वैश्विक जलवायु परिवर्तन का पहले से ही पर्यावरण पर गहरा प्रभाव पड़ा है। उदाहरण के लिए- ग्लेशियर का पिघलना, नदियों और झीलों में बाढ़ जैसी स्थिति आना, पौधे और पशुवों का स्थानांतरित होना और पेड़ पेड़ों पर समय रहते फूल खिलना। भूमंडलीय ऊष्मीकरण या ग्लोबल वॉर्मिंग पृथ्वी के वायुमंडल और उसके महासागरों के औसत तापमान में क्रमिक वृद्धि का वर्णन करता है, ऐसा माना जाता है कि यह परिवर्तन स्थायी रूप से पृथ्वी की जलवायु को बदल रहा है। जबकि अल्बेडो सौर विकिरण की मात्रा है जो किसी न किसी सतह से परिलक्षित होती है, और अक्सर प्रतिशत या दशमलव मान के रूप में व्यक्त की जाती है।
भूमंडलीय ऊष्मीकरण (या ग्लोबल वॉर्मिंग) का अर्थ पृथ्वी की निकटस्थ-सतह वायु और महासागर के औसत तापमान में 20वीं शताब्दी से हो रही वृद्धि और उसकी अनुमानित निरंतरता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, धरती के वातावरण के तापमान में लगातार हो रही विश्वव्यापी बढ़ोतरी को 'ग्लोबल वार्मिंग' कहा जा रहा है। हमारी धरती सूर्य की किरणों से उष्मा प्राप्त करती है। ये किरणें वायुमंडल से गुजरती हुईं धरती की सतह से टकराती हैं और फिर वहीं से परावर्तित होकर पुन: लौट जाती हैं।
एल्बीडो क्या है?
अपने ऊपर पड़ने वाले किसी सतह के प्रकाश या अन्य विद्युतचुंबकीय विकिरण (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन) को प्रतिबिंबित करने की शक्ति की माप को एल्बीडो कहते हैं। इसे प्रकाशानुपात या धवलता भी कहते हैं। अगर कोई वस्तु अपने ऊपर पड़ने वाले प्रकाश को पूरी तरह वापस चमका देती है तो उसका एल्बीडो 1.0 या प्रतिशत 100% कहा जाता है। खगोलशास्त्र में अक्सर खगोलीय वस्तुओं का एल्बीडो जाँचा जाता है। पृथ्वी का एल्बीडो 30 से 35% के बीच में है। पृथ्वी के वायुमंडल के बादल बहुत रोशनी को प्रतिबिंबित कर देते हैं। अगर बादल न होते तो पृथ्वी का एल्बीडो कम होता। परिभाषा के अनुसार, हम कह सकते हैं कि प्रत्येक वस्तु का एक अलग एल्बीडो होता है।
यह उल्लेखनीय है कि उच्च एल्बीडो वाली वस्तुओं की तापमान कम होती है या यू कहे तो ठंडी होती हैं और निम्न एल्बीडो वाली वस्तुओं की तापमान ज्यादा होती है या बहुत गर्म होती है। जिस वस्तु में शून्य एल्बीडो होता है वह 100% विकिरण को ग्रहण कर सकती है। उदाहरण के लिए- काले रंग वाले वस्तुओं में शून्य एल्बीडो होता है और यह प्राप्त होने वाले 100% विकिरण को अवशोषित कर सकता है, जबकि सफ़ेद रंग वाली वस्तुएं सही परावर्तक होते हैं। यह हमें यह जानने में मदद करता है कि सतह कितनी अच्छी तरह सौर ऊर्जा को दर्शाती है। इसे 0 से 1 के पैमाने पर मापा जाता है।
टेरा उपग्रह पर CERES साधन द्वारा एकत्र किए गए आंकड़ों के अनुसार, पृथ्वी का एल्बीडो जलवायु प्रणाली में प्राकृतिक बदलावों के कारण उतार-चढ़ाव की प्रक्रिया में है। जलवायु प्रणाली में नाटकीय भिन्नता सिर्फ इसलिए है क्योंकि बर्फ का आवरण, क्लाउड कवर और प्रदूषण, ज्वालामुखी और धूल के तूफान से एयरोसोल जैसे वायु कणों की मात्रा दिन प्रतिदिन बढती जा रही है।
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पृथ्वी के एल्बीडो के स्थिरीकरण में भू-इंजीनियरिंग की भूमिका
भू-इंजीनियरिंग को जलवायु इंजीनियरिंग भी कहा जाता है। यह पर्यावरणीय प्रक्रियाओं के व्यापक हेरफेर की गणना करता है जो पृथ्वी की जलवायु को प्रभावित करते हैं।
कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रीनहाउस प्रभाव और पृथ्वी के एल्बीडो में कमी, ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण है। ग्रीनहाउस प्रभाव एक प्राकृतिक घटना है, जिसके माध्यम से सौर विकिरण हमारे वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों (कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, हाइड्रोफ्लोरोकार्बन, नाइट्रस ऑक्साइड, ओजोन और जल वाष्प) द्वारा रुकावट पैदा करना जिसकी वजह से पृथ्वी गर्म होती जा रही है। भू-इंजीनियरिंग या जियोइंजीनियरिंग का पहला उद्देश्य हवा से उपस्थिति कार्बन डाइऑक्साइड को कम करना या सूर्य के प्रकाश की मात्रा को पृथ्वी की सतह तक पहुचने का रास्ता तैयार करना और प्रतिबिंबित करने में जो रुकावट या अवरोध को हटाना।
दुसरे शब्दों में, यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से पृथ्वी के वायुमंडल या सतह की परावर्तकता (एल्बिडो) को जीएचजी-प्रेरित जलवायु परिवर्तन के कुछ प्रभावों को ऑफसेट करने के प्रयास से बढ़ाया जा सकता है यह तकनीक ठीक उसी प्रकार कार्य करती है जैसे बड़े ज्वालामुखी विस्फोट के बाद अपने राख या ऐसी ही अन्य चीजों से सूर्य को ढक कर पृथ्वी को ठण्डा कर देती है।
वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड की उपस्थिति को कैसे कम किया जा सकता है?
कुछ विशेषज्ञों ने वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड की उपस्थिति को कम करने के लिए कुछ कार्ययोजना का सुझाव दिया है:
1. 'कृत्रिम पेड़' का रोपण जो वास्तव में ऐसी मशीनें हैं जो प्लास्टिक पॉलिमर के माध्यम से वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर सकती हैं।
2. महासागरों को भारी मात्रा में और चूने को मिलाकर एक बड़ी कार्बन सिंक के रूप में महासागरों का निर्माण करना।
3. कार्बन-कैप्चर तकनीक का उपयोग करना
4. गैसीय कार्बन को चारकोल में बदलना और उसे भूमिगत करना।
5. मवेशी चराई के आधारों को कार्बन सिंक में बदलने का एक तरीका डिजाइन करना।
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पृथ्वी के एल्बीडो को कैसे बढ़ाया जा सकता है?
भू-इंजीनियरों ने पृथ्वी की एल्बीडो को बढ़ाने के लिए कार्य योजना का सुझाव दिया है जो नीचे दिए गए हैं:
1. सल्फेट एरोसोल को स्ट्रैटोस्फियर में छिड़काव करना जो सूर्य की रोशनी को अंतरिक्ष में प्रतिबिंबित कर देगा।
2. समुद्री जल का छिड़काव।
3. परावर्तन को बढ़ाने के लिए मकानों की छतों पर सफेद रंग से पोताई करना।
4. पृथ्वी और सूर्य के बीच अंतरिक्ष में हजारों छोटे दर्पण स्थापित करना।
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