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Positive India: 7 साल की उम्र तक स्कूल नहीं गयी, पढ़ाई में कमजोर होने की वजह से 1st क्लास से KG में किया गया था डिमोट, फिर हुआ कुछ ऐसा कि ज़िंदगी बदल गयी - जानें IAS Anupma V Chandra की कहानी

जाने एक Ex-IAS अफसर की कहानी जो छठीं तक हुई हर कक्षा में फेल। लेकिन इंदिरा गाँधी से हुई एक छोटी सी मुलाकात ने उन्हें जीवन में कुछ कर दिखाने की प्रेरणा दी और वह बन गईं एक IAS अफसर। 

Jun 4, 2020 19:35 IST
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जानें IAS Anupma V Chandra की कहानी
जानें IAS Anupma V Chandra की कहानी

UPSC की सिविल सेवा परीक्षा पास करना देश के हर युवा का सपना होता है परन्तु इस सपने को सच कर दिखाने की क्षमता सभी में नहीं होती। कठोर परिश्रम और आत्मविश्वास के साथ ही इस परीक्षा को पास किया जा सकता है। और ऐसा ही कुछ कर दिखाया हिंदी मीडियम से पढ़ीं IAS अनुपमा वि. चंद्रा ने। छठीं तक हर कक्षा में फेल होने वाली अनुपमा का बचपन केवल आलोचनाओं और शर्मिंदगी भरा रहा। परन्तु उन्होंने अपने कड़ी मेहनत से अपने भविष्य को बदला और एक संघर्षपूर्ण समय के बाद वह IAS बनीं। आइये जानते हैं कैसा रहा उनका IAS बनने तक का सफर 

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7 साल की उम्र तक स्कूल नहीं गई थी अनुपमा 

अनुपमा 7 साल की उम्र तक अपने परिवार के साथ इटावा जिले में रहती थी जो की चम्बल इलाके के नज़दीक है। उस समय चम्बल में डाकुओं का राज था और छोटे बच्चों का अपहरण होना एक आम बात थी। इसी वजह से अनुपमा के माता पिता ने उन्हें स्कूल नहीं भेजा और वह 7 साल की उम्र तक घर में ही रहीं। 

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अंग्रेजी ना आने की वजह से स्कूल से निकाला गया 

अनुपमा के पिता का रायबरेली तबादला होने के बाद उनका दाखिला शहर के इकलौते अच्छे स्कूल में कराया गया। अनुपमा की उम्र के हिसाब से उन्हें पहली कक्षा में दाखिला तो मिल गया परन्तु क्योंकि वह आज तक स्कूल नहीं गईं थी तो उन्हें अंग्रेज़ी बोलनी , पढ़नी और लिखनी नहीं आती थी। कक्षा में ख़राब मार्क्स आने के कारण उन्हे पहली से KG क्लास में डिमोट कर दिया गया था। परन्तु वह KG में भी फेल हो गई थी जिसके बाद उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था। इसके बाद अपनी छठी कक्षा तक की पढ़ाई उन्होंने एक पाठशाला से की।  

हिंदी मीडियम में पढ़ने की वजह से उड़ाया गया मज़ाक 

जब अनुपमा 7वीं में आईं तो उनके पिता का तबादला लखनऊ हो गया। जब वह यहाँ के स्कूल में एड्मिशन लेने गई तो ख़राब रिपोर्ट कार्ड और एंट्रेंस टेस्ट में फेल होने की वजह से उन्हें 8 स्कूलों ने दाखिला देने से मना कर दिया। जैसे तैसे उनका दाखिला एक स्कूल में हुआ परन्तु वहाँ हिंदी में बात करने पर दंड मिलता था। इसी डर से अनुपमा ने स्कूल में किसी से दोस्ती नहीं की। वह बताती हैं की उनकी क्लास के बच्चे उन्हें हिंदी मीडियम टाइप कह कर मज़ाक उड़ाते थे। इस वजह से उनका सेल्फ कॉन्फिडेंस ख़तम हो चुका था और वह सबसे अलग रहती थीं। हर जगह आलोचनाओं का सामना करने की वजह से अनुपमा लौ सेल्फ एस्टीम की शिकार हो गई थी। 

इंदिरा गाँधी से हुई एक मुलाकात ने बदल दिया जीवन 

जब अनुपमा 8वी में थी तब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी जी लखनऊ के दौरे पर आईं। अनुपमा के स्कूल की लड़किओं को हाथ में फूल ले कर उनका स्वागत करने के लिए भेजा गया। जब इंदिरा गाँधी वहां पहुंची तो उनके साथ चल रही जगमगाती बत्ती वाली गाड़ियाँ देखकर अनुपमा बहुत आकर्षित हुई। जैसे ही इंदिरा जी की गाड़ी अनुपमा के सामने रुकी उन्होंने आगे बढ़ कर प्रधानमंत्री जी को फूल दिए। उन्होंने मुस्कुरा कर अनुपमा से पुछा की वह बड़ी हो कर क्या बनना चाहती हैं। जवाब में अनुपमा ने कहा की वह उन्ही की तरह कुछ बड़ा बनना चाहती हैं। जिस पर मुस्कुरा कर इंदिरा जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा की वह आवश्य ही उनके जैसा बन पाएंगी। परन्तु अनुपमा के पीछे खड़ी क्लास के लड़कियाँ उन पर हसने लगी। यह बात अनुपमा को बहुत चुभी और उन्होंने उस लाल बत्ती वाली गाड़ी को हासिल करने का निश्चय कर लिया।  इसके बाद उन्होंने खूब मेहनत की और उनके मार्क्स में भी काफी परिवर्तन आया। जब उन्होंने इंदिरा गांधी की बात अपने पिता  को बताई तो उनके पिता ने उन्हें IAS के बारे में बताया। इसके बाद अनुपमा ने जीवन में कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। 

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एक फ्रेंच पेंटर से मिली जीवन में हार ना मानने की प्रेरणा 

अपने कॉलेज की पढाई के दौरान अनुपमा एक पेंटिंग एक्सिबिशन में गई। वहां उन्होंने एक फ्रेंच पेंटर को पेंट करते देखा। वह बार बार एक ही लाइन बना कर उसे मिटा रहा था और फिरसे यही क्रिया दोहरा रहा था। अनुपमा ने जब पेंटर से इसका कारण पूछा तो उन्होंने ने जवाब दिया की जब भी मैं ये लाइन बनता हूँ तो  मैं खुद से एक ही सवाल करता हूँ कि क्या ये मेरा बेस्ट एटेम्पट है। और यही आदत मुझे आज टॉप पर ले आई है।  पेंटर की इस बात से अनुपमा इतनी प्रभावित हुई की उन्होंने इसे अपने जीवन का मूल मंत्र बना लिया। उन्होंने हर दिन UPSC की तैयारी के दौरान यही सोचा की क्या ये कि क्या ये मेरा बेस्ट है? और  जवाब "नहीं" ही आया। अनुपमा कहती हैं की उन्होंने इसी वजह से दिन में 14 घंटे पढ़ाई की थी। 8 महीने की कड़ी मेहनत के बाद जब अनुपमा ने फिरसे यह सवाल खुद से पुछा की क्या मैंने इस तैयारी में अपना बेस्ट दिया? तो उन्हें जवाब हाँ मिला। इस कॉन्फिडेंस की वजह से उन्होंने UPSC की  परीक्षा पास की और वह IAS  अधिकारी बन गई। 

अनुपमा का कहना है कि उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह अपनी ज़िन्दगी में सफलता पा सकेंगी। परन्तु खुद पर भरोसा और कड़ी महनत एवं लक्ष्य को  चाह ने उन्हें आज यह मुकाम हासिल कराया। 

उनका जीवन एक प्रेरणा है हर उस युवा के लिए जो  अंग्रेजी ना आने की  वजह से हंसी का पात्र बनते हैं और साथ ही उन युवाओं के लिए एक सबक है जो मेहनत से कतराते हैं। अनुपमा के बुलंद होसले और मेहनत को जागरण जोश का सलाम। 

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