हम में से अधिकांश लोगों को यह पता है कि भारत का पहला सटीक मानचित्र विलियम लैंबटन और जॉर्ज एवरेस्ट ने बनाया था और जॉर्ज एवरेस्ट ने ही सर्वप्रथम त्रिकोणमिति के सरल तकनीकों का उपयोग करके एवरेस्ट की ऊंचाई को मापा था, जिसके कारण दुनिया के सर्वोच्च शिखर का नाम जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर माउंट एवरेस्ट रखा गया था. लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि एवरेस्ट की ऊंचाई को मापने वाले पहले शख्स जॉर्ज एवरेस्ट नहीं थे, बल्कि उनके एक भारतीय असिस्टेंट ने सर्वप्रथम एवरेस्ट की ऊंचाई की सटीक गणना की थी. इस लेख में हम आपको उस भारतीय गणितज्ञ के बारे में बता रहें हैं, जिन्होंने सर्वप्रथम एवरेस्ट की ऊंचाई की सटीक गणना की थी, लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें उसका श्रेय नहीं दिया.
सर्वप्रथम एवरेस्ट की ऊंचाई मापने वाले भारतीय
सर्वप्रथम एवरेस्ट की ऊंचाई की सटीक गणना करने वाले उस भारतीय का नाम राधानाथ सिकदर था. राधानाथ सिकदर (1813 - 17 मई, 1870) एक बंगाली गणितज्ञ थे, जिन्होंने सर्वप्रथम हिमालय में स्थित माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई की गणना की थी और बताया था कि यह समुद्र तल से ऊपर स्थित सबसे ऊंची चोटी है.
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भारतीय सर्वेक्षण विभाग में राधानाथ सिकदर की नियुक्ति
1831 में भारत के सर्वेयर जनरल जॉर्ज एवरेस्ट एक ऐसे युवा गणितज्ञ की तलाश कर रहे थे, जिसे गोलीय त्रिकोणमिति में प्रवीणता हासिल हो. तब दिल्ली के हिन्दू कॉलेज के गणित के शिक्षक टाइटलर ने अपने छात्र राधानाथ के नाम की सिफारिश जॉर्ज एवरेस्ट के सामने की थी. उस समय राधानाथ सिकदर की उम्र केवल 19 वर्ष थी. राधानाथ ने 1831 में प्रति माह 30 रुपये वेतन पर भारतीय सर्वेक्षण विभाग में “गणक” के रूप में काम करना प्रारंभ किया था.
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जल्द ही राधानाथ सिकदर को देहरादून के पास सिरोंज भेजा गया, जहां उन्होंने भूगर्भीय सर्वेक्षण में उत्कृष्टता हासिल की. जॉर्ज एवरेस्ट, राधानाथ सिकदर के काम से इतने प्रभावित थे कि जब सिकदर भारतीय सर्वेक्षण विभाग को छोड़कर डिप्टी कलेक्टर बनना चाहते थे, तो एवरेस्ट ने हस्तक्षेप किया और घोषणा की कि कोई भी सरकारी अधिकारी अपने बॉस की मंजूरी के बिना दूसरे विभाग में नौकरी नहीं कर सकता है. 1843 में जॉर्ज एवरेस्ट भारत के सर्वेयर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हो गए और कर्नल एंड्रयू स्कॉट वॉ को उनके स्थान पर नियुक्त किया गया.
देहरादून से कलकत्ता स्थानान्तरण
लगभग 20 साल तक उत्तर भारत में काम करने के बाद 1851 में सिकदर को मुख्य गणक के रूप में कलकत्ता स्थानांतरित कर दिया गया, जहां उन्होंने भारतीय सर्वेक्षण विभाग के अलावा मौसम विज्ञान विभाग के अधीक्षक के रूप में भी काम किया. कर्नल एंड्रयू स्कॉट वॉ के आदेश पर सिकदर ने दार्जिलिंग के पास बर्फ से ढके हुए पहाड़ों को मापना शुरू किया. चोटी XV के बारे में छह अलग-अलग स्थानों से आंकड़े इकट्ठा करने के बाद सिकदर ने यह निष्कर्ष निकाला कि चोटी XV दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है.
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सिकदर ने अपनी पूरी रिपोर्ट कर्नल वॉ को सौंप दी, जो अन्य डेटा से जांच करने से पहले इस खोज की घोषणा नहीं करना चाहते थे. कुछ सालों के बाद जब वह इन आंकड़ों के बारे में पूरी तरह आश्वस्त हो गए, तब उन्होंने सार्वजनिक रूप से चोटी XV को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी के रूप में घोषित किया था.
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हिमालय में स्थित विभिन्न चोटियों के नामकरण के संबंध में जॉर्ज एवरेस्ट ने इस बात का विशेष ख्याल रखा था कि किसी चोटी के नामकरण में स्थानीय नाम को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. लेकिन चोटी XV के मामले में कर्नल वॉ ने अपने पूर्व बॉस जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर चोटी का नाम रखने का प्रस्ताव दिया, जिसे जॉर्ज एवरेस्ट द्वारा स्वीकार कर लिया गया. इस प्रकार दुनिया की सबसे ऊंची चोटी का नाम जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर माउंट एवरेस्ट रखा गया और राधानाथ सिकदर के योगदान को भूला दिया गया.
सेवानिवृत्ति
1862 में सिकदर भारतीय सर्वेक्षण विभाग की नौकरी से सेवानिवृत्त हुए और उसके बाद वह “जनरल असेम्बली इंस्टीट्यूशन” (अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज) में गणित के शिक्षक के रूप में काम करने लगे. 17 मई, 1870 को चन्दन नगर के गोंडापाड़ा गांव में उनका निधन हो गया.
राधानाथ सिकदर को प्राप्त सम्मान
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सिकदर के गणितीय प्रतिभा को मान्यता देते हुए जर्मन दार्शनिक सोसायटी ने 1864 में उन्हें पत्राचार सदस्य के रूप में नियुक्त किया था, जो उन दिनों एक बहुत ही दुर्लभ सम्मान था. भारतीय डाक विभाग ने 27 जून, 2004 को चेन्नई में भारतीय त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण पर आधारित एक डाक टिकट जारी किया था, जिसमें भारतीय त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण में महत्पूर्ण भूमिका निभाने वाले दो भारतीय राधानाथ सिकदर और नैन सिंह के चित्र अंकित थे.
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