मौसम का पूर्वानुमान विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी की एक ऐसी शाखा है जिसमें किसी स्थान के वायुमंडलीय दशाओं की वैज्ञानिक भविष्यवाणी की जाती है. पिछले कुछ समय से भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने समुद्री चक्रवातों और तूफानों का सटीक आकलन करना प्रारंभ कर दिया है. जिससे ना केवल करोड़ों-अरबों रूपए की राष्ट्रीय संपत्ति का कम-से-कम नुकसान हुआ है, बल्कि जान-माल का भी कम-से-कम नुकसान हुआ है. चाहे ओडिसा-आंध्रप्रदेश में आया फाइलिन चक्रवात हो, हुदहुद चक्रवात हो, गुजरात में आया निलोफर तूफान हो या हाल में तमिलनाडु, केरल एवं लक्षद्वीप में आया ओखी चक्रवात हो, हर बार भारतीय मौसम विज्ञान विभाग तकरीबन सटीक भविष्यवाणी करने में सफल रहा है.
मौसम का पूर्वानुमान किसी स्थान पर वर्तमान वायुमंडलीय अवस्था के मात्रात्मक आंकड़ों के आधार पर किया जाता है. इन आंकड़ों का वायुमंडलीय प्रक्रिया के आधार पर वैज्ञानिक ढंग से विश्लेषण किया जाता है ताकि यह भविष्यवाणी की जा सके कि आगे आने वाले समय में उस स्थान पर वायुमंडल में किस तरह के परिवर्तन हो सकते हैं. पहले के जमाने में मौसम का पूर्वानुमान बैरोमीटर में आने वाले बदलावों, उस वक्त की मौसमी दशाओं और आकाशीय लक्षणों पर आधारित होता था. किन्तु वर्तमान समय में मौसम का पूर्वानुमान पूरी तरह से कंप्यूटर द्वारा प्राप्त किए गए आंकड़ों पर आधारित होता है. फिर भी ऐसा नहीं है कि मौसम संबंधी सभी पूर्वानुमान सही ही होते हैं. मौसम से संबंधित पूर्वानुमानों की अनिश्चितता के कारण लोगों के दिमाग में अक्सर यह सवाल पैदा होता है कि मौसम का सही-सही अनुमान क्यों नहीं लगाया जा सकता है या मौसम का पूर्वानुमान कैसे किया जाता है? इस लेख में हम इन प्रश्नों के उत्तर खोजने की कोशिश कर रहे हैं.
भारतीय मानसून को कौन से कारक प्रभावित करते हैं?
मौसम विज्ञान का आरंभ
करीब 650 ई.पू. में यूनानियों ने बादलों की बनावट का अनुमान लगाया था. इसके बाद करीब 340 ई.पू. में अरस्तू ने अपने ग्रंथ “मीटिरॉलॉजिका” में मौसम की व्याख्या की थी. चीन में भी 300 ई.पू. से मौसम की भविष्यवाणी से संबंधित जनश्रुतियां प्रचलित रही हैं. सामान्यतया मौसम पूर्वानुमान की प्राचीन विधियां विभिन्न वायुमंडलीय घटनाओं के अवलोकन पर आधारित थी. उदाहरण के लिए, ऐसा माना जाता था कि यदि सूर्यास्त लाल रंग के साथ होता था तो आगामी दिनों में मौसम साफ रहेगा. लेकिन ऐसे अनुमान हमेशा सही साबित नहीं होते थे.
Image source: Google Play
वर्तमान मौसम विज्ञान
आधुनिक मौसम विज्ञान सत्रहवीं सदी में तापमापी और वायुदाबमापी के आविष्कार होने और वायुमंडलीय गैसों के व्यवहार संबंधी नियमों के प्रतिपादन के बाद अस्तित्व में आया था. मौसम पूर्वानुमान के वर्तमान युग की शुरुआत वर्ष 1937 में टेलीग्राफ के आविष्कार के बाद से मानी जाती है. टेलीग्राफ के आविष्कार के बाद किसी विशाल क्षेत्र के मौसम पूर्वानुमान के लिए आवश्यक सूचनाओं को एकत्र करना संभव हो पाया था. वर्ष 1922 में ब्रिटिश भौतिकविद लेविंस फ्राई रिचर्डसन ने संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान की संभावना का प्रस्ताव रखा.
हालांकि उस समय पूर्वानुमान के लिए आवश्यक आंकड़ों की बड़ी मात्रा में जटिल गणना के लिए तेज कंप्यूटर नहीं थे. ऐसे में 1955 में इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर के विकास के साथ ही संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान का सही विकास हो पाया. इसके बाद संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान के लिए वायुमंडल के गणितीय मॉडलों का उपयोग किया जाने लगा. वर्तमान में मौसम वैज्ञानिकों द्वारा सटीक पूर्वानुमान के लिए विशाल आंकड़ों के संग्रहण और जटिल गणनाएं करने के लिए शक्तिशाली सुपर कंप्यूटरों का उपयोग किया जाता है.
मानसून की तापीय संकल्पना
मौसम का पूर्वानुमान करना
मौसम पूर्वानुमान के आरंभिक चरण में मौसम और मौसमी आंकड़ों से संबंधित सूचनाएं प्राप्त की जाती है. भूमि की सतह के साथ ही विश्वभर में दिन में दो बार छोड़े जाने वाले गुब्बारों की मदद से वायुमंडल की विभिन्न ऊँचाइयों पर तापमान, दाब, आर्द्रता और हवा की गति संबंधी आंकड़े प्राप्त किए जाते हैं.
मौसम पूर्वानुमान के लिए उपग्रह प्रौद्योगिकी का भी उपयोग किया जाता है. उपग्रहों के जरिए अलग-अलग समय में बादलों की स्थिति के आधार पर हवा और बादलों की गति तथा वायुमंडल की विभिन्न ऊँचाइयों पर तापमान और आर्द्रता के बारे में पता लगाया जाता है.
मौसम पूर्वानुमान में डॉप्लर रडार का भी उपयोग होता है. डॉप्लर रडार में डॉप्लर प्रभाव को आधार बनाकर हवा की गति मापी जाती है. वैज्ञानिकों ने डॉप्लर रडार के माध्यम से टॉरनेडो और हरिकेन जैसे तूफान के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त की है.
वर्तमान में सभी मौसम पूर्वानुमान कंप्यूटर पर आधारित वायुमंडल के संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान मॉडलों द्वारा प्राप्त किए जाते हैं.
मध्यम अवधि पूर्वानुमान
Image source: Skymet
प्रायः मौसम पूर्वानुमान आगामी 24 से 48 घंटों के लिए किया जाता है. आगामी 48 घंटों से एक सप्ताह के लिए मौसम के बारे में किया जाने वाला पूर्वानुमान मध्यम अवधि पूर्वानुमान कहलाता है. मध्यम अवधि पूर्वानुमान सामान्य पूर्वानुमान से जटिल कार्य है. इसके लिए आगामी मौसम को प्रभावित करने वाली बीती मौसमी घटनाओं को सूचीबद्ध किया जाता है. मध्यम अवधि पूर्वानुमान के तहत आगामी 10 दिनों में वायुमंडल के व्यवहार के बारे में भविष्यवाणी की जाती है.
वर्तमान समय में मौसम के पूर्वानुमान के लिए “समष्टि पूर्वानुमान” (इन्सेम्बल फॉरकास्ट) का उपयोग होने लगा है. समष्टि पूर्वानुमान वर्षा की बूंदों की आरंभिक स्थिति में बहुत सूक्ष्म परिवर्तन द्वारा अनेक बार आंशिक रूप से अलग आरंभिक बिन्दुओं को निर्धारित कर कुछ दिन आगे की भविष्यवाणी करता है.
एक समष्टि पूर्वानुमान मौसम संबंधी बहुत से संख्यात्मक पूर्वानुमान मॉडलों (5 से लेकर 100 तक) पर निर्भर होता है जो आरंभिक स्थितियों और वायुमंडल के संख्यात्मक निरूपण से भिन्न होते हैं. इस प्रकार पूर्वानुमान के दो मुख्य स्रोतों में अनिश्चितता होती है. यदि किसी समय पर अधिकतर पूर्वानुमानों के परिणाम समान हों तब मौसम वैज्ञानिकों का पूर्वानुमान के प्रति विश्वसनीयता बढ़ जाती है. दूसरी तरफ यदि समष्टि पूर्वानुमानों के परिणामों में बहुत अंतर होता है तब किसी विशेष पूर्वानुमान की विश्वसनीयता बहुत कम हो जाती है.
हालांकि भारतीय संदर्भ में मौसम का पूर्वानुमान अधिकतर मानसून का ही पूर्वानुमान होता है जिसके लिए विभिन्न पारंपरिक सिद्धांतों के साथ-साथ जेट धारा का भी अध्ययन किया जाता है.
वायुमंडल की जानकारी तथा मौसम व जलवायु में अंतर
Comments
All Comments (0)
Join the conversation