विश्वविख्यात मोटिवेशनल स्पीकर, शिव खेड़ा, आज हमारे साथ इस वीडियो में शेयर कर रहे हैं सफलता का राज़ अर्थात जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल करने के लिए हमारा रवैया कैसा हो? यूं तो हर एक मनुष्य के जीवन में समस्याएं और चुनौतियां कदम-कदम पर आती ही रहती हैं लेकिन क्या हम इन समस्याओं और चुनौतियों से डर कर बैठ जायें और अपने जीवन में संघर्ष करना छोड़ दें?.....या फिर, हम अपने जीवन में आने वाली सभी समस्याओं और चुनौतियों का वास्तविक महत्व समझ कर, उनसे निपटने की पुर-जोर कोशिश करें? हर एक मनुष्य जब अपने जीवन में सफलता को लेकर संशय और दुविधा का शिकार हो जाता है तो उसे पॉजिटिव मोटिवेशन की बहुत ज्यादा जरुरत पड़ती है. ऐसे किसी भी समय या परिस्थिति के लिए शिव खेड़ा जी का यह विडियो आपको जीवन जीने का एक नया अंदाज़ सिखा सकता है बशर्ते आप इसे ध्यानपूर्वक देखें और सुनें और फिर, इस वीडियो में बताई गई सभी जरुरी बातों या महत्वपूर्ण सलाह को अपने जीवन में अप्लाई करें......चलिए आगे जानें इस वीडियो में क्या कह रहे हैं जाने-माने मोटिवेशनल स्पीकर शिव खेड़ा.......
सफलता की इच्छा और इरादा
शिव खेड़ा जी कहते हैं कि अक्सर जब लोग उनसे मिलते हैं तो कहते हैं कि, वे जीवन में सफलता पाने की तीव्र इच्छा रखते हैं और इसके लिए वे हर तरह का प्रयास करते हैं लेकिन कई किस्म की किताबें पढ़ने और जी-तोड़ कोशिश करने के बाद भी वे सफल नहीं हो पा रहे हैं. शिव खेड़ा जी इसका बड़ा सटीक जबाव देते हुए कहते हैं कि सफलता पाने की आपकी सिर्फ इच्छा है, इरादा नहीं है और यही कारण है कि आप सफल नहीं हो पा रहे हैं. ‘इच्छा’ और ‘इरादे’ में बहुत फर्क होता है क्योंकि जिंदगी में इच्छा तो का सौदा हो सकता है लेकिन इरादे का सौदा नहीं हो सकता है. इसी तरह, चुनौतियों के दौरान हमारी इच्छा तो कमजोर पड़ जाती है लेकिन इरादा और मजबूत हो जाता है.
इसके बाद खेड़ा जी अपना निजी अनुभव शेयर करते हुए कहते हैं कि 45 साल पहले उनकी कोल माइंस थीं, जिनमें लगभग 1 हजार लोग काम करते थे. फिर, कोल माइंस का राष्ट्रीयकरण हो जाने के बाद उन्हें घोर आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा: - उनके पिताजी का भी स्वर्गवास हो गया. ऐसे में खेड़ा जी ने विदेश जाने का मन बनाया. वे टोरोंटो, कनाडा चले गए और कम पढ़े-लिखे होने के कारण दिन में लोगों की गाडियां साफ़ करने लगे और शाम को वैक्यूम क्लीनर बेचने लगे. बाद में उन्होंने लाइफ इंश्योरेंस बेचने का काम शुरू कर दिया. उन दिनों एक एडवरटाइज़मेंट में खेड़ा जी ने डॉ. नॉर्मन विन्सेंट पील के बारे में पढ़ा जिन्होंने ‘पॉवर ऑफ़ पॉजिटिव थिंकिंग’ किताब लिखी है. डॉ. पील उनके शहर में एक प्रोग्राम में आ रहे थे और खेड़ा जी को यह कुछ सीखने का काफी अच्छा मौका लगा. जब 85 साल के डॉ. पील मंच पर आये तो खेड़ा जी ने महसूस किया कि अपने 5 फुट 1 इंच के छोटे कद के बावजूद डॉ. पील में गजब का आत्मविश्वास था, लेकिन उस आत्मविश्वास के साथ घमंड नहीं बल्कि विनम्रता थी. उस दिन खेड़ा जी ने मनुष्य के कद की अपनी परिभाषा बदल दी.
समस्या: जीवन का प्रतीक
डॉ. पील ने आते ही लोगों को देखकर पूछा कि, आप लोगों को देखकर यह लगता है कि आप लोगों के जीवन में जैसे कोई समस्या नहीं है. फिर उन्होंने पूछा कि क्या आप लोगों को कोई समस्या है तो डॉ. पील के ऐसा पूछते ही सब लोगों ने अपने हाथ खड़े कर दिए. अब डॉ. पील ने लोगों से पूछा कि कितने लोग यहां ऐसे हैं जो अपने जीवन में समस्याओं से छुटकारा पाना चाहते हैं? उनके ऐसा कहते ही वहां मौजूद लगभग 1 हजार लोगों ने एक बार फिर अपने हाथ खड़े कर दिए. डॉ. पील आगे बताते हैं कि यहां आते वक्त उन्हें यहां से 200 गज दूर ऐसे लोग दिखे जो आराम से जमीन पर लेटे हुए थे और उन्हें कोई समस्या नहीं थी......वे हर किस्म की समस्या से मुक्त थे. लोगों ने जब उस जगह के बारे में जानने की इच्छा जताई तो डॉ. पील ने बताया कि यहां से 200 गज दूर एक शमशान घाट है. वहां पर किसी को कोई समस्या ही नहीं है. वे लोग बिलकुल तनाव मुक्त हैं. जब डॉ. पील ने एक बार फिर पूछा कि कितने लोग अपने जीवन में समस्या से छुटकारा पाना चाहते हैं तो इस बार किसी भी व्यक्ति ने अपना हाथ नहीं उठाया. तब डॉ. पील ने कहा कि, समस्या जीवन का प्रतीक है. जब तक हमारा जीवन है, तब तक समस्याएं रहेंगी और जब सारी समस्याएं समाप्त हो जायेंगी तो हमारा जीवन ही नहीं रहेगा. जब आपके जीवन में समस्याएं कम होने लगें तो समझना कि अब आपके जीवन को खतरा है और तब आप अपने ईश्वर से प्रार्थना करना कि हमारा भरोसा कम हो रहा है, आप कोई समस्या ही भेज दो.
मानसिक शान्ति के लिए प्रार्थना: – जीवन का सारांश
शिव खेड़ा जी आगे कहते हैं कि, फिर डॉ. पील ने उन लोगों को 2 हजार साल पुरानी एक प्रार्थना सिखाई. खेड़ा जी के मुताबिक वो प्रार्थना जीवन का सारांश है. खेड़ा जी 45 साल से वह प्रार्थना करके ही अपने घर से निकलते हैं. खेड़ा जी के मुताबिक यह एक सेरिनिटी प्रेयर है जिसे खेड़ा जी ने इंग्लिश और हिंदी वर्ज़न में सुनाया जिसका विवरण कुछ यूं है – भगवान मुझे इतनी स्थिरता और संतुलन दो कि जो मैं बदल नहीं सकता, उसे आपकी सौगात समझ कर स्वीकार करूं.....और जो मैं बदल सकता हूं उसे बदलने के लिए मुझे हिम्मत और हौसला दो.....और इतनी सुबुद्धि भी मुझे दो कि मैं इस में फर्क बता सकूं कि मैं क्या बदल सकता हूं और क्या नहीं बदल सकता. खेड़ा जी के मुताबिक, अगर हम इस प्रार्थना का विश्लेषण करें तो वास्तव में इस प्रार्थना में ही जीवन का सारांश है.
क्या जीवन में सब-कुछ हमारे काबू में है? बहुत-सी बातें हमारे अख्तियार से बाहर भी हैं.......हमारा जहां जन्म हुआ, यह हमारा फैसला नहीं था, हम नें अपने माता-पिता को नहीं चुना और न ही हमारे माता-पिता ने हमें चुना. इसी तरह, हम अपना कद या त्वचा के रंग को नहीं बदल सकते. कई लोग अपाहिज पैदा होते हैं और कई अच्छे लोगों के साथ बुरे हादसे भी हो जाते हैं. उनका कसूर तो सिर्फ भगवान ही जानते हैं. बहुत से लोग ऎसी चीज़ों के साथ संघर्ष करते रहते हैं, जो वे बदल ही नहीं सकते हैं और फिर उन लोगों के जीवन में तनाव बढ़ जाता है जिससे उनके जीवन में प्रोडक्टिविटी और आपसी संबंध, यह सब-कुछ खत्म हो जाता है. इसलिए जो हम बदल नहीं सकते हैं, उसे ईश्वर की सौगात समझ कर स्वीकार कर लेना चाहिए. जो कुछ हम बदल सकते हैं, उसे जरुर बदलना चाहिए और ईश्वर हमें इतनी सुबुद्धि जरुर दें कि हमें पता हो कि हम क्या बदल सकते हैं और क्या नहीं बदल सकते हैं. उस दिन के बाद से ही शिव खेड़ा जी यह प्रार्थना करके ही अपने घर से बाहर निकलते हैं.
जीवन एक फैसला भी है और एक समझौता भी......कैसे? आइये जानें
अपनी किताबें – ‘यू कैन विन’ और ‘यू कैन अचीव मोर’ लिखते समय खेड़ा जी ने इसी सोच को कुछ और आगे बढ़ाया और अपनी किताब में लिखा कि, - जिंदगी एक फैसला भी है और समझौता भी. हमें ऐसा लगता है कि ये दोनों आपस में टकरा रहे हैं पर ऐसा बिलकुल नहीं है. कैसे? अगर लोग किसी के साथ बदतमीजी से पेश आते हैं तो यह उनका फैसला है. इसी तरह, अगर वे सिगरेट सुलगाते हैं तो वे कैंसर को बुलावा दे रहे हैं. अगर वे शराब पीकर गाड़ी चलाते हैं तो वे एक्सीडेंट को बुलाने का फैसला करते हैं. अगर वे सच्चाई और ईमानदारी पर चलते हैं तो उनकी क्रेडिबिलिटी बढ़ जायेगी. उनका एक्सरसाइज करने का फैसला उन्हें सेहतमंद रखेगा. सब इस बात पर पूरा ध्यान दें कि हम सब एक फैसला लेने तक आजाद हैं, उसके बाद फैसला हमें नियंत्रित करता है और हमारी आज़ादी हमसे छिन जाती है.
अब सवाल यह है कि जिंदगी एक समझौता कैसे है? इसका जवाब यह है कि, हर चीज़ हमारे हाथ में नहीं है. ताश के पत्ते हमें कैसे मिलते हैं, इसका फैसला हम नहीं कर सकते लेकिन हम खेल कैसे खेलते हैं?....इसका फैसला तो हम ही कर सकते हैं. इसलिए आप भी अपने जीवन में फैसला और समझौता सोच-समझ कर करें क्योंकि एक बार फैसला लेने के बाद आपकी आज़ादी खत्म हो जायेगी. इसी तरह, जीवन में हम जिन चीज़ों को बदल नहीं सकते, उन्हें ईश्वर की सौगात समझकर उनसे समझौता कर लेना चाहिए.
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