उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालय में क्या अंतर होता है

Feb 16, 2018, 13:10 IST

भारतीय न्यायिक प्रणाली आम कानून व्यवस्था के रुप में भी जानी जाती है. इसमें न्यायाधीश अपने फैसलों, आदेशों और निर्णयों से कानून का विकास करते हैं. भारत में शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट है और उसके नीचे विभिन्न राज्यों में उच्च न्यायालय हैं. उच्च न्यायालय के नीचे जिला अदालतें और उसकी अधीनस्थ अदालतें हैं. आइये इस लेख के माध्यम से अध्ययन करते है कि उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालय में क्या अंतर होता है.

Difference between High Court and Lower Court
Difference between High Court and Lower Court

राष्ट्र की न्यायपालिका में एक उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालयों का एक पद सोपान होता है. राज्य के न्यायिक प्रशासन में उच्च न्यायालय की स्थिति शीर्ष पर होती है. भरत के संविधान में प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है लेकिन सातवे संशोधन अधिनियम, 1956 में संसद को अधिकार दिया गया कि दो या दो से अधिक राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्र के लिए एक साझा न्यायालय की स्थापना कर सकती है. संसद एक उच्च न्यायालय के न्यायिक क्षेत्र का विस्तार, किसी संघ राज्य क्षेत्र में कर सकती है अथवा किसी संघ राज्य क्षेत्र को एक उच्च न्यायालय के न्यायिक क्षेत्र से बहार कर सकती है.
क्या आप जानते है कि उच्च न्यायालयों के अधीन कई श्रेणी के न्यायालय होते हैं इन्हें अधीनस्थ न्यायालय कहा जाता है. विभिन्न राज्यों में इनके अलग-अलग नाम और अलग-अलग दर्जे हैं लेकिन व्यापक परिप्रेक्ष्य में इनके संगठनात्मक ढांचे में समानता है. अधीनस्थ न्यायालय, उच्च न्यायालय के अधीन एवं उसके निर्देशानुसार जिला और निम्न स्तरों पर कार्य करते हैं. आइये इस लेख के माध्यम से अध्ययन करते हैं कि उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालय में क्या अंतर होता है.
उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालय के बीच अंतर
1. गठन
संविधान के भाग छह में अनुच्छेद 214 से 231 तक उच्च न्यायालयों के गठन, स्वतंत्रता, न्यायिक क्षेत्र, शक्तियां, प्रक्रिया आदि के बारे में बताया गया है.
संविधान के भाग छह में अनुच्छेद 233 से 237 तक अधीनस्थ न्यायालयों के संगठन एवं कार्यपालिका से स्वतंत्रता सुनिश्चित करने वाले उपबंधों का वर्णन किया गया है.
2. न्यायाधीशों की नियुक्ति  
उच्च न्यायालयों चाहे वह अन्य हो या साझा में एक मुख्य न्यायधीश और उतने न्यायधीश, जितने आवश्यकतानुसार समय-समय पर राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं और राष्ट्रपति कार्य की आवश्यकतानुसार समय-समय पर इनकी संख्या निर्धारित करते हैं.
जिला न्यायधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना एवं पदोन्नति राज्यपाल द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाती है.
3. वेतन एवं भत्ते
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश (सेवा के वेतन और शर्तें) संशोधन विधेयक, 2017 लोकसभा द्वारा पारित कर दिया गया है. 1 जनवरी, 2016 से वेतन से संबंधित प्रावधान पूर्वव्यापी रूप से अधिसूचित करने के बाद लागू होंगे. विधेयक, जो अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के लिए 7वें वेतन आयोग के अनुरूप है, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों (सेवा का वेतन और शर्तें) अधिनियम, 1954 में संशोधन हुआ. इसके तहत उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का वेतन ₹ 90,000 से प्रति माह ₹ 2,50,000 प्रति माह होगा और अन्य न्यायाधीशों का वेतन जो वर्तमान में रु 80,000 प्रति माह है, अब मासिक वेतन 2,25,000 होगा.
अधीनस्थ न्यायालय में वर्तमान में एक जूनियर सिविल जज का वेतन रु 45,000 है, जबकि एक वरिष्ठ न्यायाधीश को लगभग रु 80,000 मिलता है. वेतन में वृद्धि आदि से सम्बंधित आयोग अपनी सिफारिशों को 2019 के आरंभ में प्रस्तुत करेगा.
4. न्यायधीशों की योग्यताएं
उच्च न्यायालय के न्यायधीश के रूप में नियुक्ति के लिए व्यक्ति के पास निम्न योग्यताएं होनी चाहिये:
(i) वह भारत का नागरिक हो.
(ii) उसे भरत के न्याययिक कार्य में 10 वर्ष का अनुभव हो, अथवा
(iii) वह उच्च न्यायालय या न्यायालयों में लगातार 10 वर्ष तक अधिवक्ता रह चुका हो.
उपर्युक्त से यह स्पष्ट है कि संविधान में उच्च न्यायालय के न्यायधीश की नियुक्ति के लिए कोई न्यूनतम आयु सीमा निर्धारित नहीं की गई है. इसके अतिरिक्त संविधान में उच्चतम न्यायालय के विपरीत प्रख्यात न्यायविदों को उच्च न्यायालय का न्यायधीश नियुक्त करने का कोई प्रावधान नहीं है.
वह व्यक्ति जिसे जिला न्यायधीश के रूप में नियुक्त किया जाता है, उसमें निम्न योग्यतायें होनी चाहिए:
(i) वह केंद्र या राज्य सरकार में किसी सेवा में कार्यरत न हो.
(ii) उसे कम से कम सात वर्ष का अधिवक्ता का अनुभव हो.
(iii) उच्च न्यायालय ने उसकी नियुक्ति की सिफारिश की हो.
राज्यपाल, जिला न्यायधीश से भिन्न व्यक्ति को भी न्यायिक सेवा में नियुक्त कर सकता है किन्तु वैसे व्यक्ति को, राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय के परामर्श के बाद ही नियुक्त किया जा सकता है.

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5. न्यायधीशों का कार्यकाल
संविधान में उच्च न्यायालय के न्यायधीशों का कार्यकाल निर्धारित नहीं किया गया है. तथापि, इस संबंध में चार प्रावधान किए गये हैं:
(i) 62 वर्ष की आयु तक पद पर रहता है. उसकी आयु के संबंध में किसी भी प्रश्न का निर्णय राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायधीश से परामर्श करता है. इस संबंध में राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम होता है.
(ii) वह, राष्ट्रपति को त्यागपत्र भेज सकता है.
(iii) संसद की सिफारिश से राष्ट्रपति उसे पद से हटा सकता है.
(iv) उसकी नियुक्ति उच्चतम न्यायालय में न्यायधीश के रूप में हो जाने पर या उसका किसी दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरण हो जाने पर वह पद छोड़ देता है.
अधीनस्थ न्यायालय के न्यायधीश 60 वर्ष की आयु तक पद पर रहते है.
6. उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है ताकि कोई भी व्यक्ति या व्यक्ति का समूह या एक राज्य द्वारा इसे नष्ट न किया जा  सके और इसके  उल्लंघन पर सजा दी जा सके.
परन्तु अधीनस्थ न्यायालय के पास किसी भी मौलिक अधिकार के उल्लंघन के संबंध में किसी भी मामले को सुनने या खत्म करने की कोई भी शक्ति नहीं होती है.
7. न्यायधीशों को हटाना
उच्च न्यायालय के न्यायधीश को राष्ट्रपति के आदेश से पद से हटाया जा सकता है. राष्ट्रपति न्यायधीश को हटाने का आदेश संसद द्वारा उसी सत्र में पारित प्रस्ताव के आधार पर ही जारी कर सकता है. प्रस्ताव को विशेष बहुमत के साथ संसद के प्रत्येक सदन का समर्थन मिलना आवश्यक है.
अधीनस्थ न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने के लिए महाभियोग के रूप में कोई स्थापित प्रक्रिया नहीं है हालांकि, संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के परामर्श से राज्य सरकार द्वारा एक जिला न्यायालय के न्यायाधीश या अतिरिक्त न्यायाधीशों को अपने कार्यालय से हटाया जा सकता है.
इस लेख से हमने ज्ञात किया की उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालय में क्या-क्या अंतर होते हैं.

Shikha Goyal is a journalist and a content writer with 9+ years of experience. She is a Science Graduate with Post Graduate degrees in Mathematics and Mass Communication & Journalism. She has previously taught in an IAS coaching institute and was also an editor in the publishing industry. At jagranjosh.com, she creates digital content on General Knowledge. She can be reached at shikha.goyal@jagrannewmedia.com
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