान में ये टॉपर.कॉम के प्रोडक्ट – लर्निंग एंड पेडागॉजी विभाग में वाईस प्रेसिडेंट हैं.

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