क्या था सहारनपुर नियम 1855, विस्तार से पढ़ें
आपने सहारनपुर के बारे में पढ़ा या सुना ही होगा। उत्तर प्रदेश का सबसे उत्तरी जिला सहारनपुर नक्काशी के लिए जाना जाता है। हालांकि, क्या आपने कभी सहारनपुर नियम, 1855 के बारे में पढ़ा या या सुना है। यदि नहीं, तो इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे।
भारत का भूगोल उठाकर देखें, तो हमें उत्तर प्रदेश के मानचित्र में सबसे उत्तर में सहारनपुर जिला देखने को मिलता है। यह जिला उत्तर प्रदेश का सबसे उत्तरी जिला है, जो कि अपने यहां लकड़ी पर होने वाली नक्काशी के लिए जाना जाता है। यदि आप दिल्ली से उत्तराखंड की ओर जा रहे हैं, तो आप भी इस जिले से होते हुए गुजरेंगे। आपने इस जिले के बारे में पढ़ा या फिर सुना ही होगा। हालांकि, क्या आपने सहारनपुर 1855 नियम के बारे में पढ़ा या सुना है, यदि नहीं, तो इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे।
क्या था सहारनपुर नियम, 1855
सहारनपुर नियम 1855 को Saharanpur Rules of 1855 के नाम से भी जाना जाता है। यह भू-राजस्व से जुड़ा हुआ कानून था, जो कि किसानों के लगान के बोझ को कम करने के लिए भू-राजस्व प्रणाली महालवाड़ी व्यवस्था में लागू किया गया था।
नियम से क्या हुआ था बदलाव
पहले किसानों से वसूले जाने वाली लगान की दर करीब दो-तिहाई यानि कि 66 फीसदी तक तय कर दी गई थी। लेकिन, इस वजह से किसानों पर अधिक बोझ पड़ रहा था, जिससे खेती की गुणवत्ता भी खराब हो रही थी। इसे देखते हुए 1855 में सहारनपुर नियमों को लागू किया गया और लगान दर को 66 फीसदी से घटाकर 50 फीसदी कर दिया गया था।
भारत में कहां लागू हुआ था सहारनपुर नियम
सहारनपुर नियम भले ही उत्तर प्रदेश के एक जिले के नाम पर बनाया गया था, लेकिन इसे धीरे-धीरे उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत के कुछ हिस्सों और पंजाब में लागू किया गया था।
क्यों लागू हुआ था नियम
लॉर्ड डलहौजी के प्रशासन में यह स्वीकार किया गया था कि मार्टिन बर्ड के भूमि बंदोबस्त के बाद 66 फीसदी लगान दर किसानों पर अधिक बोझ बन रही है, जिससे कृषि उत्पादन भी कम हो रहा है। ऐसे में किसानों से वसूले जाने वाले लगान को आधा कर दिया गया था।
क्या पड़ा प्रभाव
सहारनपुर नियम अधिकांश क्षेत्रों में सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गया था। क्योंकि, जमीन की फसलों का औसत लगाने वाले अधिकारी अक्सर जमीन की फसल उत्पादन क्षमता को बढ़ा-चढ़ाकर लिख देते थे। इससे किसानों को नए नियम के तहत भी अधिक लगान देना पड़ता था। कुछ किसान लगान न देने की वजह से साहूकारों से उधार लेते थे और कर्ज के जाल में फंस जाते थे।
वहीं, कई बार संपत्ति भी साहूकारों के पास चली जाती थी। हालांकि, इस नियम के तहत ही 50 फीसदी लगान को 1864 के बर्डन नियम के माध्यम से अपनाने का प्रयास हुआ था। इस नियम को 1947 तक अंग्रेजों ने लगान वसूलने के लिए जारी रखा। हालांकि, इस बीच में कई बदलाव भी किए गए।
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