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Difference: क्या होता है राजदूत और उच्चायुक्त में अंतर, जानें

Difference: आपने राजदूत और उच्चायुक्त शब्दों के बारे में सुना होगा। लेकिन, क्या आप भी इन दोनों का मतलब को लेकर उलझ जाते हैं। यदि हां, तो इस लेख के माध्यम से आपकी इस दुविधा का हल हो जाएगा। जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें। 

Difference: क्या होता है राजदूत और उच्चायुक्त में अंतर, जानें
Difference: क्या होता है राजदूत और उच्चायुक्त में अंतर, जानें

Difference: विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए देश को राजदूत और उच्चायुक्त की आवश्यकता होती है। यह दोनोंं ही पद अलग-अलग हैं, हालांकि इनमें कुछ सामानताएं हैं। कई लोग इन दोनों पदों को लेकर कई बार दुविधा में पड़ जाते हैं और दोनों पदों को एक ही मान लेते हैं। क्या आपको भी इन दोनों पदों को लेकर दुविधा होती है और आप भी इन दोनों में अंतर नहीं समझ पाते हैं। यदि हां, तो इस लेख के माध्यम से हम आपको इन दोनों पदों के बीच अंतर को समझाएंगे, जिससे आप भविष्य में राजदूत और उच्चायुक्त को लेकर दुविधा में न रहें, तो जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें। 

दरअसल, उच्चायुक्त और राजदूत दोनों ही राजनयिक होते हैं। दोनों पदों पर बैठे व्यक्ति की अपने देश का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी होती है। यहां उच्चायुक्त शब्द किसी राष्ट्रमंडल देश में राजदूत के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जबकि राजदूत शब्द का इस्तेमाल बाकी देशों के लिए होता है। 

कौन बनते हैं राजदूत और राजनयिक 

राजदूत और राजनयिक की जिम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति भारतीय विदेश सेवा(IFS) अधिकारी होते हैं, जिसके लिए हर साल आयोजित होने वाली UPSC सिविल सेवा का पास करना होता है। सरकार ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति करती है, जो विभिन्न देशों में भारत के प्रतिनिधि के रूप में काम करते हैं। 

 

हमने ऊपर दी गई जानकारी के माध्यम से उच्चायुक्त और राजदूत के बीच अंतर को समझा। अब हम एक टेबल के माध्यम से दोनों के बीच अंतर को समझेंगे। 



राजदूत

उच्चायुक्त

राष्टमंडल देशों को छोड़कर बाकी देशों में भारत के प्रतिनिधि के राजदूत कहते हैं। जैसेः जर्मनी में भारत के प्रतिनिधि को भारतीय राजदूत कहते हैं। 

उच्चायुक्त शब्द राष्टमंडल के प्रतिनिधियों को संबोधित करने के लिए इस्तेमाल होता है। यह राष्ट्रमंडल देशों में इस्तेमाल होता है। उदाहरण के तौर पर कनाडा में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले शख्स को उच्चायुक्त कहा जाता है।  

भारत के विदेश मंत्रालय के कार्यालय को राष्ट्रमंडल देशों के अलावा बाकी देशों में दूतावास के रूप में जाना जाता है।

वहीं, राष्टमंडल देशों में भारत के विदेश मंत्रालय कार्यालय को उच्चायोग कहते हैं।

राजूदतों के इतिहास की बात करें तो यह 17वीं सदी के इतालवी राज्यों से जुड़ा है। यहां राजनयिक के रूप में उनकी भूमिका में बदलाव हुआ था। उस समय छोटे राज्यों ने बाहरी सुरक्षा के लिए राजदूत के विकल्प को चुना था।

वहीं, ब्रिटिश साम्राज्य में उच्चायुक्तों की जिम्मेदारी नदियों के प्रबंधन और उपनिवेशों की देख-रेख की होती थी। ये एक तरह से शाही सरकार के दूत हुआ करते थे। 

जिस देश में राजदूत अपने देश का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं, वहां वे अपने देश के प्रमुख से एक औपचारिक साख पत्र को लेकर जाते हैं। साख पत्र को  लेटर ऑफ क्रेडिट भी कहते हैं।

वहीं, राष्टमंडल देशों के मामले में एक राष्टमंडल राष्ट्र से दूसरे देश में उच्चायुक्त सरकार के प्रमुख से परिचय का अनौपचारिक पत्र ले जाते हैं। भारत के मामले में यह पत्र प्रधानमंत्री से लेना होता है।

राजदूतों का काम दो देशों के बीच अच्छे राजनयिक संबंधों को बनाए रखना होता है। साथ ही इनकी जिम्मेदारी मानव तस्करी, नशीली दवाओं के व्यापार और आंतकवाद जैसे गंभीर मुद्दों पर रोक लगाकर शांति बनाए रखना भी होती है, जिससे दो देशों के बीच संबंधों में दरार न आए।

उच्चायुक्त का काम भी लगभत समान होता है। उच्चायुक्त भी राजनियक संबंधों को अच्छा बनाए रखते हैं व आर्थिक व व्यापारिक संबंधों में मदद करते हैं। 



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