पद्म विभूषण से सम्मानित सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और केरल के मंत्री रह चुके वीआर कृष्णा अय्यर का 4 नवंबर 2014 को कोच्चि के अस्पताल में निधन हो गया. न्यायमूर्ति अय्यर ने 13 नवंबर 2014 को अपने जीवन के 100 वर्ष पूरे किये थे.
वह वर्ष 1957 में केरल की ईएमएस नम्बूदरीपाद के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार में क़ानून मंत्री रहे थे. मंत्री के रूप में उन्होंने केरल में 1950 के दशक में भूमि सुधार क़ानून लागू किए थे. उन्होंने वर्ष 1968 से 1971 तक केरल उच्च न्यायालय में न्यायाधीश की भूमिका निभाई. वह दो वर्षो तक विधि आयोग के भी सदस्य रहे. वर्ष 1973 में उन्हें सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया. इस पद से वह 1980 में सेवानिवृत्त हुए. अय्यर ने अपने जीवन में 105 किताबें लिखीं. वर्ष 1937 उन्होंने मद्रास लॉ कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली थी.
न्यायमूर्ति अय्यर का जन्म वर्ष 1914 में केरल के पलक्कड़ में एक रूढ़िवादी तमिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था. वह साम्यवाद की ओर आकर्षित हुए और राज्य में दिवंगत ईएमएस नम्बूदिरिपाद के नेतृत्व में विश्व की सबसे पहली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार में मंत्री बने. अय्यर ने दबे कुचलों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में जमानत संबंधी नियमों की पुनर्व्याख्या की.
कृष्ण अय्यर ने सर्वोच्च न्यायालय में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अपील ठुकरा दी थी, जो उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ की गई थी. गौरतलब है कि हाई कोर्ट ने उनके चुनाव को खारिज कर दिया था और अपील स्वीकार न होने से उनकी संसद की सदस्यता चली गई थी. जस्टिस अय्यर ने ही जस्टिस पीएन भगवती के साथ मिलकर जनहित याचिकाओं का आरंभ किया था.
केरल में वर्ष 1948 में कम्युनिस्टों को छिपाने के आरोप में उन्हें जेल भी जाना पड़ा था. वामपंथियों के आदर के पात्र रहे अय्यर वर्ष 1952 में मद्रास विधानसभा का चुनाव निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लड़े और विधायक चुन लिए गए. वर्ष 1957 में वे फिर केरल विधानसभा के लिए चुने गए और वामपंथी सरकार में मंत्री बन गए.
गौरतलब है कि उनको सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश बनाने का सोली सोराबजी ने उनके वामपंथी रुझान के कारण विरोध किया था. वे सर्वोच्च न्यायालय के आखिरी ऐसे न्यायाधीश रहे जो कभी राजनेता हुआ करते थे. अय्यर ने विचाराधीन क़ैदियों के हित में 'जेल नहीं ज़मानत ही नियम है' का निर्णय दिया था. 1970 के दशक में वो क़रीब सात वर्ष तक सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे.
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