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भारत और चीन के बीच मैकमोहन रेखा क्या है कब और क्यों खींची गयी थी?

मैकमोहन रेखा, भारत और चीन के बीच स्पष्ट सीमा रेखा का निर्धारण करती है. इस रेखा का निर्धारण तत्कालीन ब्रिटिश भारत सरकार में विदेश सचिव रहे सर हेनरी मैकमोहन ने किया था. इस रेखा की लम्बाई 890 किलोमीटर है. लेकिन चीन इस रेखा को नहीं मानता है. यही भारत और चीन के बीच विवाद का विषय है.
Jun 30, 2020 11:30 IST
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McMahon Line between India and China
McMahon Line between India and China

चीन एक ऐसा देश है जो चाहता है कि औपनिवेशिक काल का समय दुबारा आ जाये और पूरी दुनिया में सिर्फ चीन की बादशाहत कायम हो जाये. चीन का अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ थल सीमा या जल सीमा को लेकर विवाद चल रहा है. आइये इस लेख में भारत और चीन के बीच खींची गयी मैकमोहन रेखा और इससे उपजे विवाद के बारे में जानते हैं.

मैकमोहन रेखा क्या है? (What is Mcmahon Line)

मैकमोहन रेखा, पूर्वी-हिमालय क्षेत्र के चीन-अधिकृत क्षेत्र एवं भारतीय क्षेत्रों के बीच सीमा चिह्नित करती है. यह क्षेत्र अत्यधिक ऊंचाई का पर्वतीय स्थान है. इस रेखा का निर्धारण  तत्कालीन ब्रिटिश भारत सरकार में विदेश सचिव रहे सर हेनरी मैकमोहन ने किया था और इन्हीं के नाम पर इसे मैकमोहन रेखा कहा जाता है. इस रेखा की लम्बाई 890 किलोमीटर है .
यह रेखा 1914 के शिमला समझौते का परिणाम था जो को भारत और तिब्बत के बीच हुआ था. लेकिन चीन इस रेखा को नहीं मानता है.

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(हेनरी मैकमोहन)

शिमला समझौता क्या है? (Shimla Agreement)

भारत और तिब्बत के प्रतिनिधियों के बीच 1914 में स्पष्ट सीमा निर्धारण के लिए शिमला समझौता हुआ था. इसमें चीन मौजूद नहीं था क्योंकि इस समय तक तिब्बत एक स्वतंत्र क्षेत्र था इसी कारण तिब्बत के प्रतिनिधियों ने इस पर हस्ताक्षर किये थे. 

इस प्रकार शिमला समझौते के अनुसार मैकमोहन रेखा, भारत और चीन के बीच स्पष्ट सीमा रेखा है. भारत की ओर से ब्रिटिश शासकों ने अरुणाचल प्रदेश के तवांग और तिब्बत के दक्षिणी हिस्से को हिंदुस्तान का हिस्सा माना और जिसे तिब्बतियों ने भी सहमति दी थी. इस कारण अरुणाचल प्रदेश का तवांग क्षेत्र भारत का हिस्सा बन गया. 

चीन मैकमोहन रेखा को क्यों नहीं मानता है?

चीन के अनुसार तिब्बत हमेशा से ही उसका हिस्सा है इसलिए तिब्बत के प्रतिनिधि उसकी मर्जी के बिना कोई भी समझौता नहीं कर सकते हैं. चीन ने 1950 में तिब्बत पर पूरी तरह से अपना कब्जा जमा लिया था. अब चीन न तो मैकमोहन रेखा को मान्यता देता है और न ही उसे स्वीकारता है.

चीन यह भी तर्क देता है कि शिमला समझौते में चीन शामिल नहीं था इसलिए शिमला समझौता उसके लिए बाध्य नहीं है. चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्जा करने के बाद ही अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा जताना शुरू किया था.

मैकमोहन रेखा पर भारत का पक्ष:-

भारत का मानना है कि 1914 में जब मैकमोहन रेखा तय हुई थी तब तिब्बत एक कमजोर लेकिन स्वतंत्र देश था, इसलिए उसको अपने देश की तरफ से सीमा समझौता करने का पूरा हक़ है. अर्थात भारत के अनुसार जब मैकमोहन रेखा खींची गई थी, तब तिब्बत पर चीन का शासन नहीं था. इसलिए मैकमोहन रेखा ही भारत और चीन के बीच स्पष्ट सीमा रेखा है. इसके बाद जब 1950 में तिब्बत ने स्वतंत्र क्षेत्र का अपना दर्जा खो दिया तो यह क्षेत्र भारत के नियंत्रण में आ गया. इस प्रकार तवांग पर चीन का दावा एकदम गलत है. 

मैकमोहन रेखा पर वर्तमान स्थिति 

भारत, मैकमोहन रेखा को मान्यता देता है और इसे भारत और चीन के बीच ‘एक्चुअल लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल (LAC) मानता है जबकि चीन इस मैकमोहन रेखा को मान्यता नहीं देता है. चीन का कहना है कि विवादित क्षेत्र का क्षेत्रफल 2,000 किलोमीटर है जबकि भारत इसे 4,000 किलोमीटर बताता है. 

भारत और चीन के बीच यह विवाद अरुणाचल प्रदेश के तवांग में है जिसे चीन दक्षिणी तिब्बत कहकर अपना हिस्सा मानता है. जबकि शिमला समझौते के अनुसार यह भारतीय राज्य का हिस्सा है.

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि चीन लगभग हर उस संधि को नकारता है, जिसे उसने कम्युनिस्ट क्रांति होने से पहले मंजूरी दी थी.पंचशील सिद्धांत के बारे में यही स्थिति है.
तो यह भी भारत के और चीन के बीच स्थित मैकमोहन रेखा के बारे जानकारी. अगर आप ऐसे ही और रोचक लेख पढना चाहते हैं तो नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें;

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