Digital Census in India: डिजिटल जनगणना क्या है और जानें इसकी पूरी प्रक्रिया के बारे में

Digital Census in India: गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार (9 मई 2022) को असम में कहा कि आगामी जनगणना को 2024 तक डिजीटल और पूरा कर लिया जाएगा. आइये जानते हैं डिजिटल जनगणना और इसकी पूरी प्रक्रिया के बारे में.
Digital Census in India
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 Digital Census in India: कामरूप (Kamrup) के अमिनगांव (Amingaon) में असम में जनगणना संचालन निदेशालय के नए कार्यालय भवन का उद्घाटन करते हुए, अमित शाह ने कहा कि डिजिटल जनगणना 'अगले 25 वर्षों की देश की नीतियों' को आकार देगी.

गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार  (9 मई 2022) को असम में कहा कि आगामी जनगणना को 2024 तक डिजीटल और पूरा कर लिया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रिया से देश में हर जन्म और मृत्यु के बाद जनगणना अपने आप अपडेट हो जाएगी.

उन्होंने यह भी कहा कि जहां डिजिटल जनगणना की अपनी अनूठी चुनौतियां होंगी, वहीं इसके फायदे भी होंगे और साथ ही लगभग 50 प्रतिशत आबादी अपने फोन पर मोबाइल एप्लिकेशन डाउनलोड होने के बाद अपना डेटा खुद ही फीड कर सकेगी. उन्होंने कहा, "जैसे ही कोरोना का प्रकोप कम होगा, देश भर में डिजिटल जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी. डिजिटल जनगणना 2024 से पहले पूरी हो जाएगी."

उन्होंने कहा, "भारत में जनगणना विभिन्न पहलुओं के लिए महत्वपूर्ण है.  असम जैसे राज्य के लिए, जो जनसंख्या के प्रति संवेदनशील है, यह और भी महत्वपूर्ण है."

भारत में जनगणना शुरू करने के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल की पहल पर प्रकाश डालते हुए, अमित शाह ने कहा कि भारत के पहले गृह मंत्री ने 1951 में सबसे महत्वपूर्ण पहल शुरू की थी.

 डिजिटल जनगणना क्या है?

देश की 16वीं जनगणना डिजिटल तरीके से की जाएगी. अब तक, इस प्रक्रिया में हर घर का दौरा करना और फॉर्म भरना शामिल था, जिसे बाद में डिजिटलीकरण और विश्लेषण के लिए डेटा प्रोसेसिंग केंद्रों को भेजा जाता था.

इस बार, घर-घर जाने वाले श्रमिकों के पास टैबलेट या स्मार्टफोन होंगे जिसके द्वारा वे  सीधे ही पोर्टल में जानकारी दर्ज कर सकेंगें. इसके लिए स्व-गणना का प्रावधान किया गया है. आंकड़ों के संग्रह के लिए एक मोबाइल ऐप और जनगणना से संबंधित विभिन्न गतिविधियों के प्रबंधन और निगरानी के लिए एक जनगणना पोर्टल है.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि डिजिटल उपकरण प्रक्रिया को गति देते हैं और यदि सभी डेटा डिजिटल रूप से दर्ज किए जाते हैं, तो विश्लेषण बहुत तेज हो जाता है. जनगणना स्व-गणना अपनी तरह की पहली डिजिटल प्रक्रिया होगी जिससे समय की बचत होगी. डिजिटल जनगणना COVID-19 महामारी के दौरान आमने-सामने संपर्क जोखिम को कम करने में भी मदद करेगी.

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आइये अब जानते हैं डिजिटल जनगणना की पूरी प्रक्रिया के बारे में 

स्व-गणना का प्रावधान होगा, अर्थात् उत्तरदाताओं द्वारा स्वयं जनगणना सर्वेक्षण प्रश्नावली को पूरा करना होगा.

एक बार जनगणना पोर्टल खुल जाने के बाद, व्यक्ति अपने मोबाइल नंबरों का उपयोग करके लॉग इन कर सकते हैं और अपना विवरण भर सकते हैं.

जनगणना पोर्टल में व्यक्तियों को जनसंख्या गणना के लिए फॉर्म भरना होगा. इसके बाद विभिन्न विकल्पों को भरने के लिए स्क्रीन पर कोड डिस्प्ले होंगे या दिखेंगे.

एक बार स्व-गणना हो जाने के बाद, व्यक्ति के मोबाइल फोन पर एक पहचान संख्या भेजी जाएगी.

जब एन्यूमरेटर हाउस लिस्टिंग के लिए जाएंगे, तो उनके साथ आईडी नंबर साझा किया जा सकता है, जो पहले से भरे हुए सभी डेटा को स्वचालित रूप से ऑनलाइन सिंक कर देगा.

इस प्रकार से यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी.

1 फरवरी 2021 को, निर्मला सीतारमण, जिन्होंने पहला पेपरलेस केंद्रीय बजट 2021-22 पेश किया, ने कहा कि आगामी जनगणना, देश की जनसंख्या का निर्धारण करने के लिए एक अभ्यास और भारत के इतिहास में पहली डिजिटल जनगणना होगी.

भारत की जनगणना की बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य 

पहली जनगणना (1881): इसमें ब्रिटिश भारत के पूरे महाद्वीप (कश्मीर और फ्रेंच और पुर्तगाली उपनिवेशों को छोड़कर) की जनसांख्यिकीय, आर्थिक और सामाजिक विशेषताओं के वर्गीकरण पर मुख्य जोर दिया था.

दूसरी जनगणना (1891): यह लगभग 1881 की जनगणना के समान पैटर्न पर आयोजित की गई थी. इसमें 100% कवरेज के प्रयास किए गए और वर्तमान बर्मा, कश्मीर और सिक्किम के ऊपरी हिस्से को भी शामिल किया गया.

तीसरी जनगणना (1901): इस जनगणना में बलूचिस्तान, राजपुताना, अंडमान निकोबार, बर्मा, पंजाब और कश्मीर के सुदूर इलाकों को भी शामिल किया गया था.

पांचवीं जनगणना (1921): 1911-21 का दशक अब तक का एकमात्र ऐसा दशक रहा है, जिसमें 0.31% की दशकीय जनसंख्या में गिरावट देखी गई थी. यह वह दशक था जो 1918 के फ्लू महामारी में समाप्त हुआ था, जिसमें कम से कम 12 मिलियन लोगों की जान गई थी.

भारत की जनसंख्या 1921 की जनगणना तक लगातार बढ़ रही थी और 1921 की जनगणना के बाद भी ऐसा कर रही है.
इसलिए, 1921 के जनगणना वर्ष को भारत के जनसांख्यिकीय इतिहास में "द ग्रेट डिवाइड" ( “The Great Divide”) का वर्ष कहा जाता है.

ग्यारहवीं जनगणना (1971): आजादी के बाद यह दूसरी जनगणना थी. 

तेरहवीं जनगणना (1991): इसने  जनगणना में साक्षरता की अवधारणा को बदल दिया गया और 7+ आयु वर्ग के बच्चों को साक्षर माना गया (1981 की तुलना में जब 4+ आयु वर्ग के बच्चों को साक्षर (literate) माना जाता था).

चौदहवीं जनगणना (2001): इसने प्रौद्योगिकी के मोर्चे पर एक बड़ी छलांग देखी.

पंद्रहवीं जनगणना (2011): 2011 की जनगणना में, EAG राज्यों (अधिकार प्राप्त कार्रवाई समूह राज्यों: यूपी, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, एमपी, छत्तीसगढ़, राजस्थान और उड़ीसा) के मामले में पहली बार महत्वपूर्ण गिरावट देखी गई थी.

सोलहवीं जनगणना (2021): जनगणना 2021 को COVID-19 महामारी के प्रकोप के कारण स्थगित कर दिया गया था. यह पहली डिजिटल जनगणना होगी, जिसमें स्व-गणना का भी प्रावधान होगा.

सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (Socio-Economic and Caste Census, SECC) 2011 में 1931 के बाद पहली बार आयोजित की गई थी.

अंत में जनगणना (Census) और SECC के बीच के अंतर के बारे में अध्ययन करते हैं.

कवरेज का क्षेत्र (Field of Coverage): जनगणना भारतीय आबादी का एक चित्र प्रदान करती है जबकि SECC राज्य के समर्थन के लाभार्थियों की पहचान करने का एक उपकरण है.

डेटा की गोपनीयता: जनगणना के आंकड़ों को गोपनीय माना जाता है, जबकि SECC का डेटा सरकारी विभागों द्वारा लोगों को लाभ देने और/या प्रतिबंधित करने के लिए उपयोग के लिए खुला है.

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