अमेरिका की अंतरिक्ष अनुसंधान संस्था नासा के मंगलयान मार्स रोवर ऑपोर्च्यूनिटी अपनी खोज में मंगल पर कभी जीवन के अनुकूल ताजा पानी होने की पुष्टि की. इस संबंध में नासा के वैज्ञानिकों ने 23 जनवरी 2014 को आकड़े उपलब्ध कराये. इन आकड़ों से क्युरियॉसिटी द्वारा मंगल ग्रह पर किये गये अन्य खोजों को बल प्रदान करता है.
ऑपोर्च्यूनिटी 'इंडेवर' नामक एक प्राचीन जलयुक्त चट्टानों का विश्लेषण किया. इससे पूर्व में किये गए परीक्षणों में अम्लीय, नमकीन पानी की छापों के विपरीत ऑपोर्च्यूनिटी ने स्मेक्टाइट्स नामक संकेतसूचक मृत्तिकाएँ खोजीं, जो Ph-न्यूट्रल पानी में बनती हैं.
रोवर ऑपोर्च्यूनिटी के द्वारा प्रेषित नये निष्कर्षों से एक ऐसे मंगल ग्रह की कल्पना की जा सकता है जो अपने प्रारंभिक लगभग एक अरब वर्षों में आज से कहीं ज्यादा गर्म था और जिसकी सतह पर ताजा पानी के तालाब थे. क्रमिक रूप से उस पर जलीय गतिविधि घट गई और जो बचा, वह वैज्ञानिक निष्कर्षों से हुए प्रकटीकरण के अनुसार अम्लीय हो गया और फिर लगभग तीन अरब वर्ष पूर्व से मंगल सूखना आरंभ हो गया.
चट्टानों की विभिन्न परतों के अध्ययन से वैज्ञानिक न केवल इस बात की बेहतर जानकारी पाते हैं कि मंगल ग्रह पर कितने समय तक जीवन कायम रह सका, बल्कि यह भी जान पाते हैं कि कहाँ पर स्थितियाँ आर्गेनिक कार्बन जैसे महत्त्वपूर्ण साक्ष्य उपलब्ध कराने की दृष्टि से अनुकूल हो सकती हैं.
नासा का मंगल अभियान - रोवर ऑपोर्च्यूनिटी
ऑपोर्च्यूनिटी, अपने अब निष्क्रिय हो चुके जुड़वाँ यान 'स्पिरिट' के साथ, मंगल ग्रह पर पानी की पूर्व मौजूदगी के सुराग पता लगाने के लिए 90-दिनों के संगामी अभियानों के लिए 2003 में मंगल पर उतरा था.
नासा ने यह निश्चित करने के लिए कि मंगल पर जीवन के लिए अनिवार्य अन्य घटक भी मौजूद थे, 2012 में एक अन्य मंगलयान क्युरियॉसिटी मंगल पर भेजा, जो अनुवर्ती अन्वेषणों के लिए ऑनबोर्ड कैमिस्ट्री लैब से लैस था. क्युरियॉसिटी गेल क्रेटर नामक क्षेत्र पर खोज कर रहा है.
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