‘मिनी संविधान’ के लिए जानी जाती है इतिहास की यह समिति, जानें यहां

Last Updated: Nov 3, 2026, 08:29 IST

आपने भारत की राजनीतिक व्यवस्था में अलग-अलग समितियों के बारे में पढ़ा और सुना होगा। इस कड़ी में यहां एक स्वर्ण सिंह समिति भी है। क्या आप इस समिति के बारे में जानते हैं, यदि नहीं, तो इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे।

भारतीय संविधान
भारतीय संविधान

भारत की राजनीतिक व्यवस्था उठाकर देखें, तो हमें यहां कई समितियों के बारे में पढ़ने को मिलता है। आपने भी अलग-अलग समितियों के बारे में पढ़ा और सुना होगा, जिन्होंने समय-समय पर अपनी सिफारिशें और सुझाव सरकार को दिये, जिससे इतिहास में हमें कई बड़े और महत्त्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले। इस कड़ी में क्या आप स्वर्ण सिंह समिति के बारे में जानते हैं, यदि नहीं, तो इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे।

कब बनी थी स्वर्ण सिंह समिति

भारत के संवैधानिक इतिहास में 'सरदार स्वर्ण सिंह समिति' का एक बेहद महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक स्थान है। इस समिति का गठन साल 1976 में आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सरकार द्वारा किया गया था। पूर्व केंद्रीय मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह की अध्यक्षता में बनी इस 12 सदस्यीय समिति का मुख्य उद्देश्य संविधान के कामकाज की समीक्षा करना और तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक जरूरतों के अनुसार इसमें आवश्यक संशोधनों के लिए सिफारिशें देना था।

स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशें

स्वर्ण सिंह समिति की प्रमुख सिफारिशें और संवैधानिक ढांचे पर उनका प्रभाव इस प्रकार रहा है:

-इस समिति की सबसे बड़ी और स्थायी सिफारिश नागरिकों के लिए 'मौलिक कर्तव्यों' को संविधान में शामिल करने की थी। समिति का तर्क था कि अधिकारों की मांग करने वाले नागरिकों को देश और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भी पूर्ण एहसास होना चाहिए। इसी सिफारिश के आधार पर 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान में एक नया भाग '4क' (Part IVA) और अनुच्छेद 51क (Article 51A) जोड़ा गया, जिसमें शुरुआत में 10 मौलिक कर्तव्य शामिल किए गए। वर्तमान में 86वें संशोधन के बाद इनकी संख्या 11 है।

-समिति ने अपने मसौदे में मूल रूप से केवल 8 मौलिक कर्तव्यों का ही सुझाव दिया था। इसके अलावा, समिति ने यह भी सिफारिश की थी कि नागरिकों द्वारा नियमित रूप से टैक्स जमा करना एक अनिवार्य मौलिक कर्तव्य होना चाहिए और इन कर्तव्यों का पालन न करने पर संसद को जुर्माना या सजा तय करने का अधिकार होना चाहिए। हालांकि, तत्कालीन सरकार ने इन सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया था।

-समिति ने संविधान संशोधन की प्रक्रिया में संसद को सर्वोच्च शक्ति देने की वकालत की। इसके तहत यह प्रावधान करने को कहा गया कि संसद द्वारा किए गए किसी भी संविधान संशोधन को सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों में चुनौती नहीं दी जा सकती। बाद में 1980 के मिनर्वा मिल्स मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक समीक्षा के अधिकार को बहाल करते हुए इस प्रावधान को निरस्त कर दिया था।

-समिति ने यह सुझाव भी दिया कि राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) को लागू करने के लिए बनाए गए कानूनों को केवल इस आधार पर न्यायालय में असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वे नागरिकों के कुछ मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।

1976 में 42वां संविधान संशोधन

स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने 1976 में 42वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया। इस संशोधन के तहत संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' (Socialist), 'पंथनिरपेक्ष' (Secular) और 'अखंडता' (Integrity) जैसे ऐतिहासिक शब्द भी जोड़े गए। इस समिति के सुझावों ने मूल संविधान में इतने स्तर बदलाव किए कि 42वें संशोधन को आज भी भारतीय इतिहास में 'मिनी संविधान' के नाम से जाना जाता है।

Kishan Kumar
Kishan Kumar

Senior Executive - Editorial

A seasoned journalist and Multimedia Producer with over 8 years of experience in print and digital media, Kishan specializes in turning complex topics into clear, compelling narratives. Currently working as a Senior Content Writer in the GK section at Jagran Josh, he brings deep subject expertise in History, Polity, and Geography, writing on national and international affairs from a general knowledge perspective. He can be reached at Kishan.kumar@jagrannewmedia.com.

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First Published: Nov 3, 2026, 08:29 IST

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