क्या आप जानते हैं हिंदुस्तानी संगीत और कर्नाटक संगीत में क्या अंतर हैं?

सुव्यवस्थित ध्वनि, जो रस की सृष्टि करे, संगीत कहलाती है। गायन, वादन व नृत्य ये तीनों ही संगीत हैं।हाल में, पॉप, जैज आदि जैसे संगीत के नये रूपों के साथ शास्त्रीय विराशत का फ्यूज़न करने की ओर रुझान बढ़ा रहा है और लोगो का ध्यान भी आकर्षित कर रहा है। भारतीय शास्त्रीय संगीत को दो प्रकार से बाटा गया है- हिंदुस्तानी शैली और कर्नाटक शैली। इस लेख में हमने, हिंदुस्तान संगीत और कर्नाटक संगीत के बारे में बताया है, जो UPSC, SSC, State Services, NDA, CDS और Railways जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए बहुत ही उपयोगी है।
Oct 10, 2018 09:31 IST
    Difference between Hindustani Music and Carnatic music HN

    सुव्यवस्थित ध्वनि, जो रस की सृष्टि करे, संगीत कहलाती है। गायन, वादन व नृत्य ये तीनों ही संगीत हैं। भारतीय उप-महाद्वीप में प्रचलित संगीत  के कई प्रकार हैं। ये विभिन्य श्रेणियों के अंतर्गत आते हैं, कुछ का झुकाव शास्त्रीय संगीत की ओर है तथा कुछ का प्रयोग वैश्विक संगीत के साथ भी किया जाता है। हाल में, पॉप, जैज आदि जैसे संगीत के नये रूपों के साथ शास्त्रीय विराशत का फ्यूज़न करने की ओर रुझान बढ़ा रहा है और लोगो का ध्यान भी आकर्षित कर रहा है। भारतीय शास्त्रीय संगीत को  दो प्रकार से बाटा गया है- हिंदुस्तानी शैली और कर्नाटक शैली।

    हिंदुस्तानी संगीत शैली (हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत)

    यह भारतीय शास्त्रीय संगीत के दो प्रमुख शैली में से एक है। इस शैली में संगीत संरचना और उसमें तत्वकालिकता की संभावनाओं पर अधीक केन्द्रित होती है। इस शैली में “शुद्ध स्वर सप्तक या प्राकृतिक स्वरों के सप्तक” के पैमाने को अपनाया गया है। 11वीं और 12वीं शताब्दी में मुस्लिम सभ्यता के प्रसार ने भारतीय संगीत की दिशा को नया आयाम दिया। "मध्यकालीन मुसलमान गायकों और नायकों ने भारतीय संस्कारों को बनाए रखा। " ध्रुपद, धमर, होरी, ख्याल, टप्पा, चतुरंग, रससागर, तराना, सरगम और ठुमरी” जैसी हिंदुस्तानी संगीत शैली में गायन की दस मुख्य शैलियाँ हैं। ध्रुपद को हिंदुस्तान शास्त्रीय संगीत का सबसे पुराना गायन शैली माना जाता है, जिसके निर्माता स्वामी हरिदास को माना जाता है।

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    हिंदुस्तानी संगीत शैली की विशेषताएं

    1.  गीत के नैतिक निर्माण (नदी और सांवादी स्वर) पर जोर दिया जाता है।

    2. गायक तेजी से ताली के साथ गायन करता है, जिसे 'जोदा' कहा जाता है।

    3. पूर्ण स्वरों को पूरा माना जाता है जब विकृत स्वर के साथ गायन होता है।

    4. शुद्ध स्वरों की ठाट को 'तिलवाल' कहा जाता है।

    5. स्वरों में रेंज और लचीलापन होता है।

    6. समय सीमा का पालन किया जाता है। सुबह और शाम के लिए अलग-अलग राग होता हैं।

    7. ताल सामान्य होता हैं।

    8. राग लिंग भिन्नता पर आधारित होता हैं।

    9. इसके प्रमुख 6 राग हैं।

    कर्नाटक संगीत शैली

    यह शैली उस संगीत का सृजन करती है जिसे परम्परिक सप्तक में बनाया जाता है। यह भारत के शास्त्रीय संगीत की दक्षिण भारतीय शैली का नाम है, जो उत्तरी भारत की शैली हिन्दुस्तानी संगीत से काफी अलग है। इस शैली में ज्यादातर भक्ति संगीत के रूप में होता है और ज्यादातर रचनाएँ हिन्दू देवी देवताओं को संबोधित होता है। इसके अलावा कुछ हिस्सा प्रेम और अन्य सामाजिक मुद्दों को भी समर्पित होता है।

    इस शैली के संगीत में कई तरह के घटक हैं- जैसे मध्यम और तीव्र गति से ढोलकिया के साथ प्रदर्शन किय जाने वाला तत्वकालिक अनुभाग स्वर-कल्पना। इस शैली में सामान्यतः मृद्गम के साथ गया जाता है। मृद्गम के साथ मुक्त लय में मधुर तत्वकालिक का खण्ड ‘थानम’ कहलाता है। लेकिन वे खंड जिनमें मृद्गम की आवश्यकता नहीं होती है उन्हें ‘रागम’ बोला जाता है।

    त्यागराज, मुथुस्वामी दीक्षितार और श्यामा शास्त्री को कर्नाटक संगीत शैली की 'त्रिमूर्ति' कहा जाता है, जबकि पुरंदर दास को अक्सर कर्नाटक शैली का पिता कहा जाता है। इस शैली के विषयों में पूजा-अर्चना, मंदिरों का वर्णन, दार्शनिक चिंतन, नायक-नायिका वर्णन और देशभक्ति भी शामिल हैं। वर्णम, जावाली और तिल्लाना इस संगीत शैली के गायन शैली के प्रमुख रूप हैं।

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    कर्नाटक संगीत शैली की विशेषताएं

    1. इस शैली में ध्वनि की तीव्रता नियंत्रित की जाती है।

    2. हेलीकल (कुंडली) स्वरों का उपयोग किया जाता है।

    3. कंठ संगीत पर ज्यादा बल दिया जाता है।

    4. इस शैली में 72 प्रकार के राग होता है।

    5. तत्वकालिकता के लिए कोई स्वतंत्रता नहीं होती है और गायन शैली की केवल एक विशेष निर्धारित शैली होती है।  

    6. स्वरों की शुद्धता, श्रुतियों से ज्यादा उच्च शुद्धता पर आधारित होती है।

    7. शुद्ध स्वरों की ठाट को 'मुखरी' कहा जाता है।

    8. समय अवधि कर्नाटक संगीत में अच्छी तरह से परिभाषित हैं। मध्य 'विलाम्बा' से दो बार और 'ध्रुता' मध्य में से दो बार है।

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