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रेल बजट को आम बजट में जोड़ने से क्या फायदा होगा?

अभी हाल ही में मोदी कैबिनेट ने साल 1924 से अलग से पेश किए जा रहे रेल बजट को आम बजट के साथ पेश करने की मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही पिछले 92 साल से चली आ रही 'अलग से रेल बजट' पेश करने की पंरपरा समाप्ती हो जाएगी। अब जब 1 फ़रवरी को वित्त  वर्ष 2017-18 का बजट वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा पेश किया जायेगा तो उसमे रेल बजट की चर्चा भी होगी | आइये इस लेख में यह जानने का प्रयास करते हैं कि इस कदम से भारतीय रेल को क्या फायदा होगा |
Jan 12, 2017 19:06 IST
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ब्रिटिश शासनकाल के दौरान (1924 के पहले) भारत के रेल बजट और आम बजट अलग-अलग को पेश किया जाता था | इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि उस समय के बजट में रेलवे की हिस्सेदारी 80% हुआ करती थी जबकि आम बजट की हिस्सेदारी सिर्फ 20% थी | आगे चलकर एक साथ बजट पेश करने की यह प्रथा ख़त्म हो गई |

पहली बार कब और किसने रेल बजट और आम बजट से अलग किया था ?

रेल बजट को आम बजट से अलग पेश करने का प्रस्‍ताव ईस्ट इंडिया रेलवे कमेटी के चेयरमैन सर विलियम एम एक्वर्थ ने 1924 में किया था। इसके बाद पहला रेल बजट पेश किया गया था। आमतौर पर 'रेल बजट' को फरवरी के आखिरी हफ्ते में आम बजट से दो दिन पूर्व पेश किया जाता है।

अभी हाल ही में मोदी कैबिनेट ने साल 1924 से अलग से पेश किए जा रहे रेल बजट को आम बजट के साथ पेश करने की मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही पिछले 92 साल से चली आ रही 'अलग से रेल बजट' पेश करने की पंरपरा समाप्‍त हो जाएगी। अब जब 1 फ़रवरी को वित्‍त वर्ष 2017-18 का बजट वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा पेश किया जायेगा तो उसमे रेल बजट की चर्चा भी होगी |

ब्रिटिश शासनकाल के दौरान, एक अलग रेलवे बजट होना समझदारी भरा निर्णय था है क्योंकि देश के सकल घरेलू उत्पाद का एक बड़ा हिस्सा रेलवे राजस्व पर निर्भर करता था। लेकिन भारत की आजादी के बाद भी अलग से रेल बजट पेश किया जाता रहा है जबकि भारत के सकल घरेलु उत्पाद में रेलवे का हिस्सा सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की एक कंपनी से भी कम हो गया है |

इस व्यापक बदलाव के दौर में यह प्रश्न उठाना लाजिमी है कि आखिर यह बदलाव क्यों किया गया है, क्या सरकार को इससे कुछ लाभ या हानि भी हो सकते हैं ?

Rail budget main highlights

image source:Elections

सरकार और देश को होने वाले लाभ इस प्रकार हैं :-

1. सरकार की आय में रेलवे का घटता योगदान: आंकड़ों से पता चलता है कि 1924 के पहले भारत के पूरे बजट में रेलवे का हिस्सा 80 % के लगभग था और आज हालत यह है कि रेलवे को अकेले यात्री किराया में 2014 में ही US$4.5 बिलियन का नुकशान हुआ था | रेलवे का मार्च 2014 में प्रति व्यक्ति घाटा 23 पैसे/किमी. हो गया है और रेलवे अपनी कमाई का 92% हिस्सा खुद के ऑपरेशन पर ही खर्च कर लेता है | इसका मतलब यह है कि रेलवे अब फायदे का सौदा नही रहा है | तो आंकड़ो के हिसाब से देखा जाये तो इन दोनों बजटों को बहुत पहले ही अलग कर दिया जाना चाहिए था लेकिन परंपरा के निर्वाहन के कारण यह अभी तक अलग नही किया गया था |

2. अभी तक रेलवे सरकार को हर साल करीब 10 हजार करोड़ रुपए का डिविडेंट देती है, जिसके बदले में आम बजट से रेलवे को 40 हजार करोड़ रुपए आवंटित किए जाते हैं। अब इस मर्जर के कारण आर्थिक तंगी से जूझ रही भारतीय रेल को हर साल करीब 10 हजार करोड़ रुपए की बचत होगी।

भारत में बजट पेश करने की प्रक्रिया क्या है?

3. इस मर्जर का एक उद्येश्य यह भी है कि संसद में बजट का पास होने का साथ-साथ विनियोग विधेयक और वित्त विधेयक को भी 24 मार्च से पहले पास करा लिया जाये ताकि 1 अप्रैल से बजट प्रस्तावों का कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जा सके |

4. आगामी बजट को निर्धारित समय से पहले पेश करने के पीछे सरकार की मंशा यह है कि अप्रैल के महीने में शुरू होने वाले नए वित्त वर्ष से पहले तक सभी विधायी कार्य पूरे कर लिए जाएंगे जिससे पहली तिमाही में विभिन्न मंत्रालयों को आवंटित धनराशि प्राप्त हो जाएगी| विगत वर्षों में ऐसा देखा गया है कि कई बार बजट पेश होने के बाद के विधायी कार्यों में अधिक समय लगने के कारण विभिन्न मंत्रालयों को आवंटित धनराशि की प्राप्ति के लिए दूसरी तिमाही तक इन्तजार करना पड़ता था जिसके कारण पूरे देश के विकास कार्यों में बाधा पड़ती थी |

5. रेल बजट का आम बजट में मर्जर का फैसला बिबेक देबरॉय पैनल की सिफारिशों के आधार पर किया गया है | पैनल ने अपनी रिपोर्ट में कहा था रेल बजट सिर्फ लोक लुभावन योजनाओं की घोषणा करने का जरिया बन गया है जिसमे नई ट्रेनों, नए रूट्स और नई फैक्ट्रीज की घोषणा करना शामिल होता है लेकिन रेलवे के ढांचागत सुधारों की ओर कभी भी ध्यान नही दिया जाता है | इस प्रकार मर्जर की कवायद का मकसद रेलवे के कामकाज में सुधार लाकर उसे ज्यादा कारगर बनाना है।

6. अभी तक सभी रेल बजटों का अनुभव यह कहता था कि जो रेल मंत्री होता था वो अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों से चुनाव के पहले किये गए वादों को पूरा करने के लिए कई नयी ट्रेनों और फैक्ट्रीज की घोषणा कर देते थे जो कि वित्त मंत्रालय से धन ना मिल पाने के कारण अधूरी पड़ी रहतीं थी | अब ऐसा नही हो पायेगा |

अभी हाल में रेलवे को 458 अधूरी पड़ी परियोजनाओं और चालू परियोजनाओं को पूरा करने के लिए कुल 4.83 लाख करोड़ रुपए की जरूरत है। दोनों बजट के मर्जर के बाद रेलवे का राजस्व घाटा और पूंजीगत व्यय को अब वित्त मंत्रालय को ट्रांसफर कर दिया जाएगा।

इस प्रकार यह उम्मीद कि जाती है कि रेलवे की आर्थिक दशा सुधारने के लिए सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम अपने उद्येश्यों में सफल होगा और रेलवे फिर से एक लाभ देने वाला उपक्रम बन जायेगा|

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