सर्वोच्च न्यायालय ने 29 अप्रैल 2014 को अपने निर्णय में कहा की बलात्कार पीड़ितों के बयान 24 घंटे के भीतर पुलिस अधिकारियों के स्थान पर न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किये जाने चाहिए. यह दिशा निर्देश कार्यवाही मेँ लगने वाले समय को कम करेँगे.
यह दिशा निर्देश न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा और न्यायमूर्ति वी गोपाला गौड़ा की जिसमें सर्वोच्च न्यायालय की दो जजों की बेंच द्वारा दिया गया. बेंच ने अपने फैसले में निर्णय दिया की एक जांच अधिकारी द्वारा पीड़िता को बयान दर्ज करने के लिए अधिमानतः निकटतम महिला मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट या माहिला न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष ले जाया जाना चाहिए.
दिशानिर्देशों के अनुसार, बयान की प्रतिलिपि तुरंत जांच अधिकारी को सौंप दी जानी चाहिए. यह प्रतिलिपि विशेष दिशा निर्देशों के साथ की इसे तब तक किसी व्यक्ति के समक्ष प्रकट नहीं किया जाएगा जब तक की दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 के तहत पत्र / रिपोर्ट चार्ज दायर नहीं की जाती.
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा की यदि पीड़िता को मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने में 24 घंटे से अधिक देरी होती हैं तो जांच अधिकारी को केस डायरी में उसके लिए उत्तरदायी कारणों को रिकॉर्ड करना चाहिए तथा इसकी एक प्रति मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत करनी होगी.
Comments
All Comments (0)
Join the conversation