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भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संशोधन

संविधान के अनुच्छेद 368 में संशोधन की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है. इसमें संशोधन की तीन विधियों को अपनाया गया है:  साधारण विधि द्वारा संशोधन, संसद के विशेष बहुमत द्वारा और संसद के विशेष बहुमत और राज्य के विधान-मंडलों की स्वीकृति से संशोधन I पहले संशोधन (1951) में नौंवी अनुसूची को शामिल किया गया था I
Jun 24, 2016 12:35 IST
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संविधान के अनुच्छेद 368 में संशोधन की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है. इसमें संशोधन की तीन विधियों को अपनाया गया है:  साधारण विधि द्वारा संशोधन, संसद के विशेष बहुमत द्वारा और संसद के विशेष बहुमत और राज्य के विधान-मंडलों की स्वीकृति से संशोधन I

संविधान संशोधन को तीन विधियों से किया जा सकता है:
(a) साधारण विधि द्वारा संशोधन,
(b) संसद के विशेष बहुमत द्वारा,
(c) संसद के विशेष बहुमत और राज्य के विधान-मंडलों की स्वीकृति से संशोधन.

1. साधारण विधि द्वारा: संसद के साधारण बहुमत द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर कानून बन जाता है. इसके अंतर्गत राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति मिलने पर निम्न संशोधन किए जा सकते हैं:
(a) नए राज्यों का निर्माण,
(b) राज्य क्षेत्र, सीमा और नाम में परिवर्तन,
(c) संविधान की नागरिकता संबंधी अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातियों की प्रशासन संबंधी तथा केंद्र द्वारा प्रशासित क्षेत्रों की प्रशासन संबंधी व्यवस्थाएं.

2. विशेष बहुमत द्वारा संशोधन: यदि संसद के प्रत्येक सदन द्वारा कुल सदस्यों का बहुमत तथा उपस्थिति और मतदान में भाग लेनेवाले सदस्यों के 2/3 मतों से विधेयक पारित हो जाएं तो राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही वह संशोधन संविधान का अंग बन जाता है. न्यायपालिका तथा राज्यों के अधिकारों तथा शक्तियों जैसी कुछ विशिष्ट बातों को छोड़कर संविधान की अन्य सभी व्यवस्थाओं में इसी प्रक्रिया के द्वारा संशोधन किया जाता है.

3. संसद के विशेष बहुमत और राज्य के विधान-मंडलों की स्वीकृति से संशोधन: संविधान के कुछ अनुच्छेदों में संशोधन के लिए विधेयक को संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत तथा राज्यों के कुल विधान मंडलों में से आधे द्वारा स्वीकृति आवश्यक है. इसके द्वारा किए जाने वाले संशोधन के प्रमुख विषय हैं:
(a) राष्ट्रपति का निर्वाचन (अनुच्छेद 54)
(b) राष्ट्रपति निर्वाचन की कार्य-पद्धति (अनुच्छेद 55)
(c) संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
(d) राज्यों की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
(e) केंद्र शासित क्षेत्रों के लिए उच्च न्यायालय
(f) संघीय न्यायपालिका
(g) राज्यों के उच्च न्यायालय
(h) संघ एवं राज्यों में विधायी संबंध
(i) सांतवी अनुसूची का कोई विषय
(j) संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व
(k) संविधान संशोधन की प्रक्रिया से संबंधित उपबंध

पहला संशोधन (1951): इसके अंतर्गत नौंवी अनुसूची को शामिल किया गया, यह संशोधन संविधान के 19वें अनुच्छेद में दिए गए किसी भी व्यापारया कारोबार पर बोलने या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के प्रति प्रतिबंध के कई नए आधार प्रदान करता है।

  • 7वां (सातवां) संशोधन (1956): राज्यों का पुनर्गठन (14 राज्य, 6 केंद्र शासित प्रदेश)
  • 13वां (तेरहवां) संशोधन (1962): नगालैंड को राज्य बनाया।
  • 14वां (चौदहवां) संशोधन (1962): पहली अनुसूची में पॉन्डिचेरी को शामिल किया गया।
  • 18वां (अठारहवां) संशोधन (1969): पंजाब राज्य का पुनर्गठन और पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश को अलग राज्य बनाना।
  • 24वां (चौबीसवां) संशोधन (1971): गोलकनाथ के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिए फैसले की वजह से पैदा हुई परिस्थिति के संदर्भ में यह संशोधन पारित किया गया था. तदनुसार, इस अधिनियम ने मौलिक अधिकारों समेत संविधान में संशोधन करने के संसद की शक्ति के संदर्भ में सभी संदेहों को दूर करने के लिए अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 368 में संशोधन किया। ऐसा लोकतंत्र के विभिन्न स्तंभों के बीच सरकार की सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए किया गया था।
  • 31वां (इक्त्तीसवां) संशोधन (1973): लोकसभा की कुल संख्या बढ़ाकर 525 से 545 कर दी गई ( 1971 की जनगणना के आधार पर)।
  • 36वां ( छत्तीसवां) संशोधन (1975): सिक्किम राज्य की स्थापना।
  • 39वां (उन्चालीसवां) संशोधन (1975): राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और संसद के दोनों सदनों के अध्यक्ष के चुनाव को न्यायिक जांच से परे रखा।
  • 42वां (बयालिसवां) संशोधन (1976): संविधान का बयालिसवां संशोधन अधिनियम (1976) 'लघु संविधान' के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसने संविधान में कई बदलाव लाए। ये संशोधन सरकार की शक्ति को बढ़ाने के लिए किए गए थे।
  • 42वां (बयालिसवां) संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा संविधान में किए गए प्रमुख संशोधन इस प्रकार हैं–

 

  • प्रस्तावना में: भारत के ' संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य' की परिभाषा को बदलकर ' संप्रभु समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य' कर दिया गया। ' राष्ट्र की एकता' शब्द को बदलकर ' राष्ट्र की एकता और अखंडता' किया गया।
  • विधानमंडलः लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया गया।
  • कार्यपालिका:-राष्ट्रपति अपने कर्तव्यों का निर्वहन मंत्रि परिषद की सलाह पर करेंगें, इसे स्पष्ट रूप से कहने के लिए अनुच्छेद 74 में संशोधन किया गया।
  • न्यायपालिकाः राज्य कानून की संवैधानिक वैधता पर सुप्रीम कोर्ट के विचार करने की शक्ति को खत्म करने के लिए बयालिसवें संशोधन अधिनियम में अनुच्छेद 32ए को शामिल किया गया। एक और नया प्रावधान। अनुच्छेद 131ए, ने सुप्रीम कोर्ट और विशेष अधिकारक्षेत्र को केंद्रीय कानून की संवैधानिक वैधता से संबंधित सवाल का निर्धारण करने की शक्ति प्रदान की।
  • अनुच्छेद 144 ए और अनुच्छेद 128 एः संविधान संशोधन अधिनियम ने कानून की संवैधानिकता की न्यायिक समीक्षा पर विचार किया। अनुच्छेद 144ए के तहत केंद्रीय या राजकीय कानून की संवैधानिक वैधता पर प्रश्न पर फैसला करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जजों की न्यूनतम संख्या कम– से– कम सात हो, निर्धारित कर दी गई थी और इसके अलावा, कानून को असंवैधानिक घोषित करने के लिए जजों की दो– दो– तिहाई बहुमत की आवश्यकता है हालांकि मौलिक अधिकारों की शक्ति के मामले में उच्च न्यायालय की शक्ति अछूती रखी गई थी, 'किसी भी अन्य उद्देश्य' के लिए रिट जारी करने की इसकी शक्ति पर कई प्रतिबंध लगाए गए थे।
  • केंद्र और राज्य के संबंधः किसी भी राज्य में कानून और व्यवस्था की गंभीर स्थिति से निपटने के लिए संघ के किसी भी सेना या उसके नियंत्रण वाली किसी भी अन्य सेना को राज्य में तैनात करने में सक्षम बनाने के लिए अधिनियम ने संविधान में अनुच्छेद 257ए को शामिल किया।
  • मौलिक अधिकार और निर्देशक सिद्धांतः बयालिसवें (42वें) संशोधन अधिनियम द्वारा किया गया सबसे प्रमुख संशोधन था अनुच्छेद 14, 19 या 31 में दिए गए मौलिक अधिकार पर सभी निर्देशक सिद्धांतों को प्रधानता देना। बयालिसवें (42वें) संविधान संशोधन ने कुछ और निर्देशक सिद्धांत शामिल किए जैसे मुफ्त कानूनी सहायता, उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी, देश में पर्यावरण एवं वन और वन्यप्राणियों का संरक्षण।
  • मौलिक कर्तव्यः बयालिसवां ( 42वें) संशोधन अधिनियम ने एक नए भाग जिसे संविधान का  IV-ए कहा गया, बनाने के लिए अनुच्छेद 51–ए को शामिल किया, जिसमें नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों की बात की गई है।
  • आपातकालः बयालिसवें ( 42वें) संशोधन अधिनियम से पहले, राष्ट्रपति अनुच्छेद 352 के तहत पूरे देश में आपातकाल की घोषणा कर सकते थे लेकिन देश के सिर्फ एक हिस्से में नहीं। यह अधिनियम राष्ट्रपति को देश के किसी भी हिस्से में आपातकाल लगाने का अधिकार देता है।
  • चवालिसवां (44वां) संशोधन (1978):
  • लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल छह वर्षों से कम कर पांच वर्षों का कर दिया गया– सामान्य कार्यकाल जिसे बयालिसवें संशोधन के तहत आपातकाल के दौरान बढ़ाया गया था ताकि कुछ राजनितिक उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके।

संविधान के चवालिसवें (44वां) संशोधनके अनुसार संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं बल्कि सिर्फ कानूनी अधिकार है।
इस अधिनियम की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि आगे की जाने वाली किसी भी आपातकाल की घोषणा राष्ट्रपति मंत्रिमंडल द्वारा लिखित में दिए जाने वाले सलाह को प्राप्त करने के बाद ही करेंगे। मंत्रिमंडल से विचारविमर्श किए बिना प्रधानमंत्री द्वारा दी गई सलाह के आधार पर राष्ट्रपति आपातकाल की घोषणा नहीं करेंगे। इसके अलावा, घोषणा के एक महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों में दो– तिहाई बहुमत द्वारा अपनाया जाएगा।

  • 52वां संशोधन (1985): दसवीं अनुसूची को जोड़ा गया जिसमें उल्लंघन के आधार पर अयोग्य घोषित करने का प्रावधान है।
  • 53वां संशोधन (1986): केंद्रशासित मिजोरम को राज्य का दर्जा दिया।
  • 55वां संशोधन (1986): केंद्र शासित अरुणाचल प्रदेश को राज्य का दर्जा दिया।
  • 56वां संशोधन (1987): गोवा को राज्य बनाया गया।
  • 61वां संशोधन (1989): मतदान की उम्र को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया।
  • 71वां संशोधन (1992): कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
  • 73वां संशोधन (1992): 73वां संविधान संशोधन अधिनियम ने संविधान में भाग IX और अनुसूची XI को शामिल किया और ग्रामीण स्थानीय प्रशासन (पंचायतों) की व्यवस्था की।
  • 74वां संशोधन (1992): 74वां संविधान संशोधन अधिनियम ने संविधान में भाग IX– ए और अनुसूची XII को शामिल किया और शहरी स्थानीय प्रशासन (नगरपालिकाओं) की व्यवस्था की।
  • 86 वां संशोधन (2002): यह (i) नए अनुच्छेद 21 ए को शामिल करता है जिसमें राज्य कानून द्वारा, निर्धारित तरीके से छह से चौदह वर्ष के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा, का प्रावधान है।
  • 91वां संशोधन (2003): यह अनुच्छेद कहता है कि मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री समेत मंत्रियों की कुल संख्या लोकसभा के कुल सदस्यों के पंद्रह प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।
  • 92वां संशोधन (2003): यह अनुच्छेद संविधान की आठवीं अनुसूची में चार नई भाषाओं– बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली, को शामिल करने के बारे में है।
  • 94वां संशोधन (2006): यह अनुच्छेद कहता है कि संविधान के अनुच्छेद 164 की उपधारा (1) में, प्रावधान में, "बिहार" शब्द के लिए, "छत्तीसगढ़, झारखंड" शब्दों को प्रतिस्थापित किया जाएगा।