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गुप्त साम्राज्य: एक संक्षिप्त विवरण

गुप्त साम्राज्य के काल को भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है, क्योंकि इस काल में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, कला, साहित्य, तर्कशास्त्र, गणित, खगोल विज्ञान, धर्म और दर्शन के क्षेत्र में व्यापक आविष्कार और खोज हुए थे जिन्होंने हिन्दू संस्कृति के तत्वों को प्रबुद्ध किया था| यहाँ हम गुप्त साम्राज्य का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं जो UPSC, SSC, State Services, NDA, CDS और Railways जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए बहुत ही उपयोगी है|
Nov 3, 2016 17:01 IST
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गुप्त साम्राज्य के काल को भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है, क्योंकि इस काल में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, कला, साहित्य, तर्कशास्त्र, गणित, खगोल विज्ञान, धर्म और दर्शन के क्षेत्र में व्यापक आविष्कार और खोज हुए थे जिन्होंने हिन्दू संस्कृति के तत्वों को प्रबुद्ध किया था|

Jagranjosh

गुप्त साम्राज्य 275 ईसवी के आसपास में सत्ता में आया था| गुप्त साम्राज्य की स्थापना 500 वर्षों तक प्रांतीय शक्तियों के वर्चस्व और मौर्य साम्राज्य के पतन के परिणामस्वरूप उत्पन्न अशांति की समाप्ति का प्रतीक है|

गुप्त साम्राज्य की वंशावली

श्रीगुप्त

• इसने तीसरी शताब्दी ईस्वी में गुप्त राजवंश की स्थापना की थी|
• इसने “महाराज” की उपाधि धारण की थी|

घतोत्कच गुप्त

• यह श्रीगुप्त का उत्तराधिकारी था|
• इसने भी “महाराज” की उपाधि धारण की थी|

चन्द्रगुप्त I (319-334 ईस्वी)

• इसने “महाराजाधिराज” की उपाधि धारण की थी|
• इसने 319 ईस्वी में “गुप्त संवत” की शुरूआत की थी जो उसके राज्याभिषेक का प्रतीक है|
• इसने लिच्छवी की राजकुमारी “कुमारदेवी” से विवाह किया और वैवाहिक गठबंधन की शुरूआत की जिससे उसे बिहार एवं नेपाल के हिस्सों में नियंत्रण स्थापित करने में सहायता मिली थी|

समुद्रगुप्त (335-380 ईस्वी)

• उसकी व्यापक सैन्य विजय अभियानों के कारण वी.ए.स्मिथ ने उसे “भारत का नेपोलियन” कहा है|
• उसके दक्षिणी अभियान के दौरान “वीरसेन” उसका सेनापति था|
• प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान “वसुबन्धु” उसका मंत्री था|
• उसके विभिन्न अभियानों से संबंधित जानकारी का उपयोगी स्रोत “एरण अभिलेख” (मध्यप्रदेश) है|
• वह ब्राह्मण धर्म का अनुयायी एवं भगवान विष्णु का भक्त था| उसने श्रीलंका के राजा “मेघवर्मन” को बोधगया में मठ बनाने की अनुमति दी थी|
• उसने “विक्रमांक” और “कविराज” की उपाधि धारण की थी|

चन्द्रगुप्त II (380-412 ईस्वी)

• उसके दरबार में नौ विद्वानों की मण्डली थी जिसे “नवरत्न” कहा जाता था| ये विद्वान कालीदास, अमरसिंह, धनवन्तरि, वाराहमिहिर, वररुची, घटकर्पर, क्षपणक, वेलभट्ट और शंकु थे|
• उसके शासनकाल में “फाहियान” भारत आया था|
• उसने “विक्रमादित्य” की उपाधि धारण की थी|
• वह पहला गुप्त शासक था जिसने चाँदी के सिक्के चलाये थे|
• उसने “चन्द्र” नामक एक राजा को परास्त किया था जिसका उल्लेख दिल्ली के कुतुबमीनार के नजदीक स्थापित एक लौह स्तंभलेख में किया गया है|
• कुछ इतिहासकारों का मानना है कि समुद्रगुप्त और चन्द्रगुप्त II के शासनकाल के बीच में रामगुप्त राजा बना था| “विशाखदत्त” रचित नाटक “देवीचन्द्रगुप्तम” में रामगुप्त को चन्द्रगुप्त II का बड़ा भाई बताया गया है|
• उसने शक शासकों से “ध्रुवदेवी” को छुड़ाया और बाद में उससे शादी कर ली थी|

कुमारगुप्त I (413-467 ईस्वी)

• वह ध्रुवदेवी का पुत्र था जिसने गुप्त साम्राज्य का विस्तार उत्तरी बंगाल से कठियावाड़ तक और हिमालय से लेकर नर्मदा तक किया था|
• उसके शासनकाल के दौरान हूणों ने भारत पर आक्रमण किया था|
• उसने “नालन्दा विश्वविद्यालय” की स्थापना की थी|

स्कन्दगुप्त (455-467 ईस्वी)

• उसने क्रूर हूणों को दो बार खदेड़ा और अपने वीरतापूर्ण उपलब्धि के कारण 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की थी, जिसका उल्लेख “भीतरी स्तंभलेख” में किया गया है|
• वह वैष्णव था, लेकिन उसने अपने पूर्ववर्तियों की तरह सहनशीलता की नीति का पालन किया|

गुप्त साम्राज्य का प्रशासन

• गुप्तकाल में सारी शक्तियां राजा के पास केन्द्रित होती थी| गुप्तकालीन शासकों में देवत्व का सिद्धांत भी प्रचलित था|
• राजा “परमेश्वर”, “महाराजाधिराज” और “परमभट्टारक” की उपाधि धारण करते थे| इस काल में शासन वंशानुगत था लेकिन ज्येष्ठाधिकार का प्रचलन नहीं था|
• गुप्त शासकों के पास एक विशाल सेना होती थी|
• शाही सेना में “जबरन मजदूर” या “विष्टि” को भी शामिल किया गया था|
• राजा सूत्रधार एवं सर्वशक्तिमान के रूप में काम करता था और सामान्य रूप से सभी विवादों का फैसला करता था| इस काल में मामूली सजा दी जाती थी|
• मंत्रियों और असैन्य अधिकारियों की एक परिषद राजा को सहायता प्रदान करती थी|
• गुप्त साम्राज्य में सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी “कुमारमात्य” थे|
• गुप्त साम्राज्य के शाही मुहर पर “गरुड़” का चिन्ह अंकित था| दक्कन में सातवाहनों द्वारा शुरू की गई “भूमि अनुदान” एवं पुजारियों तथा प्रशासकों को दिया जाने वाला राजकोषीय प्रशासनिक रियायतें गुप्तकाल में नियमित रूप से दिया जाने लगा था|
• समुद्रगुप्त के शासनकाल में एक नए पद “संधिविग्रह” का सृजन किया गया था जो युद्ध और शांति के लिए जिम्मेदार होता था| यह पद “हरिसेन” को दिया गया था|

गुप्त साम्राज्य के दौरान कला और वास्तुकला

• इस काल का सबसे उल्लेखनीय स्तंभलेख स्कंदगुप्त का “भीतरगांव” का “एकाश्म स्तंभलेख” है|
• इस काल में कला की “नागर” एवं “द्रविड़” शैली का जन्म हुआ था|
• इस काल में “गांधार कला” अनुपस्थित थी|
• लेकिन मथुरा से प्राप्त “खड़े अवस्था में बुद्ध की एक प्रतिमा से” ग्रीक शैली की उपस्थिति का प्रमाण मिलता है|
• झांसी के पास “देवगढ़” के मंदिर तथा इलाहाबाद के पास “गढ़वास” के मंदिर की  मूर्तियों में गुप्त कला का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है|
• सारनाथ से प्राप्त “बैठे हुए बुद्ध की प्रतिमा” गुप्त कला का प्रतीक है|
• ग्वालियर के पास बाग गुफाओं में चित्रित अधिकांश चित्रों में गुप्त कला की महानता एवं भव्यता दिखाई देती है|
• अजंता के अधिकांश चित्र बुद्ध के जीवन को प्रदर्शित करते हैं|
• महान कवि और नाटककार कालीदास चन्द्रगुप्त II के दरबारी थे| उनकी सर्वोत्कृष्ट कृति नाटक “अभिज्ञानशाकुन्तलम” है| उनके अन्य नाटकों में “मालविकाग्निमित्रम”, विक्रमोर्यवशियम्” और “कुमारसंभव” प्रमुख है| इसके अलावा उन्होंने “ऋतुसंहार” एवं “मेघदूत” नामक दो महाकाव्य की भी रचना की थी|
• गुप्तकाल के दौरान धातुकर्म का भी महत्वपूर्ण प्रभाव दिखाई पड़ता है| कारीगर धातु की मूर्तियों और स्तंभों के निर्माण में माहिर थे|
• सबसे प्राचीन मूर्ति सुल्तानगंज से प्राप्त बुद्ध की विशाल तांबे की प्रतिमा है। वर्तमान में यह बर्मिंघम संग्रहालय में रखा हुआ है| इस मूर्ति की ऊंचाई साढ़े सात फुट और वजन एक टन है| दिल्ली का गुप्तकालीन लौह स्तंभ आज भी जंगरहित है|
• चन्द्रगुप्त II और उसके उत्तराधिकारियों ने सोने, चाँदी और तांबे के सिक्के भी जारी किये थे|
• समुद्रगुप्त एक महान कवि था| समुद्रगुप्त ने “हरिसेन” नामक एक प्रसिद्ध विद्वान को संरक्षण दिया था|
• “काव्यादर्श” और “दशकुमारचरित” के लेखक दण्डिन थे|
• सुबन्धु ने “वासवदत्ता” नामक पुस्तक लिखी थी|
• इस काल के एक और प्रसिद्ध लेखक “विशाखदत्त” थे| उनकी दो प्रसिद्ध नाटक “मुद्राराक्षस” एवं “ देवीचन्द्रगुप्तम” है|
• गुप्तकाल के दौरान ही “विष्णुशर्मा” द्वारा “पंचतंत्र” की कहानियों का संकलन किया गया था|
• इस काल के एक और प्रसिद्ध कवि “शूद्रक” थे जिन्होंने “मृच्छकटिकम” नामक नाटक लिखा था|
• इस काल में भारवि द्वारा रचित “किराताजुर्नियम” में “अर्जुन” और “शिव” के बीच के संवादों का वर्णन है|
• बौद्ध लेखक “अमरसिंह” ने “अमरकोष” नामक पुस्तक की रचना की थी|

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