भारत का पहला जातिमुक्त गांव, जहां स्कूल में भी नहीं लिखी जाती है छात्र का जाति

Last Updated: Oct 10, 2026, 08:32 IST

भारत में आपने अलग-अलग गांवों के बारे में पढ़ा और सुना होगा। हालांकि, क्या आप जानते हैं कि भारत का पहला जातिमुक्त गांव कौन-सा है, यदि नहीं, तो इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे।

गांव
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भारत को गांवों का देश कहा जाता है। देश की सांस्कृतिक और विरासत की जड़ें आज भी हमें गांव-देहातों में ही देखने को मिलती हैं। प्रत्येक गांव की अपनी-अपनी विशेषता है। इस कड़ी में क्या आप जानते हैं कि भारत में एक गांव ऐसा भी है, जो कि पहला जातिमुक्त गांव बना है। क्या आप इस गांव के बारे में जानते हैं, यदि नहीं, तो इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे।

भारत का पहला जातिमुक्त गांव

महाराष्ट्र के अहिल्यानगर (अहमदनगर) जिले की नेवासा तहसील में स्थित सौंदला गांव ने 2026 में ऐतिहासिक कदम उठाते हुए खुद को भारत का पहला 'जातिमुक्त गांव' घोषित किया था। ग्राम सभा द्वारा सर्वसम्मति से पारित इस संकल्प का मुख्य उद्देश्य जातिगत पहचान और भेदभाव को मिटाकर 'मानवता' को ही अपनी एकमात्र पहचान बनाना था।

पंचायत ने लिया था संकल्प

सौंदला की कुल आबादी लगभग 2,500 (450 परिवार) है, जिसमें विभिन्न जातियों के साथ-साथ मुस्लिम और ईसाई परिवार भी शामिल हैं। लंबे समय से चली आ रही छुआछूत, सार्वजनिक स्रोतों पर रोक और जातिगत ऊंच-नीच जैसी पुरानी परंपराओं को खत्म करने के लिए सरपंच शरद बाबूराव अरगड़े और ग्रामीणों ने एक विशेष ग्राम सभा बुलाकर "आमची जात... मानव" (हमारी जाति... इंसानियत है) का नारा अपनाकर जातिगत भेदभाव को औपचारिक रूप से खारिज कर दिया गया था।

बदलाव के लिए उठाए गए प्रमुख कदम

-विद्यालयों में बच्चों के दाखिले के समय अब ऐसा उपनाम दर्ज नहीं किया जाएगा, जो उनकी जाति की जानकारी देता हो। नामांकनों में केवल छात्र का नाम और पिता का नाम दर्ज किया जाएगा।

-गांव के मंदिर, कुएं, श्मशान घाट, सामुदायिक भवन और पानी के स्रोत अब बिना किसी रोक-टोक या भेदभाव के समाज के सभी वर्गों के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं।

-गांव के किसी भी सामाजिक या धार्मिक उत्सव में अब अलग-अलग जातियों के लिए अलग व्यवस्था नहीं होती। सभी ग्रामीण एक साथ 'सह-भोज' (पंगत) में खाना खाते हैं।

सालों से चला आ रहा था बदलाव

सौंदला में यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि यह सालों से चल रहे सुधारों की एक कड़ी है:

-गांव में किसी को भी जातिसूचक या अपमानजनक शब्द बोलने पर पूरी तरह पाबंदी है। ऐसा करने पर 500 रुपये के जुर्माने का प्रावधान है।

-गांव की ग्राम सभा पूर्व में विधवा पुनर्विवाह का समर्थन करने और विधवा महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण कुरीतियों को समाप्त करने का प्रस्ताव भी पारित कर चुकी है।

क्या है संवैधानिक महत्त्व

सौंदला गांव की यह पहल भारतीय संविधान की प्रस्तावना में शामिल समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व के मूल्यों को जमीनी स्तर पर साकार करती है। यह कदम न केवल ग्रामीण भारत की रूढ़िवादी सोच को पीछे छोड़ती है, बल्कि देश के अन्य गांवों के लिए सामाजिक समरसता और बेहतर लोकतंत्र का एक अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत करता है।

Kishan Kumar
Kishan Kumar

Senior Executive - Editorial

A seasoned journalist and Multimedia Producer with over 8 years of experience in print and digital media, Kishan specializes in turning complex topics into clear, compelling narratives. Currently working as a Senior Content Writer in the GK section at Jagran Josh, he brings deep subject expertise in History, Polity, and Geography, writing on national and international affairs from a general knowledge perspective. He can be reached at Kishan.kumar@jagrannewmedia.com.

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First Published: Oct 10, 2026, 08:32 IST

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