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राजपूत: सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराएं

राजपूतों की मूल भाषा प्राकृत थी. जोकि थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ क्षेत्रीय भाषाओं से अलग था.
Nov 1, 2014 17:40 IST
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राजपूतों को भारत में ब्रिटिश शासन की अवधि के दौरान योद्धा जाति से संबंधित किया गया. साथ ही यह महसूस किया गया की यह जाति अति बहादुर और साहसी लोगों की जाति है. इसके अलावा इस जाति को एक उत्साही जाति के रूप में सूचित किया गया.

राजपूतों का आचरण

राजपूतों के बीच सबसे लोकप्रिय हथियार के रूप में एक दो धारी हथियार था जिसे "खंडा" के रूप में जाना जाता था. यह हथियार विशेष अवसरों के दौरान नारियल तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया जाता था. इस टूटे हुए नारियल को लोगों के बीच प्रसाद के रूप में बांटा जाता था. इसके अलावा राजपूतों में एक अन्य अनुष्ठान किया जाता था जिसे करगा सपना ("तलवार की आराधना") कहा जाता था. वस्तुतः यह एक महोत्सव था जिसे नवरात्रि के दौरान सम्पादित किया जाता था. इसी उत्सव एवं रस्म के दौरान किसी भी राजपूत को हथियार दिया जाता था ताकि वह इस हथियार का युद्ध में इस्तेमाल कर सके. राजपूत आमतौर पर गैर शाकाहारी थे और वे धूम्रपान और पान के पत्ते चबाने के साथ-साथ दैनिक तौर पर शराब का पान करते थे.

राजपूत अवधि के दौरान महिलाओं की स्थिति  

राजपूत काल में  बाल विवाह को बढ़ावा दिया गया. लेकिन इसके अलावा "स्वयंबर" के रूप में वयस्क विवाह के सबूत भी मिलते हैं. बाल विवाह का ही एक प्रत्यक्ष परिणाम था कि बाल विधवाओं की संख्या में भी इजाफा हुआ था. चूँकि पुनर्विवाह के रूप में उन्हें अनुमति नहीं थी इसलिए उनकी संख्या बढाती चली गयी. वे अपने जीवन काल में तमाम असुविधाओ से गुजराती थीं. इस समय समाज में बहुविवाह की प्रथा प्रचलित थी. इसके अलावा समाज में लड़कियों के बारे में काफी हीन भवानी व्याप्त थी. लोगो के बीच यह मान्यता थी की लड़कियों के विवाह के समय उनके माता-पिता को झुकाना पड़ेगा और राजपूत किसी के आगे अपने आप को झुकाना नहीं चाहते थे इसलिए लकड़ियों के हत्या उनके पैदा होने के साथ ही कर दी जाती थी. महिला शिक्षा का बिल्कुल ही अस्तित्व नहीं था, और वे इसके लिए अपने पति और पुरुष रिश्तेदारों पर निर्भर रहती थीं.

राजपूत काल में "सती" प्रथा (पति के मृत शरीर के साथ अंतिम संस्कार पर पत्नी को लिटाकर जलाना) और 'जौहर' प्रथा (दुश्मन के हाथों में जाने से बेहतर खुद को आग के हवाले सौपना जिसमें सामूहिक आत्महत्या होती थी) भी राजपूतों के काल में विद्यमान थी. जौहर प्रथा में महिलाएं अपने सम्मान को बचाने के लिए खुद को आग के हवाले सौपती थीं.

राजपूत काल में भाषाएँ

राजपूतों की मूल भाषा प्राकृत थी. जोकि थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ क्षेत्रीय भाषाओं से अलग था. राजपूत अवधि के दौरान, स्वदेशी साहित्य नें काफी प्रगति की थी. यह सत्य हैं की राजपूत काल में ही सभी हिंदी, गुजराती, मराठी और बंगाली की तरह अनेक भारत की आधुनिक स्थानीय भाषाओं का विकास किया गया. यह पहली भाषाएँ थीं जिसमें सर्वप्रथम कविताओं का लेखन कार्य किया गया.

राजपूत परिवारों में समारोह

राजपूत शासक अपने पूरे जीवन-काल में 12 विभिन्न समारोहों को मनाया करते थे.

पुरुष बच्चे के जन्म के दौरान, एक ब्राह्मण शिशु की कुंडली के सन्दर्भ में सभी विवरण का रिकॉ रखते थे. साथ  ही बच्चे के नामकरण के लिए एक विशेष दिन का चयन किया जाता था. इसके अलावा जैसे ही बच्चा अपने जीवन के दो वर्ष पूरे करता था उसके मुंडन का कार्यक्रम सम्पादित किया जाता था. राजपूतों के अन्दर एक सबसे बड़ी बुराई तो यह थी कि जैसे ही उनके घर कोई बच्ची जन्म लेती थी तो वे इसे अपना दुर्भाग्य समझाते थे और शायद ही उसके जीवन काल में कोई कार्यक्रम सम्पादित होता था.

राजपूत लड़कों के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण संस्कार का आयोजन किया जाता था जिसके अन्दर बच्चों के शरीर पर एक धागा बाँधा जाता था जिसे "जनेऊ" या पवित्र धागा कहते थे. जैसे ही उनके मध्य किसी व्यक्ति के मरने की भविष्यवाणी की जाती थी तो बीमार व्यक्ति को कुश घास पर लिटा दिया जाता था और उसे चारो तरफ से गाय के गोबर से घेर दिया जाता था. इसके अलावा उस मरने वाले व्यक्ति के मुह में गंगा जल की दो-चार बूंदे डाली जाती थी. साथ ही उसके मुह में तुलसी का पत्ता डाला जाता था. साथ ही अगर सोना मौजूद हो तो सोने का एक छोटा टुकड़ा भी उस व्यक्ति के मुह में डाला जाता था.

उल्लेखनीय है की ये सभी चीजे सिर्फ इसलिए की जाती थी की उस व्यक्ति की मृत्यु कुछ समय के लिए टल जाये और उसे मृत्यु के समय तकलीफ न हो. इसके अलावा कभी-कभी उस व्यक्ति के पास गाय को लाया जाता था और उसके पूँछ को उस व्यक्ति से पकडवाया जाता था. इस मान्यता के पीछे यह तर्क काम करता था की उस व्यक्ति को स्वर्ग जाने में गाय की पूंछ मदद करेगी और उसे आसानी होगी. जैसे ही उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती थी उसका दाह संस्कार किया जाता था. दाह संस्कार प्रायः उसके बड़े पुत्र द्वारा सम्पादित किया जाता था. दाह संस्कार के समय आग देने वाला व्यक्ति उत्तर की दिशा में मुह करके दाह संस्कार सम्पादित करता था. दाह संस्कार संपन्न होने के बाद उस व्यक्ति की खोपड़ी को डंडे से तोडा जाता था ताकि उसकी आत्मा आसानी से स्वर्ग की तरफ जा सके.