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मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री वास्तविक कार्यकारी होता है, राज्यपाल के अधीनस्थ अधिकारियों के बीच में वह सरकार का एक मुखिया होता है। उसकी स्थित/पद एक राज्य में वही होता है जो देश में प्रधानमंत्री का होता है। हमारे संविधान में एक मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त होने वाली विशेषताओं का स्पष्ट रूप से वर्णन नहीं किया गया है। हमारे संविधान के अनुच्छेद 167 के तहत राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल और मंत्रियों की राज्य परिषद के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करता है।
Dec 16, 2015 17:15 IST
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मुख्यमंत्री वास्तविक कार्यकारी होता है, राज्यपाल के अधीनस्थ अधिकारियों के बीच में वह सरकार का एक मुखिया होता है। उसकी स्थित/पद एक राज्य में वही होता है जो देश में प्रधानमंत्री का होता है। हमारे संविधान में एक मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त होने वाली विशेषताओं का स्पष्ट रूप से वर्णन नहीं किया गया है। हमारे संविधान के अनुच्छेद 167 के तहत राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल और मंत्रियों की राज्य परिषद के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करता है।

मुख्यमंत्री वास्तविक कार्यकारी होता है, राज्यपाल के अधीनस्थ अधिकारियों के बीच में वह सरकार का एक मुखिया होता है। उसकी स्थित या पद एक राज्य में वहीं होता है जो देश में प्रधानमंत्री का होता है।

नियुक्ति

हमारे संविधान में एक मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त होने वाली विशेषताओं का स्पष्ट रूप से वर्णन नहीं किया गया है।

शक्तियां और कार्य

मुख्यमंत्री की शक्तियों और कार्यों को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है:

मंत्रियों परिषद के गठन का अधिकार -

मंत्रियों की राज्य परिषद के लिए मुख्यमंत्री के पास निम्नलिखित शक्तियां होती हैं-

1. वह (मुख्यमंत्री) एक मंत्री के रूप में किसी भी व्यक्ति को नियुक्त करने के लिए राज्यपाल को सलाह दे सकता है। केवल मुख्यमंत्री की सलाह के अनुसार ही राज्यपाल मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं।

2. वह आवश्यकता के अनुसार कभी भी मंत्रियों और विभागों के बीच आबंटन और फेरबदल कर सकता है।

3. राय/विचारों के अंतर के मामले में वह मंत्री को इस्तीफा देने के लिए कह सकता है, अगर वह (मंत्री) इस्तीफा नहीं देता है तो मुख्यमंत्री उसे बर्खास्त करने के लिए राज्यपाल को सलाह दे सकते हैं।

4. वह सभी मंत्रियों का निर्देशन, मार्गदर्शन देने के साथ- साथ सभी गतिविधियों को नियंत्रित करता है।

5. अपने अनुसार अपने मंत्री परिषद की नियुक्ति के साथ से ही वह उसके इस्तीफा देने या मौत की स्थिति में ही पूरी मंत्रिपरिषद को भंग किया जा सकता है।

राज्यपाल से संबंध -

हमारे संविधान के अनुच्छेद 167 के तहत राज्यों के मुख्यमंत्री राज्यपाल और मंत्रियों की राज्य परिषद के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करता है। राज्यपाल से संबंधित कार्य निम्न प्रकार हैं:

1) मुख्यमंत्री राज्यपाल से राज्य के प्रशासन से संबंधित मंत्रियों की परिषद के सभी निर्णयों पर संवाद करते हैं।

2) जब कभी भी राज्यपाल प्रशासन के बारे में लिए गये निर्णयों से संबंधित कोई भी जानकारी मांगते हैं तो तब मुख्यमंत्री को उस जानकारी को राज्यापल को प्रदान करना या करवाना होता है।

3) जब एक निर्णय कैबिनेट के विचार के बिना लिया गया है तो तब राज्यपाल मंत्रियों की परिषद के विचार के लिए पूछ सकते हैं।

4) मुख्यमंत्री महत्वपूर्ण अधिकारियों की नियुक्ति के संबंध में जैसे- अटॉर्नी जनरल, राज्य लोक सेवा आयोग (अध्यक्ष और सदस्य), राज्य निर्वाचन आयोग आदि के बारे में राज्यपाल के साथ सलाह मशविरा करते हैं।

सरकार की एक मंत्रिमंडल के रूप में अंतत: मुख्यमंत्री ही मतदाताओं के लिए जिम्मेदार होता है। हालांकि वह राज्य का मुखिया होता है लेकिन उसे राज्यपाल को प्रोत्साहित करने और चेतावनी देने के लिए मदद करने हेतु गवर्नर के साथ " सही परामर्श किया जाने वाले नियम" (सरकारिया आयोग की सिफारिश के अनुसार) का पालन करना पड़ता है।

राज्य विधायिका से संबंध-

1) उसके द्वारा घोषित की गयी सभी नीतियों को सदन के पटल पर रखना होता है।

2) वह राज्यपाल को विधान सभा भंग करने की सिफारिश करता है।

3) वह समय- समय पर राज्य विधान सभा के सत्र के आयोजन और स्थगन के बारे में राज्यपाल को सलाह देता है।

अन्य कार्य

1) जमीनी स्तर पर उसके पास नियमित रूप से लोगों के साथ संपर्क में रहने का अधिकार है और लोगों की समस्याओं के बारे में जानकारी लेना है जिससे कि वे मुद्दे विधानसभा के पटल पर रखे जा सके और उनके बारे में नीतियां बन सकें।

2) वह राज्य योजना आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करता है।

3) वह एक वर्ष की अवधि के लिए रोटेशन (परिक्रमण) संबंधित क्षेत्रीय परिषद का उपाध्यक्ष होता है।

4) आपात स्थिति में वह राजनीतिक स्तर पर प्रमुख रूप से एक संकट प्रबंधक के रूप में कार्य करता है।