नाटो’ क्यों और कब बना था?

नाटो (NATO) का पूरा नाम है, North Atlantic Treaty Organization (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) है. नाटो की स्थापना 4 अप्रैल 1949 हुई थी. यह एक अंतर-सरकारी सैन्य गठबंधन है, इसे उत्तर अटलांटिक एलायंस भी कहा जाता है.वर्तमान में इसके 29 सदस्य देश हैं. नाटो से सबसे बाद में जुड़ने वाले देश हैं; अल्बानिया और क्रोएशिया हैं. इन दोनों ने वर्ष 2009 में नाटो की सदस्यता ग्रहण की थी. नाटो का मुख्यालय ब्रसेल्स, बेल्जियम में है.
Dec 4, 2018 18:56 IST
    NATO

    नाटो के बारे में

    NATO (नाटो) का पूरा नाम है, North Atlantic Treaty Organization (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) है. नाटो की स्थापना 4 अप्रैल 1949 हुई थी. यह एक अंतर-सरकारी सैन्य गठबंधन है, इसे उत्तर अटलांटिक एलायंस भी कहा जाता है.वर्तमान में इसके 29 सदस्य देश हैं. नाटो से सबसे बाद में जुड़ने वाले देश हैं; अल्बानिया और क्रोएशिया हैं. इन दोनों ने वर्ष 2009 में नाटो की सदस्यता ग्रहण की थी. नाटो का मुख्यालय ब्रसेल्स, बेल्जियम में है.

    नाटो की स्थापना क्यों हुई थी?

    द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूर्व के सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप से अपनी सेनाएँ हटाने से इंकार कर दिया और अंतर्राष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन कर 1948 में बर्लिन की नाकेबंदी कर दी. सोवियत संघ के इस कदम से अमेरिका सहित यूरोप के देशों को लगा कि सोवियत संघ वहाँ साम्यवादी शासन की स्थापना करना चाहता है. इसलिए अमेरिका ने एक ऐसा संगठन बनाने की पहल की जो कि सोवियत संघ के अतिक्रमण से पश्चिमी देशों की रक्षा कर सके.

    अतः अमेरिका ने 4 अप्रैल, 1949 को वांशिगटन में नाटो की स्थापना की, जिस पर 12 देशों ने हस्ताक्षर किए थे. ये देश थे- संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, इटली, नीदरलैंड, आइसलैण्ड, बेल्जियम, लक्जमर्ग, नार्वे, पुर्तगाल और डेनमार्क.

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    'नाटो के उद्देश्य'

    1. नाटो का उद्देश्य इसके सदस्य राष्ट्रों की राजनीतिक स्वतंत्रता और सैन्य सुरक्षा को बनाये रखना है

    2. सोवियत संघ के पश्चिमी यूरोप में विस्तार को रोकना

    3. पश्चिम यूरोप के देशों को एक सूत्र में संगठित करना

    4. कुल मिलाकर इस संघठन का मुख्य उद्येश्य सोवियत संघ के खिलाफ पूरे विश्व समुदाय को एकजुट करना और अमेरिका के प्रभाव को बढ़ाना था.

    नाटो ऑपरेशन के बारे में

    नाटो विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन यदि राजनयिक प्रयास विफल हो जाते हैं, तो यह किसी समस्या का समाधान करने के लिए सैन्य शक्ति का सहारा भी लेता है. आपको याद होगा कि नाटो देशों की संयुक्त सेना ने अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ संयुक्त युद्ध लड़ा था और कुछ ऑपरेशन आज भी जारी हैं. इसके अलावा अभी नाटो की संयुक्त सेना कोसोवो, अफ्रीका और भूमध्य सागर के क्षेत्र में सक्रीय है.

    आज भी नाटो के सदस्य देशों के अधिकारी, आम नागरिक और सैन्य विशेषज्ञ रोजाना सैन्य और राजनीतिक मुद्दों पर जानकारी देने और सलाह मशविरा और आवश्यकतानुसार निर्णय तैयार करने में मदद मांगने के लिए के लिए रोजाना नाटो के हेड ऑफिस में जाते हैं.

    नाटो की संरचना

    उत्तर अटलांटिक परिषद की बैठकों की अध्यक्षता महासचिव करता है और जब निर्णय लेना होता है, तो सर्वसम्मति और सामान्य समझौते के आधार पर कार्रवाई पर सहमति होती है. यहाँ पर बहुमत या मतदान के माध्यम से कोई निर्णय नहीं लिया जाता है.

    नाटो के मुख्य 4 अंग हैं;

    1. महासचिव (Secretary General): यह नाटों का सर्वोच्च अंग है. इसमें सदस्य देशों के सिविल सर्वेंट होते हैं. इसकी मंत्रिस्तरीय बैठक वर्ष में एक बार होती है. महासचिव का मुख्य उत्तरायित्व समझौते की धाराओं को लागू करना होता है. यह नाटो का मुख्य प्रवक्ता भी होता हैं.

    2. परमाणु योजना समूह (Nuclear Planning Group): परमाणु नीति समूह के पास परमाणु नीति के मुद्दों के संबंध में उत्तरी अटलांटिक परिषद के समान अधिकार है.

    3. सैनिक समिति (Military Committee): इसका मुख्य कार्य नाटों परिषद् एवं उसकी प्रतिरक्षा समिति को सलाह देना है. इसमें सदस्य देशों के सेनाध्यक्ष शामिल होते हैं. जब किसी मुद्दे पर राजनीतिक तरीके से समाधान नहीं निकलता है तो फिर उसके लिए मिलिट्री ऑपरेशन का रास्ता अपनाया जाता है.

    नाटो के पास अपनी खुद की सेना बहुत कम होती है. इसलिए जब किसी देश के खिलाफ मिलिट्री ऑपरेशन की बात आती है तो सदस्य देश स्वेच्छा से इस अभियान के लिए अपनी सेना भेजते हैं और जब मिशन पूरा हो जाता है तो सेना अपने देशों में दुबारा लौट जाती है.

    4. उप समिति (Subordinate Committees): यह परिषद् नाटों के सदस्य देशों द्वारा नियुक्त कूटनीतिक प्रतिनिधियों की परिषद् है. ये नाटो के संगठन से सम्बद्ध सामान्य हितों वाले विषयों पर विचार करते हैं.

    इस प्रकार ऊपर दिए गए विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि नाटो अपने सदस्य देशों के हितों की रक्षा के लिए ना सिर्फ राजनीतिक तरीका अपनाता है बल्कि जरूरत पड़ने पर सैनिक उपयोग से भी पीछे नहीं हटता है. इस संगठन की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें अमेरिका का दबदबा है और यह देश ही तय करता है कि किस देश के खिलाफ सैन्य कार्यवाही की जाये या नहीं.

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