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बायो टॉयलेट किसे कहते हैं?

Last Updated: Oct 14, 2019, 11:18 IST

भारत सरकार ने 2013 से हाथ से मैला उठाने की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया है. इसी कारण भारतीय रेलवे में भी मल से सम्बंधित सभी काम अब मशीन के द्वारा ही कराये जाने की प्रणाली को शुरू करने के लिए सरकार ने ट्रेन में बायो टॉयलेट्स या जैविक शैचालयों को लगाने के निश्चय किया है. बायो टॉयलेट (Bio Toilet), परम्परागत टॉयलेट से अलग एक ऐसा टॉयलेट होता है जिसमें बैक्टेरिया की मदद से मानव मल को पानी और गैस में बदल दिया जाता है.

What is Bio Toilet
What is Bio Toilet

फ्लश टायलेट के आविष्कार के 100 साल बाद भी आज दुनिया में सिर्फ 15% लोगों के पास ही फ्लश टायलेट है. आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भारत के ग्रामीण इलाकों में सिर्फ 3% लोगों के पास फ्लश टायलेट हैं और शहरों में भी यह आँकड़ा 25% तक ही सिमट जाता है.

संसद में रेलवे बजट 2016-17 पेश करने के दौरान भूतपूर्व रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने डिब्रूगढ़ राजधानी ट्रेन का भी उल्लेख किया था. यह दुनिया की पहली बायो वैक्यूम टॉयलेट युक्त ट्रेन है जिसे भारतीय रेलवे ने पिछले साल पेश किया था.

bio toilets
image source:OMitra Blog

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भारतीय रेलवे ने 'स्वच्छ रेल-स्वच्छ भारत’ कार्यक्रम के अंतर्गत अगस्त 2019 तक भारतीय रेलवे के 60,906 ट्रेन डिब्बों में 2 लाख से अधिक जैव-शौचालय लगा दिए हैं.
बायो टॉयलेट किसे कहते हैं?
बायो टॉयलेट का अविष्कार रक्षा अनुसन्धान और विकास संगठन (DRDO) तथा भारतीय रेलवे द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है. बायो टॉयलेट्स में शौचालय के नीचे बायो डाइजेस्टर कंटेनर में एनेरोबिक बैक्टीरिया होते हैं जो मानव मल को पानी और गैसों में बदल देते हैं. इस प्रक्रिया के तहत मल सड़ने के बाद केवल मीथेन गैस और पानी ही शेष बचते हैं, जिसके बाद पानी को पुनःचक्रित (री-साइकिल) कर शौचालयों में इस्तेमाल किया जा सकता है. इन गैसों को वातावरण में छोड़ दिया जाता है जबकि दूषित जल को क्लोरिनेशन के बाद पटरियों पर छोड़ दिया जाता है.
बायो टॉयलेट्स के क्या फायदे हैं?
1. पारंपरिक शौचालयों द्वारा मानव मल को सीधे रेल की पटरियों पर छोड़ दिया जाता था, जिससे पर्यावरण में गंदगी फैलने के साथ ही रेल पटरियों की धातु को नुकसान पहुंचता था. अब ऐसा नही होगा.
2. फ्लश टॉयलेट्स को एक बार इस्तेमाल करने पर कम से कम 10 से 15 लीटर पानी खर्च होता था जबकि वैक्यूम आधारित बॉयो टॉयलेट एक फ्लश में करीब आधा लीटर पानी ही इस्तेमाल होता है.
3. भारत के स्टेशन अब साफ़ सुथरे और बदबू रहित हो जायेंगे जो कि कई बीमारियों को रोकने की दिशा में अच्छा कदम है.
4. स्टेशन पर मच्छर, कॉकरोच और चूहों की संख्या में कमी आएगी और चूहे स्टेशन को अन्दर से खोलना नही कर पाएंगे.
5. बायो टॉयलेट्स के इस्तेमाल से मानव मल को हाथ से उठाने वाले लोगों को इस गंदे काम से मुक्ति मिल जाएगी.

यहाँ पर यह बताना जरूरी है कि दुनिया के लगभग 50% लोगों के पास पिट लैट्रिन (गड्ढे वाली लेट्रिन) है जहाँ मल नीचे गड्ढे में इकट्ठा होता है. आँकडों के अनुसार इनमें से अधिकतर पिट लैट्रिन से मल रिस-रिस कर जमीन में जाता है जिससे पीने वाला पानी प्रदूषित हो रहा है. फ्लश लैट्रिन की एक समस्या यह भी है कि इसकी मल सामग्री का 95% से अधिक भाग आज भी बगैर किसी ट्रीटमेंट के नदियों के माध्यम से समुद्र में पहुँच जाता है.

उम्मीद है कि ऊपर दिए गए लेख को पढ़ने के बाद यह कहा जा सकता है कि बायो टॉयलेट्स का बढ़ता प्रयोग न सिर्फ पर्यावरण के अनुकूल है बल्कि यह आगे आने वाले समय की जरुरत भी है.

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Hemant Singh is an academic writer with 7+ years of experience in research, teaching and content creation for competitive exams. He is a postgraduate in International
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First Published: Oct 14, 2019, 11:06 IST

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