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जानें क्या है DRDO और भारत में इसका कितना है महत्व ?

DRDO: जब भी किसी देश के लिए दुश्मनों से निपटने की बात होती है, तो उस देश के पास अत्याधुनिक हथियारों को भी देखा जाता है। लेकिन, क्या आपको पता है कि भारत में हमारी जल, थल और वायु सेना के लिए अत्याधुनिक हथियारों को बनाने की जिम्मेदारी रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन(डीआरडीओ) के पास है। 

जानें क्या है DRDO और भारत में इसका कितना है महत्व ?
जानें क्या है DRDO और भारत में इसका कितना है महत्व ?

DRDO: जंग के समय दुश्मनों से निपटने के लिए किसी भी देश को सैनिकों के साथ अत्याधुनिक हथियारों की आवश्यकता होती है। समय के साथ-साथ सेना तक अत्याधुनिक हथियारों को पहुंचना जरूरी है, जिससे जंग में दुश्मनों के दांत खट्टे करने में आसानी हो। हालांकि, क्या आपको पता है कि भारत में सेनाओं को अत्याधुनिक हथियारों को पहुंचाने की जिम्मेदारी रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन(डीआरडीओ) के पास है, जो समय-समय पर गहन शोध और प्रशिक्षण के बाद सेनाओं तक अत्याधुनिक हथियारों की खेप पहुंचाता है। आज हम इसे लेख के माध्यम से जानेंगे कि भारत में डीआरडीओ का क्या महत्व है और इसके कौन-कौन से प्रमुख मिशन हैं।

 

  

DRDO भारत को अत्याधुनिक रक्षा तकनीकों के साथ सशक्त बनाने के लिहाज से रक्षा मंत्रालय का R&D (अनुसंधान और विकास) विंग है। आत्मनिर्भरता, सामरिक प्रणालियों और मिसाइलों की पृथ्वी श्रृंखला, लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट, तेजस, मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर, पिनाका, वायु रक्षा प्रणाली व आकाश जैसे सामरिक प्रणालियों के सफल स्वदेशी विकास और उत्पादन की इसकी खोज ने राडार और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली में भारत की सैन्य शक्ति को उभारा है। 

 

डीआरडीओ के विभिन्न कार्यक्रम:

इंटीग्रेटेड गाइडेड-मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP):

यह मिसाइल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारतीय रक्षा बलों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के प्रमुख कार्यों में से एक था। आईजीएमडीपी के तहत विकसित मिसाइलें हैं: पृथ्वी, अग्नि, त्रिशूल, आकाश और नाग।

 

मोबाइल ऑटोनॉमस रोबोट सिस्टम (MARS):

मार्स बारूदी सुरंगों और निष्क्रिय विस्फोटक उपकरणों (आईईडी) के लिए एक स्मार्ट मजबूत रोबोट है, जो भारतीय सशस्त्र बलों को शत्रुतापूर्ण परिवेश के बावजूद दूर से उन्हें निष्क्रिय करने में मदद करता है। इस प्रणाली का उपयोग वस्तु के लिए जमीन खोदने और विभिन्न तरीकों से इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस को डिफ्यूज करने के लिए भी किया जा सकता है।



लद्दाख में सबसे ऊंचा स्थलीय केंद्र:

लद्दाख में DRDO का केंद्र पैंगोंग झील के पास चांगला में समुद्र तल से 17,600 फीट की ऊंचाई पर है, जिसका उद्देश्य प्राकृतिक और औषधीय पौधों के संरक्षण के लिए प्राकृतिक कोल्ड स्टोरेज इकाई के रूप में काम करना है।

 

डीआरडीओ के चेयरमैनः

वर्तमान में डीआरडीओ के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत हैं। डॉ समीर ने 26 अगस्त 2022 को रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और डीआरडीओ के अध्यक्ष के रूप में पदभार ग्रहण किया है। डॉ कामत ने 1985 में IIT-खड़गपुर से मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग में बीटेक ऑनर्स और 1988 में ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी, यूएसए से मैटेरियल्स साइंस एंड इंजीनियरिंग में पीएचडी की पढ़ाई पूरी की थी। उन्होंने 1989 में DRDO ज्वाइन किया था।



डीआरडीओ का इतिहासः

DRDO का गठन 1958 में रक्षा विज्ञान संगठन (DSO) के साथ भारतीय सेना के तत्कालीन पहले से कार्यरत तकनीकी विकास प्रतिष्ठान (TDEs) और तकनीकी विकास और उत्पादन निदेशालय (DTDP) के समामेलन से हुआ था। DRDO तब 10 प्रयोगशालाओं वाला एक छोटा संगठन था। पिछले कुछ वर्षों में यह विषयों की विविधता, प्रयोगशालाओं की संख्या, उपलब्धियों और कद के मामले में विकसित हुआ है।

 

आज DRDO 50 से अधिक प्रयोगशालाओं का एक नेटवर्क है, जो वैमानिकी, आयुध, इलेक्ट्रॉनिक्स, लड़ाकू वाहन, इंजीनियरिंग सिस्टम, इंस्ट्रूमेंटेशन, मिसाइल, उन्नत कंप्यूटिंग, सिमुलेशन, विशेष सामग्री, नौसेना प्रणाली, जीवन विज्ञान, प्रशिक्षण, सूचना प्रणाली, मिसाइलों, हथियारों, हल्के लड़ाकू विमानों, रडार व इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली आदि को विकसित करने में लगा हुआ है। इन क्षेत्रों में पहले भी कई विकास किए गए हैं।


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