उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया और इसमें संशोधन के किसी भी प्रस्ताव को सार्वजनिक किया जाना चाहिए. केंद्रीय सूचना आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के तर्क को खारिज करते हुए यह निर्णय 4 जनवरी 2012 को दिया.
केंद्रीय सूचना आयोग ने अपने निर्णय में बताया कि उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया और इसमें संशोधनों हेतु प्रधान न्यायाधीश व कानून मंत्रालय के बीच हुई वार्ता को सार्वजनिक किया जाए. मुख्य सूचना आयुक्त सत्यानंद मिश्रा ने इसके पीछे तर्क दिया कि आम नागरिकों को यह जानकारी होनी चाहिए कि इस विषय से संबंधित प्रमुख पक्षों यानी भारत सरकार व प्रधान न्यायाधीश के मत क्या हैं?
सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करने पर रोक का तर्क देते हुए बताया कि आवेदक ने जो जानकारी मांगी है वह आरटीआइ दायरे में नहीं आती है. जबकि केंद्रीय सूचना आयोग के अनुसार भारत के प्रधान न्यायाधीश के कार्यालय को संवैधानिक या वैधानिक रूप से इस जानकारी को रखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह आरटीआइ कानून की धारा 2 (जे) के दायरे में नहीं आती है.
ज्ञातव्य हो कि सूचना अधिकार कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने सर्वोच्च न्यायालय में सूचना अधिकार कानून के तहत याचिका दायर की थी. याचिका में उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया के संशोधित ज्ञापन के कानून मंत्रालय के मसौदे पर भारत के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश के जी बालकृष्णन एवं कानून मंत्री के बीच हुए संवाद को सार्वजनिक करने की मांग की गई थी.
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