ट्राईफेड क्या है और इसके क्या उद्येश्य हैं?

TRIFED का पूरा नाम “द ट्राइबल कोऑपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया” है. यह 1987 में स्थापित किया गया था जबकि इसने अप्रैल 1988 से अपना काम शुरू किया था. ट्राइफेड का मूल उद्देश्य आदिवासी लोगों द्वारा जंगल से एकत्र किये गए या इनके द्वारा बनाये गए उत्पादों को बाजार में सही दामों पर बिकवाने की व्यवस्था करना है.
Mar 29, 2019 15:52 IST
    TRIFED PRODUCTS

    भारत को गांवों का देश कहा जाता है. आजादी के 72 वर्षों के बाद भी देश की लगभग 70% आबादी अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और देश की लगभग 55% आबादी कृषि गतिविधियों में लगी हुई है. इसलिए सरकार की यह जिम्मेदारी बन जाती है कि वह इन वर्गों के कल्याण को बढ़ाने के लिए हर आवश्यक कदम उठाए.

    इस लेख में आदिवासी लोगों के कल्याण के लिए बनाये गए ट्राईफेड के बारे में बताया गया है.

    कृषि उत्पादकों को उनके उत्पादों की अच्छी कीमत प्रदान करने के लिए सरकार ने 1985 में कमीशन फॉर एग्रीकल्चरल कॉस्ट एंड प्राइसेस (CACP) की स्थापना की, जो 22 कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price) घोषित करता है. इसी तरह सरकार ने देश के आदिवासी समुदायों द्वारा बनाए गए उत्पादों को उचित मूल्य प्रदान करने के लिए 1987 में TRIFED की स्थापना की थी.

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    ट्राईफेड क्या है?

    TRIFED का पूरा नाम “द ट्राइबल कोऑपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया” है. यह 1987 में स्थापित किया गया था जबकि इसने अप्रैल 1988 से अपना काम शुरू किया था. ट्राइफेड का मूल उद्देश्य आदिवासी लोगों द्वारा जंगल से एकत्र किये गए या इनके द्वारा बनाये गए उत्पादों को बाजार में सही दामों पर बिकवाने की व्यवस्था करना है.

    गेहूं और धान की सरकारी खरीद के लिए ट्राईफेड, भारतीय खाद्य निगम (FCI) के एजेंट और मोटे अनाजों ,दालों और तिलहनों की सहकारी खरीद में कृषि एवं सहकारिता विभाग के एजेंट के रूप में काम करता है.

    ट्राइफेड का मुख्य कार्यालय नई दिल्ली में है. प्रधान कार्यालय के अलावा देश के विभिन्न स्थानों पर इसके 13 क्षेत्रीय कार्यालयों का नेटवर्क है.
    ट्राइफेड, जनजातीय मामलों के मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत एक राष्ट्रीय स्तर की सर्वोच्च संस्था है.

    ट्राइफेड के उद्देश्य हैं;
    1. जनजातियों द्वारा एकत्र किए गए 'माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस (एमएफपी) को उचित मूल्य उपलब्ध कराना ताकि उनकी आय बढ़ सके.

    2. उत्पादों की (एमएफपी) सतत कटाई सुनिश्चित करना.

    3. जनजातियों को व्यावसायिक मध्यस्थों के शोषण से बचाना क्योंकि ये मध्यस्थ आदिवासियों से सस्ते दामों पर उत्पाद खरीदकर उन्हें बाजार में ऊंचे दामों पर बेचकर अच्छा मुनाफा कमाते हैं लेकिन इन उत्पादों को बनाने या पैदा करने वाले गरीब ही रह जाते हैं. अर्थात ट्राइफेड ने मध्यस्थों के शोषण को ख़त्म कर दिया है.

    4. यदि उत्पादों की कीमत में उतार-चढ़ाव होता है तो ट्राइफेड कृषि मंत्रालय से जनजातियों के लिए मुआवजे की व्यवस्था करता है.

    5. ट्राइफेड द्वारा जनजातियों को इस बात का आश्वासन दिया जाता है कि उनके उत्पादों को एक निश्चित और उचित मूल्य पर खरीदा जायेगा साथ ही उन्हें उत्पादों के प्राथमिक प्रसंस्करण, भंडारण और परिवहन के लिए उचित साधनों की व्यवस्था भी की जाएगी.

    6. ट्राइफेड; 'माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस (एमएफपी) की बिक्री के लिए नए बाजारों की जानकारी भी उत्पादकों को देता है. जैसे पूरे देश के आदिवासी हर साल नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित व्यापार मेले में अपने उत्पाद बेचते हैं. कभी-कभी सरकार आदिवासी उत्पादों की बिक्री के लिए विशेष क्राफ्ट मेलों का आयोजन भी करती है.

    TRIBAL TRADE ITPO

    7. ट्राइफेड; जनजातियों को उत्पादों की अच्छी कीमत दिलाने के लिए जनजातियों की सौदेबाजी शक्ति (bargaining power) को बढ़ाने में मदद करता है ताकि उन्हें मजबूरी में कम दामों पर उत्पाद बेचने के मजबूर ना होना पड़े.

    8. ट्राइफेड जनजातियों को उनके उत्पादों के मूल्य संवर्धन (value addition to their products)के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण प्रदान करता है.

    इसलिए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ट्राइफेड जनजातियों के उत्पादों की अच्छी कीमत सुनिश्चित करने में बहुत अच्छा काम कर रहा है. यह उम्मीद की जाती है कि आने वाले वर्षों में ट्राइफेड आदिवासी समुदाय के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

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