भारतीय रेलवे में ब्रॉड गेज, मीटर गेज और नैरो गेज में क्या अंतर होता है?

Oct 11, 2018, 19:02 IST

भारतीय रेल सबके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. अकसर सफर करते वक्त क्या आपने ध्यान दिया है कि रेल की कुछ पटरियां चौड़ी, कुछ कम चौड़ी और कुछ अधिक चौड़ी होती हैं. आइये इस लेख के माध्यम से अध्ययन करते हैं कि इन पटरियों के बीच में अंतर क्यों होता है और इसको क्या कहा जाता है.

Difference between Broad Gauge, Meter Gauge and Narrow Gauge in Indian Railway
Difference between Broad Gauge, Meter Gauge and Narrow Gauge in Indian Railway

अकसर ट्रेन में आपने सफर किया होगा. इसको यातायात का एक अच्छा साधन माना जाता है. इसके जरिये लोग आराम से एक जगह से दूसरी जगह जा पाते हैं. परन्तु क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि रेल की कुछ पटरियां चौड़ी होती हैं, कुछ कम चौड़ी और कुछ अधिक चौड़ी होती हैं. इन्हें बड़ी लाइन, छोटी लाइन भी कहा जाता है. ऐसा क्यों? आइये इस लेख के माध्यम से ट्रेन में ब्रॉड गेज, मीटर गेज और नैरो गेज में क्या अंतर होता है के बारे में अध्ययन करते हैं.

सबसे पहले अध्ययन करेंगे कि रेल गेज क्या होता है?

रेलवे ट्रैक का गेज दो पटरियों के भीतरी पक्षों के बीच की स्पष्ट न्यूनतम लंबवत दूरी को रेलवे गेज कहते हैं. यानी किसी रेल मार्ग पर दो पटरियों के मध्य की दूरी ही रेलवे गेज कहलाती है. लगभग साठ प्रतिशत दुनिया की रेलवे 1,435 mm की मानक गेज का उपयोग करती है. भारत में 4 प्रकार के रेलवे गेज का उपयोग होता है. ब्रॉड गेज (broad gauge), मीटर गेज (meter gauge), नैरो गेज (narrow gauge) और स्टैण्डर्ड गेज (standard gauge) (दिल्ली मेट्रो के लिए). आइये इनके बारे में अध्ययन करते हैं.

ब्रॉड गेज (Broad Gauge)

ब्रॉड गेज को चौड़ा गेज अथवा बड़ी लाइन भी कहा जाता है. इन रेलवे गेज में दो पटरियों के मध्य की दूरी 1676 mm (5 ft 6 in) की होती है. ऐसा कहना भी गलत नहीं होगा कि मानक गेज या 1,435 mm (4 फीट 8½ इंच) से चौड़े किसी भी गेज को ब्रॉड गेज कहा जाता है. भारत में निर्मित पहली रेलवे लाइन 1853 में बोरी बंदर (अब छत्रपति शिवाजी टर्मिनस) से ठाणे तक ब्रॉड गेज लाइन ही थी. क्रेन इत्यादि के लिए बंदरगाहों पर ब्रॉड गेज रेलवे का प्रयोग भी होता है. इससे बेहतर स्थिरता आती है और साथ ही ये पतले गेजों की अपेक्षा कहीं बेहतर होते हैं.

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मानक गेज या स्टैण्डर्ड गेज (Standard Gauge)

इस रेलवे गेज में दो पटरियों के मध्य की दूरी 1435 mm (4 ft 8½ in) होती है.  भारत में, मानक गेज का उपयोग केवल शहरी रेल ट्रांजिट सिस्टम जैसे मेट्रो, मोनोरेल और ट्राम के लिए किया जाता है. 2010 तक, भारत में एकमात्र मानक गेज लाइन कोलकाता (कलकत्ता) ट्राम प्रणाली थी. शहरी क्षेत्रों में आने वाली सभी मेट्रो लाइनों को केवल मानक गेज में बनाया जाएगा क्योंकि भारतीय गेज के मुकाबले मानक गेज के लिए रोलिंग स्टॉक हासिल करना आसान है. 2016 तक, संचालन की लाइनें दिल्ली मेट्रो, रैपिड मेट्रो रेल गुड़गांव, बैंगलोर मेट्रो और मुंबई मेट्रो हैं. इन सभी को भारतीय रेलवे से अलग से संचालित किया जाता है.

What is broad gauge, meter gauge and narroe gauge in Indian Railway

मीटर गेज (Metre Gauge)

इनमें दो पटरियों के बीच की दूरी 1,000 mm (3 ft 3 3⁄8 in) होती है. लागत को कम करने के लिए मीटर गेज लाइनों को बनाया गया था. नीलगिरी माउंटेन रेलवे जो कि भारत में एक मीटर गेज पर चलने वाली एक विरासत है को छोड़कर सभी मीटर गेज लाइनें को परियोजना यूनिगेज के अंतर्गत ब्रॉड गेज में परिवर्तित कर दिया जाएगा.

नैरो गेज (Narrow Gauge)

छोटे गेज को नैरो गेज या छोटी लाइन कहा जाता है. नैरो गेज रेलवे का वह रेल ट्रैक होता है, जिसमें दो पटरियों के बीच की दूरी 2 ft 6 in (762 mm) और 2 ft (610 mm) होती है. भारत में संकीर्ण गेज (मीटर गेज के विपरीत) लाइनों के रूप में भी नैरो गेज को जाना जाता है. 2015 में 1,500 किलोमीटर का नैरो गेज का रेल मार्ग था जो कि लगभग 2% कुल भारतीय रेल नेटवर्क का माना जाता है. जैसे-जैसे देश में विकास हो रहा है छोटी लाइन की सेवाएं 2018 तक समाप्त होने की उम्मीद जताई जा रही है. अब छोटी लाइनों को बड़ी लाइनों में बदला जा रहा है. छुक-छुक करते फर्राटा भरने वाली छोटे-छोटे डिब्बे वाली ट्रेनें अब ज्यादा देखने को नहीं मिलेंगी. दार्जीलिंग पर्वतीय रेलवे (toy train) को यूनेस्को ने 24 जुलाई 2008 को विश्व धरोहर घोषित किया. कालका शिमला रेलवे भी काफी लोकप्रीय है.

गेज को प्रभावित करने वाले कारक

- यातायात की स्थिति: यदि ट्रैक पर यातायात की तीव्रता अधिक होने की संभावना हो, तो स्टैण्डर्ड गेज के बजाए ब्रॉड गेज उपयुक्त होगा.

- गरीब क्षेत्रों का विकास: एक गरीब क्षेत्र विकसित करने के लिए दुनिया के कुछ हिस्सों में नैरो गेज लगाए गए हैं और इस प्रकार गरीब क्षेत्र को बाहरी विकसित दुनिया से जोड़ा गया.

- ट्रैक की लागत: रेलवे ट्रैक की लागत सीधे इसके गेज की चौड़ाई के आनुपातिक होती है. यदि उपलब्ध फंड स्टैण्डर्ड गेज बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है और उस क्षेत्र में कोई रेलवे लाइन नहीं होने के कारण मीटर गेज या नैरो गेज को प्राथमिकता दी जाती है.

- ट्रेन की गति:
एक ट्रेन की गति पहिया के व्यास का एक फंक्शन है जो बदले में गेज द्वारा सीमित होता है.
पहिये का व्यास आमतौर पर गेज की चौड़ाई के 0.75 गुना होता है और इस प्रकार, ट्रेन की गति गेज के लगभग आनुपातिक होती है.
यदि उच्च गति को प्राप्त करना है तो ब्रॉड गेज ट्रैक को मीटर गेज या नैरो गेज ट्रैक के बनिस्पत प्राथमिकता दी जाती है.

तो अब आपको ज्ञात हो गया होगा कि ब्रॉड गेज, स्टैण्डर्ड गेज, मीटर गेज और नैरो गेज में क्या अंतर होता है.

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Shikha Goyal is a journalist and a content writer with 9+ years of experience. She is a Science Graduate with Post Graduate degrees in Mathematics and Mass Communication & Journalism. She has previously taught in an IAS coaching institute and was also an editor in the publishing industry. At jagranjosh.com, she creates digital content on General Knowledge. She can be reached at shikha.goyal@jagrannewmedia.com
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