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बासेल III मानदंड क्या हैं?

बासेल III या बासेल मानकों को 3 दिसंबर 2010 में जारी किया गया था और यह बासेल  समझौते की श्रृंखला का तीसरा चरण है। ये समझौते बैंकिंग क्षेत्र में जोखिम प्रबंधन पहलुओं से जुड़े हैं। (बासेल I और बासेल II इसके पूर्व संस्करण थे लेकिन कम कठोर थे)। ये मानदंड 31 मार्च 2015 से कई चरणों में लागू हो चुके है परन्तु 31 मार्च 2018 से इन्हें पूरी तरह से लागू कर दिया जाएगा।
Jun 22, 2016 15:29 IST
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बासेल III या बासेल मानकों को 3 दिसंबर 2010 में जारी किया गया था और यह बासेल  समझौते की श्रृंखला का तीसरा चरण है। ये समझौते बैंकिंग क्षेत्र में जोखिम प्रबंधन पहलुओं से जुड़े हैं। (बासेल I और बासेल II इसके पूर्व संस्करण थे लेकिन कम कठोर थे)। ये मानदंड 31 मार्च 2015 से कई चरणों में लागू हो चुके है परन्तु 31 मार्च 2018 से इन्हें पूरी तरह से लागू कर दिया जाएगा।
बासेल III किस बारे में है?
बैंकिंग पर्यवेक्षण पर बासेल समिति के अनुसार, " बासेल III सुधार उपायों का एक व्यापक सेट है जिसे बासेल समिति ने, बैंकिंग क्षेत्र में विनियमन, पर्यवेक्षण और जोखिम प्रबंधन को मजबूत बनाने के लिए  बैंकिंग पर्यवेक्षण पर तैयार किया है।"
इस प्रकार, हम कह सकते हैं कि बासेल III बासेल समिति द्वारा बासेल I और बासेल II के तहत बैंकिंग नियामक रूपरेखा में सुधार हेतु बैंकिंग पर्यवेक्षक पर शुरु किए गए प्रयासों का अगला कदम है। यह नवीनतम समझौता वित्तीय एवं आर्थिक तनाव से निपटने में बैंकिंग क्षेत्र की क्षमता और जोखिम प्रबंधन में सुधार एवं बैंक की पारदर्शिता को मजबूत बनाना चाहता है।

बासेल III उपायों का उद्देश्य क्या है?

बासेल III उपायों का उद्देश्य है–
क. वित्तीय और आर्थिक अस्थिरता से पैदा हुए उतार– चढ़ाव से निपटने में बैंकिंग क्षेत्र की क्षमता में सुधार लाना।
ख. जोखिम प्रबंधन क्षमता और बैंकिंग क्षेत्र के प्रशासन में सुधार लाना।
ग. बैंक की पारदर्शिता एवं खुलासे को मजबूत बनाना।
घ. वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी) की गैर-विधायी सिफारिशों का कार्यान्वयन.  
ङ. निवेशकों को वित्तीय परिसंपत्तियों की समस्त श्रेणियों का एक सिंगल व्यू उपलब्ध कराने के लिए एक रिपोजिटरी स्थापित करने का मुद्दा.
च. बासेल-III विनियमों और पर्यवेक्षीय पूँजीगत अपेक्षाओं को मद्देनजर रखते हुए अगले पाँच वर्षों में बैंकिंग क्षेत्र की पूंजीगत आवश्यकताएँ सुझाने के उपाय.
छ. साथ ही, इसमें वित्तीय क्षेत्र के लिए एक कारगर समाधान तंत्र स्थापित करने के उपायों पर भी विचार किया.
इसलिए हम कह सकते हैं कि बासेल III दिशानिर्देश का लक्ष्य आर्थिक एवं वित्तीय तनाव की अवधि में बैंकों की क्षमता में सुधार लाना है क्योंकि नए दिशा–निर्देश बैंकिंग क्षेत्र में पूंजी एवं तरलता की पूर्व आवश्यकताओं के मुकाबले अधिक सख्त हैं।

बासेल I और बासेल II की तुलना में बासेल III में कौन से प्रमुख बदलाव प्रस्तावित हैं?

I) पूंजी की बेहतर गुणवत्ताः बासेल III के प्रमुख तत्वों में से एक है, पूंजी की अधिक सख्त परिभाषा। पूंजी की बेहतर गुणवत्ता का अर्थ है नुकसान भरपाई की उच्च क्षमता। इसका अर्थ है बैंक तनाव की अवधि को सहन करने के लिए अधिक मजबूत बनेंगे।
II) पूंजी संरक्षण बफर (Capital Conservation Buffer): बासेल III की एक और प्रमुख विशेषता है कि अब बैंकों को 2.5% पूंजी संरक्षण बफर रखना होगा। बैंकों से संरक्षण बफर बनावाने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बैंक, पूंजी की एक निर्धारित मात्रा अपने पास रखें ताकि वित्तीय और आर्थिक तनाव की अवधि में वे नुकसान की भरपाई में वे उसका इस्तेमाल कर सकें।

III) काउंटरसाइक्लिकल बफर (Countercyclical Buffer): यह भी बासेल III के प्रमुख तत्वों में से एक है। इसे अच्छे समय में पूंजी जरूरतों में बढ़ोतरी करने और बुरे समय में उसमें कम करने के उद्देश्य से शामिल किया गया था। जरुरत से ज्यादा इस्तेमाल किए जाने पर बफर बैंकिंग गतिविधि को धीमा कर देगा और बुरे समय में उधार देने को बढ़ावा देगा। बफर 0% से 2.5% के बीच होगा। इसमें सामान्य इक्विटी या पूरी तरह से नुकसान की भरपाई करने वाली अन्य पूंजी होगी।
IV) न्यूनतम सामान्य इक्विटी और टीयर 1 पूंजी आवश्यकताएं: सामान्य इक्विटी के लिए न्यूनतम आवश्यकता, नुकसान की भरपाई करने वाली पूंजी का सर्वोच्च रूप, को बासेल III में कुल जोखिम– भारित परिसंपत्तियों का 2% से बढ़ाकर 4.5% कर दिया गया है। समग्र टीयर 1 पूंजी आवश्यकता, जिसमें न सिर्फ सामान्य इक्विटी होती है बल्कि अन्य योग्य वित्तीय उपकरण भी होते हैं, में भी बढ़ोतरी की जाएगी और वर्तमान न्यूनतम 4% से बढ़ाकर 6% कर दिया जाएगा। हालांकि न्यूनतम कुल पूंजी आवश्यकता वर्तमान 8% के स्तर पर बनी रहेगी, फिर भी आवश्यक कुल पूंजी को जब संरक्षण बफर (conservation buffer)के साथ मिलाया जाएगा तो यह बढ़कर 10.5% हो जाएगा।

V) लीवरेज अनुपात: 2008 के आर्थिक संकट की समीक्षा में पाया गया कि अतीत में हुए अनुभवों के आधार पर लगाए गए अनुमानों के मुकाबले कई परिसंपत्तियों का मूल्य बहुत तेजी से कम हुआ। इसलिए, अब बेसल III नियमों में सुरक्षा तंत्र (safety net) के तौर पर Leverage Ratio को शामिल किया गया है। Leverage Ratio पूंजी और कुल परिसंपत्ति ( जोखिम के बगैर) की मात्रा की सापेक्ष मात्रा है। इसका उद्देश्य वैश्विक आधार पर बैंकिंग क्षेत्र में नियंत्रण स्थापित करना है। जनवरी 2018 में अनिवार्य Leverage Ratio लागू करने से पहले टीयर 1 के लिए 3% के Leverage Ratio का परीक्षण किया जाएगा।

VI) तरलता अनुपात (Liquidity Ratios): बासेल II के तहत, तरलता जोखिम प्रबंधन के लिए रूपरेखा बनाई जाएगी। नई तरलता कवरेज अनुपात (LCR) और नेट स्टेबल फंडिंग रेश्यो (NSFR)को क्रमशः 2015 और 2018 में लागू किया जाना है।

प्रणालीबद्ध महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थान (Systemically Important Financial Institutions– SIFI): माइक्रो– प्रूडेंशियल रूपरेखा के हिस्से के तौर पर, प्रणालीबद्ध महत्वपूर्ण बैंकों से बासेल III के पार नुकसान– भरपाई की क्षमता की उम्मीद की जाती है। कार्यान्वयन के लिए विकल्पों में पूंजी अधिभार, आकस्मिक पूंजी और जमानत–ऋण शामिल है।
बासेल  III मानदंड भारतीय बैंकों को किस प्रकार प्रभावित करेंगे?
बासेल III, जिसे समय– समय पर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार भारत में बैंकों द्वारा कार्यान्वित किया जाना है, न सिर्फ बैंकों के लिए लेकिन भारत सरकार के लिए भी चुनौतीपूर्ण कार्य होगा। अनुमान के अनुसार भारत के बैंकों को आगामी नौ वर्षों या 2020 ( संगठन के अनुसार अनुमान बदल जाएंगे) तक बाहरी पूंजी को 6,00,000 करोड़ रुपयों करने की जरूरत होगी। इस हद तक पूंजी का विस्तार इन बैंकों खास कर निजी क्षेत्र के बैंकों की इक्विटि रिटर्न्स को प्रभावित करेगी. हालांकि, भारतीय बैंकों के लिए सिर्फ यही राहत की बात है कि ऐतिहासिक दृष्टि से उन्होंने न्यूनतम नियामक की पहुंच में अपने मूल और समग्र पूंजी तक पहुंच को बनाए रखा है।